कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ : हाँ भई हाँ फारुख अब्दुल्ला जी! कश्मीर हमारे बाप दादाओं का ही है

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Old Kashmir

सिन्धु भुलाया दाहिर का
गांधारी का गंधार
कैसे मैं कश्मीर भूलाऊँ
भू का स्वर्गागार
वह कल्हण कश्मीरी था
राज तरंगिनी लिखने वाला
वो विल्हण भी कश्मीरी था
चौर पंचाशिका रचने वाला
शैवागम दर्शन जग वन्दित
जिसका आनंदवाद प्रतिपाद्य
कश्मीरी पंडित जन की देन
शिव पार्वती जिनके आराध्य
अकलुष जीवन दृष्टि की
जहाँ से निःसृत पावन धार
कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ भू का स्वर्गागार

यहीं अवस्थित तक्षशिला थी
विश्व विश्रुत था विद्यालय
थे आचार्य प्रवर कौटिल्य
साक्षी देखो खड़ा हिमालय
विविधांचल से सकल विश्व के
विद्या व्यसनी आते थे
निखिल वांग्मय की शिक्षा से
जीवन सफल बनाते थे
जहाँ गुरु को शीश झुकाने आता था संसार
कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ भू का स्वर्गागार

आतंकवाद के सहगामी हैं
आज महर्षि पाणिनि की संताने
आज खड़ी निर्ममता से
संगीने भारत माँ पर ताने
कश्यप के पुनीत वंशधर
धर्मान्तरित हो छल से बल से
इंगित करते हमें सदा ही
हारा मानव काल प्रबल से
जहाँ वर्ष हजारों से होती
धर्म सनातन की जयकार
कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ भू का स्वर्ग गार

शास्त्र विहित इक्यावन पीठों में
वैष्णो देवी का पावन पीठ
श्रद्धालु जनों का श्रद्धा स्थल
जिस पर लगी शत्रु की दीठ
जहाँ छड़ी मुबारक होती है
हम जाते अमरनाथ के धाम
शैव पंथ का पावन स्थल
भक्त जन करते जिन्हें प्रणाम
भारत के कोने कोने से भक्तो का जहाँ उमड़ता ज्वार
कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ भू का स्वर्गागार

Kashmir India
Old Kashmir

तुम लूट रहे सदियों से
हम फुटपरस्ती में सोये
चीर दिया भारत की छाती
हम फुट फुट कर रोये
स्कार्दू चित्रा गिलगित रोया
रोया डेरा बाबा नानक
ढाका और कराची रोया
गाँधी अखिल राष्ट्र का नायक
संगठन का दृढ मंत्र महा
गूंजे जय भारत का महोच्चार
कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ भू का स्वर्गगार

कल रूसो बलख हमारा था
इरानो अरब हमारा था
भूतपूर्व ऐ बुतपरस्तों
कल सारा चमन हमारा था
पाते सुकून तुम चूम जिन्हें
वो मक्केश्वर शिवलिंग हमारा था
स्वत्व न छीना कभी किसी का
जग फिर भी हमसे हारा था
अरब भुलाया ईरान भुलाया
कैसे भूलूं अपना आँगन द्वार
कैसे मैं कश्मीर भुलाऊँ भू का स्वर्ग गार

‘उत्सर्ग’ कविता संग्रह से द्वारा डॉ श्रीराम पाण्डेय, जगदेव नगर, आरा (बिहार)

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