कुछ लोगों का मोदी के नाम से डरना ज़रूरी है, उन्हें डरना ही चाहिए

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PM Modi
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छोटे शहरों में बड़े होने का फायदा ये होता है कि किताबें सिर्फ स्टेशन की दुकानों पर ही मौजूद होती हैं. वहीं से कभी विश्व प्रसिद्ध जासूसी काण्ड की किताब लाये थे, तीस रुपये की.

उस ज़माने के हिसाब से महंगी किताब. उसमें एडोल्फ आइकमन का भी किस्सा था. नाम सुना है? शायद कुछ लोगों ने सुना होगा. आइये इतिहास के इस रोमांचक अध्याय के बारे में बात करते हैं.

एडोल्फ आइकमन पढ़ने में बहुत अच्छा नहीं था. माता पिता के जर्मनी से ऑस्ट्रिया जाने पर इसकी पढाई और शुरुआती नौकरी ऑस्ट्रिया में ही रही. कट्टरपंथी तो ये शुरू से ही था, ऑस्ट्रिया में ही ये नाज़ी पार्टी के संपर्क में आया. बाद में नौकरी छूट जाने की वजह से ये जर्मनी गया और वहां भी नाज़ी पार्टी में शामिल हो गया.

उस ज़माने में कई लोग ऑस्ट्रिया से जर्मनी आ रहे थे, तो इन नए नाजियों की ट्रेनिंग का काम आइकमन को सौंप दिया गया. तेजी से तरक्की करता आइकमन जल्दी ही सेकंड लेफ्टिनेंट बन गया.

द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान 1 सितंबर 1939 को जर्मनी ने पोलैंड पर अधिकार कर लिया. अब नाजी पार्टी ने यहूदियों के बारे में अपनी नीति में परिवर्तन करते हुए उन्हें पोलैंड भेजने का निर्णय लिया. लाखों की संख्या में यहूदियों को जर्मन शिविरों में इकट्ठा करने और फिर रेलगाड़ियों में ठूंसकर उन्हें पोलैंड तक भेजने की योजना बनाई गई.

इस कार्य की ज़िम्मेदारी आइकमन को सौंपी गई. दिसंबर 1939 में उसे इस विभाग का प्रमुख नियुक्त किया गया. अगले कुछ महीनों के दौरान लाखों यहूदियों को विशेष यातना शिविरों में इकट्ठा किया गया. इन शिविरों की कुव्यवस्था के कारण हजारों यहूदियों की मौत हो गई.

15 अगस्त 1940 को आइकमन ने घोषणा की कि अगले चार वर्षों तक प्रति वर्ष एक लाख  यहूदियों को जर्मनी से निकालकर अफ्रीका में मेडागास्कर भेजा जाएगा. लेकिन ब्रिटेन से लड़ाई में जर्मनी को अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिल सकी और मेडागास्कर योजना स्थगित कर देनी पड़ी.

अंततः 1942 में हिटलर ने सभी यहूदियों को हत्या करवाने का निर्णय लिया. इसके लिए एक विशेष नीति बनाई गई और आइकमन को इसे पूरा करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई.

आइकमन के विभाग का काम था – हर क्षेत्र में यहूदियों के बारे में जानकारी एकत्र करना, उनकी संपत्तियां जब्त करना और उन्हें शिविरों तक पहुंचाने के लिए रेलगाड़ियों की व्यवस्था करना. जर्मनी ने विश्व-युद्ध के दौरान फ्रांस और हंगरी आदि जिन देशों पर विजय पा ली थी, वहां भी यहूदियों को ख़त्म करने की योजना कार्यान्वित की गई.

इनमें से कुछ यहूदियों को बंधुआ मजदूरों के रूप में रखा जाना था और शेष की हत्या करनी थी. यह पूरा ऑपरेशन आइकमन की देखरेख में चला. इस कार्य के लिए वह अगले एक माह तक हंगरी में ही रहा. जुलाई 1944 तक हंगरी के लगभग 4 लाख 37 हज़ार यहूदियों को मार डाला गया.

जब 1945 में जर्मनी युद्ध हारी तो आइकमन को भी अमरीकियों ने बंदी बना लिया. मगर ये बंदी शिविर से भाग निकला. कई जगह रहा, पहचान बार बार बदली. अमेरिका से इटली, वह से यूरोप की कई जगहों पर से होता हुआ, फिर वहां से नया पासपोर्ट लेकर ये इधर-उधर छुपता रहा. 1948 में आइकमन ने अर्जेंटीना का लैंडिंग परमिट जुटा लिया.

बिशप अलोइस हुडल की मदद से नाजियों के हमदर्दों की मदद जुटा के वो 1950 में रिकार्डो क्लेमेंट के नाम से वो अर्जेंटीना में बसने लायक कागजात इकठ्ठा करने में कामयाब हो गया. जेनोआ से पानी के जहाज के रास्ते वो बूएनोस एरेस पहुँच गया.

उधर यहूदियों को उनका देश मिल गया था. कई यहूदी ऐसे थे जो आइकमन को भूले नहीं थे, यहूदियों ने नाज़ी हन्टर्स नाम का दल बना कर पूरे विश्व में नाज़ियों को ढूंढ ढूंढ कर सजा दिलवाना भी शुरू कर दिया था. ऐसे में ही जब कई बार में पक्का कर लिया गया कि बूएनोस एरेस में छुपा ये शख्स आइकमन ही है तो यहूदियों का एक दस्ता अर्जेंटीना जा पहुंचा.

1960 में जब अर्जेंटीना स्पेन से आज़ादी के डेढ़ सौ साल पूरे होने की खुशियाँ मना रहा था उसी दौरान मोसाद द्वारा आइकमन को अपहृत कर लिया गया. उसे फ्लाइट अटेंडेंट के कपड़े पहना के बेहोश कर दिया गया. जिस विमान से इसरायल का प्रतिनिधिमंडल लौटने वाला था उसी विमान में चुपके से डाल कर उसे इसराइल ले आया गया.

दुनिया के सारे बड़े मुल्कों ने लाख हाथ पांव मारे मगर इसराइल ने आइकमन को नहीं छोड़ा. उसपर 56 दिन तक मुकदमा चला जिसे करीब 750 दुनिया भर के पत्रकारों ने कवर किया. 1962 में इसराइल ने उसे फांसी पर टांग दिया.

तो ये आतंकी जब इसराइल के नाम से घबराते हैं तो ऐसे ही नहीं घबराते. उन्हें पता है कि दुनिया के चाहे जिस भी कोने में जा छुपें, इसराइल उन्हें ढूंढ कर मार देगा. अगर खुद पर आतंकी हमला रोकना है तो डर पैदा करना ही होगा.

आज के हाल में मोदी जी को भी अपना चुनाव पूर्व का एक साक्षात्कार याद करना चाहिए. हम भी दोबारा उन्हें याद दिलाना चाहेंगे, कुछ लोगों का मोदी के नाम से डरना ज़रूरी है. उन्हें डरना ही चाहिए.

 

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