जल के नाथ, थल के नाथ, नाथ अनाथ के सबके नाथ : भाग 3

नाथपंथ नि:शेष रूप से योगियों द्वारा प्रवर्तित है, जिनका उद्देश्य सहजता प्राप्त करना है. यह सहजता वीर्य, श्वास तथा विचारों के नियन्त्रण द्वारा काया साधना की पूर्णता से प्राप्त होती है. काया साधना के लिये एक पूर्ण गुरु के मार्गदर्शन को आवश्यक माना गया है.

अपने समान संन्यासियों से बातचीत में विरोधाभासी पदों और गूढ़ अर्थयुक्त पदों कविताओं का आदान-प्रदान करते हैं. इन गूढ़ अर्थ वाले पदों का आरम्भ इनमें अभिवादन के समय से ही प्रारम्भ हो जाता है. अभिवादन हेतु सामान्य पदों की अपेक्षा नाथयोगी ‘आदेश! आदेश!! पद का प्रयोग करते हैं, जो आत्मा, जीवात्मा तथा परमात्मा की अभेदता का प्रतीक है.

योगी गोरक्षनाथ विरचित ग्रन्थ ‘सिद्ध सिद्धान्त पद्धति में नाथयोगियों द्वारा अभिवादन के लिये प्रयोग किये जाने वाले ‘आदेश आदेश पद के संबन्ध में उल्लेख करते हुए बताया गया है. ”आत्मेति परमात्मेति जीवात्मेति विचारणे. त्रयाणामेक्य संभूतिरादेष इति कीर्तित:.. आदेश इति सदवाणीं सर्वं द्वन्द्वक्षयापहाम. यो योगिनं प्रति वदेत स यात्यात्मानमीष्वरम.. (सिद्ध सिद्धान्त पद्धति 694-95) तदनुसार आत्मा, परमात्मा और जीवात्मा की अभेदता ही सत्य है.

इस सत्य का अनुभव या दर्शन हमारे सिद्धामृत मार्ग में ”आदेश कहलाता है. व्यावहारिक चेतना की आध्यातिमक प्रबुद्धता जीवात्मा, आत्मा तथा परमात्मा के साक्षात्कार में निहित है. आश्चर्य की सीमा तक एक सत्य यह भी है कि, नयी पीढ़ी के गृहस्थ नाथयोगियों को विरासत में मिलने वाले इन गूढ़ अर्थ वाले पद और कविताओं पर गर्व तो है किन्तु अर्थ मालूम नहीं है.

1. योग की पातंजल शाखा का प्रवर्तन किसके द्वारा किया गया इसका संक्षिप्त परिचय इसी पुस्तक में ‘गोरक्षनाथ शीर्षक अध्याय के अन्तर्गत किया है.

नाथ महिमा

1. शिव संगम तंत्र में उलिलखित है ”श्री मोक्षदान दक्षत्वात नाथ ब्रह्रानुबोधनात. स्थगित ज्ञान विभवात श्री नाथ इतिगीयते..

अर्थात नाथ की शरण में जाने पर ही ब्रह्रा का साक्षात्कार संभव है और तब ही अज्ञान का अंधकार नष्ट होता है. जो मोक्षदान में दक्ष है और अज्ञान के सामर्थ्य को स्थगित करने वाला है, उसे नाथ कहते हैं.

2. गोरक्ष सिद्धान्त संग्रह में ”देदीप्यमानस्तत्त्वस्यकर्ता साक्षात स्वयं शिव:. संरक्षन्तो विष्वमेव धीरा: सिद्धमताश्रया:.. अर्थात सब में स्वप्रकाशित साक्षात शिव ही तत्त्व के कर्ता हैं तथा सिद्ध मत का आश्रय करने वाले धैर्यशाली योगियों को विश्व का संरक्षक बताया है.

3. शिव रहस्य में वर्णित है ”सर्वं देवानां सर्वं संसारिणामपि च गुरुर्नाथ एव सर्वषास्त्र प्रसिद्धोतएव तन्त्रोक्तेपि गुरु कवचे गुरुमण्डल निरूपणे मुख्यतया नाथस्यैव गुरुत्वं श्री नाथादि गुरुत्रयमित्यादिना. परम पुरुषार्थस्तमुरित्युम. सा च नाथ स्वरूपेणावस्थानम.. अर्थात ये सभी शास्त्रों में प्रसिद्ध है कि, सभी देवताओं तथा समस्त संसारियों के गुरु नाथ ही हैं, इसीलिये तन्त्रवर्णित गुरुवचन में गुरुमण्डल का मुख्य निरूपण करते समय ”श्री नाथादि गुरुत्रयम आदि श्लोकों द्वारा नाथ के ही गुरुत्व का मुख्य रूप से वर्णन किया गया है.

4. गोरक्ष सिद्धान्त संग्रह के अनुसार मंगल श्लोकों में नाथ के लक्षणों पर प्रकाश डालते हुए नाथ महिमा के संबंध में कहा गया है- ”निर्गुण वामभागे च सव्यभागेदभूता निजा. मध्यभागे स्वयं पूर्णं तस्मै नाथाय ते नम:. अर्थात नाथ के वाम अंग में निर्गुण रहता है और दक्षिण अंग में अदभुत विशिष्ट निजा शक्ति रहती है.

मध्य में स्वयं नाथ अपनी पूर्णता से आलोकित है. मैं इस नाथ के समक्ष मस्तक झुकाता हूँ और स्वयं नाथ बनने की अभीप्सा रखता हूं. दूसरे श्लोक में कहा है ”मु: लुठनित पादाग्रे नखाग्रे जीवजातय: मु मुगतेमरु: सर्वत्र रमते सिथर:. अर्थात समस्त स्तर के जीवित प्राणी नाथ के चरणनखों पर आराधना अर्पित कर रहे हैं.

जिन्होंने स्वयं को इस ऐन्द्रिक जगत के दु:खों व बन्धनों से मुक्त कर स्वच्छन्दता व सुख के उच्चतर लोकों तक उठा लिया है, वे भी नाथ के चरणों में निवास कर रहे हैं. नाथ जिस चेतना स्तर पर निवास करते हैं वह बद्ध और मुक्त दोनों की चेतनाओं के स्तर से ऊपर हैं. वह व्यावहारिक अनुभव के समस्त स्तरों व क्षेत्रों में तत्त्वज्ञानालोकित दृषिटकोण व शांत गम्भीर स्थिरता में स्वयं का आनन्द भोगता है.

5. गोरक्ष सिद्धान्त संग्रह के ही अनुसार गुरु मात्र नाथ ही हो सकता है. क्योंकि नाथ भोग और त्याग दोनो से निर्लिप्त है, वह सबके लिये और सब उनके लिये समान है नाथ के पद-पद में तीर्थ है, उनका वाक्य वेद के समान और नाथ स्वरूप का परम पुरुषार्थ मुक्ति है.

इसीलिये नाथ स्वरूप प्राप्त करने की कामना की जाती है. ”भवेयं मनुष्योयदैकस्तु राजा, यदा जन्तुरेको भवेयं मृगेन्:. यदा शास्त्रमेकं तदा योगमेव, यदा देव एकस्तदा नाथ एव.. अर्थात अगर मनुष्य होऊं तो चक्रवर्ती सम्राट बनूं, पषु होऊं तो सिंह बनूं. षास्त्र होऊं तो एक मात्र योग षास्त्र मेरा रूप हो और देवता होऊं तो मात्र नाथ स्वरूप हो जाउं. क्योंकि ”षर्जिगत्कतृ शिव: पालक:. काल: संहारक:. नाथो मुकितदायकं:. शिव पालन करते हैं, काल संहार करता है और नाथ मोक्ष देते हैं. ”परम पुरुषार्थस्तमुरित्युम. सा च नाथस्वरूपेणावस्थानम. अर्थात मोक्ष किे लिये किया गया कर्म ही परम पुरुषार्थ है, जो नाथ स्वरूप से ही चरितार्थ हो सकता है.

6. महासिद्धयोगी भर्तृहरि का कथन है ”सिद्धनामिष्टोनाथ: सोपि सित्रयं नागीचकार. सर्वे ब्रह्राविष्णु रुद्रादयोदेवा: शेषादयो नागा मन्वादि नरा अन्ये च पशु पक्षिणो यावज्जीवं सर्वे स्त्रीजिता: एको नाथ एव मायाजेता तदुं महासिद्ध श्री विचारनाथेन भर्तृहरिणा. अर्थात सिद्धों के इष्ट देव नाथ है, उन्होंने स्त्री को अंगीकार नहीं किया. जबकि ब्रह्रा, विष्णु और रुद्र आदि ने सम्पूर्ण देव समुदाय, शेष आदि नागगण, मनु आदि मनुष्य तथा अन्य पशु पक्षी आदि सभी जीव स्त्री के वषीभूत हैं. माया (स्त्रीप्रभाव) को जीतने वाले तो एक मात्र नाथ ही हैं. इसी कारण केवल नाथ ही ईश्वर है.

7. गोरक्ष सिद्धान्त संग्रह के अनुसार ”शट पदार्था यत्र भवनित स भगवान. के ते शट पदार्था:? 1. समगै्रष्वर्य, 2. धर्म:, 3. यष:, 4. श्री, 5. ज्ञान, 6. वैराग्य. एतेषांमध्ये एकोपि रुपविष्णवादिनां भगवत्पदवाच्येषुन. अर्थात जिसमें छ: योग्यताएं क्रमष: समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य हैं वह भगवान है.

इनमें से एक भी योग्यता भगवत्पदवाची रुप एवं विष्णु आदि देवताओं में नहीं है. ये छ: योग्यताएं नाथ में ही स्थित है. देखिये ”समग्र ऐश्वर्य तु योग:, स तु सहजसिद्ध एव. पुन: धर्मोपि स एव यो मुल रूप: पुनर्यषोपि तस्यैव यो मुलरूपो बन्धरूपस्य कथं यश:. पुन: श्री शोभापि तस्यैव यो मुलो बन्धरूपस्याथ्वा कथं भवेधो लौकिक सुख:दु:खे मग्न. ज्ञानं तस्यैव ज्ञानं पुनर्वेराग्यं तस्यैव वैराग्यमेवं च सर्वेशामधारो नाथ एवात: कारणान्महामिदधानां. तात्पर्यं नाथ परमेवेति..

अर्थात समग्र ऐश्वर्य योग है, वह तो नाथ के लिये सहज सिद्ध ही है. पुन: धर्म भी वही है, जो मूल रूप हो. यश भी उसी को प्राप्त है, जो मुक्त है. बन्धन रूप वाले को यश किस प्रकार मिल सकता है.

श्री भी उसी को प्राप्त है, जो मुक्त है. जो सांसारिक बन्धनों में आबद्ध है उसे श्री किस प्रकार मिल सकती है. ज्ञान और वैराग्य भी उसी को मिल सकते हैं जो मुक्त हैं. इस प्रकार ईश्वर के सभी छ: पदार्थों के आधार नाथ ही हैं और इसी कारण सृष्टि के रचयिता नाथ ही हैं.

8. कथा प्रसिद्ध है कि,-

अद्वैतोपरिवर्ति निराकारसाकारातीतनाथात्रिराकार ज्योतिर्नाथो जातस्तत: साकारनाथो जातस्तदिच्छया सदा षिवो भैरवो जातस्ततष्च भैरवी च जाता, तस्माद विष्णुर्जात: तस्माद ब्रह्रा जास्तने सर्व़ा सृषिटरुत्पन्ना. नाथाद द्विप्रकारा सृषजाता नाद रूपा बिन्दुरूपा च. नाद रूपा षिष्यक्रमेण बिन्दुरूपा च पुत्रक्रमेण. नादान्नव नाथा जाता: बिन्दुत: सदा षिवोच भैरवोजात: पुनर्नवनाथानां पष्चात ब्रह्रा सूर्यष्चन्द्र देवतादि जाता:.

अर्थात जो अद्वैत से ऊपर वर्तमान हैं तथा साकार और निराकार से परे है, उन नाथ से निराकार ज्योतिस्वरूप नाथ उत्पन्न हुए. उनसे साकार नाथ की उत्पत्ति हुर्इ. उन साकार नाथ की इच्छा से सदाशिव भैरव प्रकट हुए और उन्ही से भैरवीशक्ति का प्रादुर्भाव हुआ. उन (भैरवी शक्ति) से विष्णु उत्पन्न हुए और विष्णु से ब्रह्राा का जन्म हुआ जिनसे सारी सृषिट उत्पन्न हुर्इ. नाथ से दो प्रकार की सृषिट उत्पन्न हुर्इ प्रथम नादरूपा और दूसरी बिन्दुरूपा. षिष्य क्रम से नादरूपा और पुत्र क्रम से बिन्दुरूपा सृषिट का प्रसार हुआ. नाद से नौ नाथ प्रकट हुए तो बिन्दु से सदाषिव भैरव का जन्म हुआ. नौ नाथों के बाद बारह तथा चौरासी सिद्ध तत्पष्चात बारह पंथ और प्रत्येक पंथ में अनेकों सिद्ध उत्पन्न हुए. सदाषिव भैरव से विष्णु, बह्राा, सूर्य, चन्द्रमा, इत्यादि देवताओं का प्रादुर्भाव हुआ.

संकलन-योगी हरिहर नाथ/गुरु योगी विलासनाथ जी महाराज” अवधूत भेष 12 पंथ योगी महासभा.
ॐ अलख आदेश!आदेश!आदेश

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जल के नाथ, थल के नाथ, नाथ अनाथ के सबके नाथ : भाग 1

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