रेलवे स्टेशनों के ये चूहे एशिया में ही पाए जाते हैं!

एक बात जो आपने हर रेलवे स्टेशन पर कॉमन देखी होगी कि रेल की पटरियों के नीचे बिलों में पलने वाले चूहे त्रिवेन्द्रम से लेकर जम्मू तक और कोलकाता से लेकर बीकानेर तक मुंबई से लेकर गोरखपुर तक एक ही साइज़ के मोटे ताज़े और बड़े बेफिक्र होते हैं, बिल्ली और खरगोश के आकार के ये चूहे किसी सांप, बिल्ली या कुत्ते से भय नहीं खाते, प्रचंड गरमी हो या कड़कड़ाती ठण्ड इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता.

उड़ीसा के झारसुकड़ा जैसे अकालग्रस्त इलाके के रेलवे स्टेशन के चूहे भी मैंने कुपोषण के शिकार नहीं देखे, ट्रेन कितनी ही द्रुतगामी हो, पेसेंजर हो या मालगाड़ी हो रेलवे के ये चूहे उससे हमेशा अप्रभावित रहते हैं.

कम से कम मैंने अपने जीवन में इन्हें रेल से कटते हुए नहीं. देखा अगर आप में से किसी ने रेल से कटा हुआ चूहा देखा हो तो मुझे अवश्य बताएं जबकि आदमी, चौपायों को आप आये दिन कटता हुआ देख अथवा सुन लेते होंगे,

दरअसल मीडिया भी ऐसे ही चूहों से भरा पड़ा है जिसके आसपास से नाना प्रकार की ट्रेने (सरकारें) निकलती रहती है ये उनके ऊपर-नीचे आराम से अपना जीवन बसर करते रहते हैं.

अधिकाँश चूहे अरबों रुपयों के अपने बिल बना चुके हैं और बिना किसी चिंता, भय के पूरे एशो-आराम के साथ मजे कर रहे हैं.

शक्तिशाली से शक्तिशाली राष्ट्रवादी सरकार इनका बाल भी बांका नहीं कर सकती. ‘कौन जात प्रकरण’ से यह साबित हो चुका है.

हाँ एक बात बताना जरूरी है रेलवे स्टेशनों के ये चूहे एशिया में ही पाए जाते हैं.

– अजीत भोंसले

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