बाज़ार में रौनक रहनी चाहिए, चाहे लुटेरों-आक्रमणकारियों से रहे, है न (अन)अर्थशास्त्री जी!

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उस ज़माने में जब कि विदेशी शक्तियों के लिए भारत आने का एक ही रास्ता था…. यही खैबर दर्रा जो वर्तमान अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होता हुआ पंजाब के रास्ते आज के भारत में आता था….

सो चाहे विदेशी व्यापारी हो या फिर आक्रमणकारी…. सब इसी रास्ते आते थे.

अब सेना है….. कुछ बैल गाड़ियों पर, कुछ घोड़ा या गधा गाड़ी पर, यहाँ तक कि हाथी, घोड़ा, ऊँट, खच्चर सब होते थे. बड़ी संख्या में पैदल सैनिक होते थे.

महीनों लग जाते थे सेनाओं को रास्ता पार करने में. इतने लम्बे सफ़र में इतनी बड़ी सेना….. रास्ते भर रुकते रुकाते आती थी.

रास्ते में पड़ने वाले गाँव….. और गाँव वाले….

इन ‘मेहमानों’ के स्वागत सत्कार में बिछ जाते…. पलक पांवड़े बिछाते…. इन्हें खिलाते पिलाते….

इनके औजार, हथियार, इनकी गाड़ियाँ रिपेयर करते…. इनकी मालिश करते…. मसाज पार्लर में मसाज भी होती थी….

मने मेहमानों का पूरा ख़याल रखता था भारत….. और क्यों न रखे??? हमारे यहाँ तो ‘अतिथि’ देवो भव् की परम्परा रही है….

मार्किट में जैसी तेजी मंदी आज है तब भी होती थी GDP की जो भूख आज है, वो तब भी थी. दुर्भाग्य से GDP की जो परिभाषा आज है, वही तब भी थी .

आक्रमणकारी आते तो मार्किट में तेजी आती थी. मार्किट में ग्राहक होता था. आक्रमणकारी आते थे तो नौकरियों का सृजन होता था.

आक्रमणकारी आते थे तो अपने साथ विदेशी मुद्रा भी ले के आते थे. भुगतान (payment) लूट की स्वर्ण मुद्राओं में करते थे.

जब चले जाते तो मार्किट में मंदी छा जाती. बेरोज़गारी आ जाती. लुहारों की भट्टियां ठंडी पड़ जाती थीं.

बढई बेरोजगार हो जाते. मसाज पार्लरों में सन्नाटा छा जाता. बाजार सूने हो जाते.

ये वो ज़माना था जब खैबर दर्रे के लोग आक्रमणकारी सेनाओं की बाट जोहते थे.

Business की बाट जोहते थे. GDP की बाट जोहते थे. बाज़ार में तेज़ी की बाट जोहते थे.

उनकी औरतें ‘बिछ’ जाती थीं ‘सेवा’ में…. कमबखत… बहुत बुरी चीज़ होती है ये GDP….

जब से मोदी ने ये नोटबंदी की है, सुना है कि बड़ी मंदी है बाज़ार में…. कामधंधा मंदा है…..

कल अर्थ शास्त्री जी बता रहे थे संसद में कि GDP 2% घट जायेगी. काले धन पे सर्जिकल स्ट्राइक से बेरोजगारी बढ़ी है.

इतना बढ़िया चल रहा था सब कुछ. इस कमबखत मारे मोदी ने सारा गुड़ गोबर कर दिया. बाजारों की रौनक छीन ली.

बाज़ार में रौनक रहनी चाहिए….. चाहे लुटेरे आक्रमणकारियों से रहे…. या फिर उनकी लूट की अशर्फियों से रहे.

कोठों पे तबले की थाप और सारंगी की धुन बजती रहे…. ठुमके लगते रहे….. सोमनाथ से लूटी हुई सोने की मोहरें बरसती रहे….

GDP कायम रहे.

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