जल के नाथ, थल के नाथ, नाथ अनाथ के सबके नाथ : भाग 1

Adinath
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सिद्ध मतानुसार आध्यात्मिक रूप में नाथ शब्द नाथ सम्प्रदाय के प्रवर्तक आदिनाथ भगवान शिव के लिये प्रयुक्त हुआ है. नाथ पद का अर्थ ब्रह्म पद होता है. उल्लेखनीय है कि, यही सर्वोच्च पद है.

सनातन धर्म और इसकी उपशाखाओं के सभी धार्मिक ग्रन्थो में जब भी किसी देवी-देवता द्वारा अपने से श्रेष्ठ से याचना, स्तुति अथवा सम्बोधन किया जाता है तो ‘हे नाथ! कहा जाता है. ब्रह्म तेजयुक्त त्रिकालिक विभूतियों को भी नाथ नाम से जाना जाता है, जैसे- आदिनाथ, पशुपतिनाथ, गोरक्षनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, गणनाथ, सोमनाथ, नागनाथ, वैधनाथ, विश्वनाथ, जगन्नाथ, रामनाथ, द्वारिकानाथ, केदारनाथ, बदरीनाथ, अमरनाथ, एकलिंगनाथ, जलन्धरनाथ आदि असंख्य नाम है.

राजगुहा में ”नाकारोsनादिरूप: थकार: स्थापित: सदा. भुवनत्रयमेवैक: श्री गोरक्ष नमोsस्तुते.. अर्थात ‘ना का अर्थ अनादि रूप ‘थ का अर्थ भुवनत्रय का स्थापित होना. इस प्रकार ‘नाथ का शाब्दिक अर्थ है, वह अनादि धर्म जो भुवनत्रय की स्थिति का कारण है.

श्री गोरक्ष, नाथ स्वरूप में स्थित हैं अर्थात स्वयं नाथ हैं अत: उन्हें गोरक्षनाथ कहा जाता हैं. नाथ शब्द का विच्छेद करने पर शाब्दिक अर्थ है ना – शून्य एवं थ – स्थित. अर्थात जो शून्य में स्थित है वह नाथ है. क्योंकि आदि नाथ शिव ही शून्य में तत्व रूप से व्याप्त हैं अत: इस परिभाषा के अनुसार भुवनत्रय में स्थित प्रत्येक तत्त्व मात्र नाथ है.

योगवेत्ताओं ने समस्त चराचर जगत को नाद-बिन्दु स्वरूप बताया है. बिन्दु शक्ति हिै और नाद शिव. नाद अर्थात शिव और बिन्दु अर्थात शक्तियुक्त सबकुछ शिव स्वरूप है.

शिव में इकार शक्तिरूप है. इकार के बिना शिव शक्तिहीन होकर शव मात्र रह जाता है. आधार में ही आधेय का समावेश होता है. यही सकलीकरण है. इस सकलीकरण की स्थिति से ही सृष्टिकाल में जगत का प्रादुर्भाव होता है.

शिवलिंग ‘नाद तथा ‘बिन्दु का ही स्वरूप है. इसी कारण सभी पंथों के समान रूप से नादजनेऊ नामक विशेष जनेऊ धारण करते हैं. इसी नाद को वेदों, उपनिषदों और अन्य ग्रन्थों में ‘सोहं और ‘शब्दब्रह्म’ कहा गया है.

(क्रमश:)

– योगी हरिहर नाथ

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