‘सत्या वचन’ : किसे और क्यों तकलीफ है नोटबंदी से!

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबन्दी के फैसले के बाद कुछ लोगों द्वारा समाज में उभरी जिस तरह की हाय हत्या का दावा किया जा रहा है, समझते हैं उसकी हकीकत क्या और कैसी है।

इसे समझने के लिये भारतीय समाज को तीन खंड में अलग करके देखते हैं.
1. भारतीय ग्रामीण समाज, 2. छोटे शहर, 3. मेट्रो सिटीज़/महानगर

ग्रामीण समाज में जो हिस्सा किसान, मजदूरों का है… वो कभी 1000 / 500 के नोटों पर निर्भर नहीं रहा…

उसकी रोजाना आमदनी खींच-तान कर भी 200 रूपये से ऊपर नहीं होती… इस वर्ग के लोगों की समस्यायों का लेना-देना नोटबन्दी से कत्तई नहीं…. इनकी समस्यायें वही हैं जो पहले थी….

इसी समाज का दूसरा हिस्सा है सरकारी अध्यापकों या बैंक कर्मचारियों जैसे छोटे मोटे सरकारी नौकरों का. समस्या के बावजूद नोटबन्दी के फैसले को इस वर्ग का पूरा समर्थन प्राप्त है.

ये वर्ग टैक्स भरता है और काला धन जमा ना कर पाने की कसक और काले धन वालों से जलन जैसी मजबूत वजहें इनके पास मौजूद हैं.

भारतीय समाज में भ्रष्टाचार ना कर पाने वाले भ्रष्टाचार कर सकने वाले के प्रति बैर भाव रखते हैं।

इसी समाज में तीसरा वर्ग है राजनैतिक गुंडे-बदमाशों, माफियाओं और ठेकेदारों का…. जिनकी रोजी-रोटी काले धन पर निर्भर होती है… ग्रामीण क्षेत्रों में नोटबन्दी से इस वर्ग पर ही वज्रपात हुआ है…

अब बात करतें हैं छोटे शहरों की… यहाँ भी लेबर मजदूर और सरकारी कर्मचारी इस फैसले से अप्रभावित हैं…

प्रभावित हुआ है व्यापारी वर्ग… जो पिछली सरकारों की नीतियों की वजह से भ्रष्ट तरीकों से व्यापार करने को मजबूर था…

व्यापार को भ्रष्टाचार मुक्त, सफेद बनाने के लिये सरकार द्वारा लिये गये फैसले को ये अभी हजम नहीं कर पा रहे…

इन्हें रास्ते पर आने में वक़्त लगेगा जब इन्हें इस फैसले के दूरगामी सकारात्मक प्रभाव नजर आने लगेंगे….

तब तक सरकार को इन्हें यकीन दिलाते रहना होगा कि वर्तमान सरकारी नीतियां ऐसी हैं जिससे ईमानदारी से व्यापार करने पर भी ज्यादा सुगम तरीके से मुनाफा कमाना सम्भव है, वो भी पहले से ज्यादा.

इन शहरों के लोग समाज में आपस में एक दूसरे से भावनात्मक रूप से अभी भी जुड़े हुये हैं. एक-दूसरे के अच्छे बुरे में काम आते हैं. जैसे-तैसे इनका भी काम चल रहा. भूखों नहीं मर रहे.

अंत में बचते हैं दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद, बैंगलुरू जैसे बड़े महानगर…. यहाँ सबसे बड़ी आबादी बसती है अच्छी सैलरी पर प्राइवेट जॉब करने वालों की.

नोटबन्दी के फैसले से इनकी आधारभूत जरूरतें नहीं बल्कि इनकी लक्जरी प्रभावित हुई है.

लोग बड़े शहरों की ओर लक्जरी कमाने के लिये ही कूच करते हैं. यहां तक कि महानगरों के लेबर मजदूरों के लिये भी थोड़ी बहुत लक्जरी कोई बहुत बड़ी बात नहीं.

महानगरों के समाज में लोग एक-दूसरे से बिल्कुल मतलब नहीं रखते. इसीलिये यहाँ के लोग सबसे ज्यादा दिक्कत में हैं. फिर भी रोजी रोटी की दिक्कत नहीं है.

दिक्कत लक्जरी की है… लेकिन यहाँ के सरकारी अफसरों, पत्रकारों, बिल्डर्स, बड़े भ्रष्ट व्यापारियों और राजनैतिक दलालों पर तो जैसे वज्राघात ही हो गया है.

इन लोगों की लक्जरी का स्रोत ही काला धन था और आदत ऐसी हो गयी है कि ये बिना लक्जरी के वैसे ही बिलबिलाते हैं जैसे दूध का भूखा दुधमुंहा बच्चा…

लक्जरी इनका शौक नहीं इनकी जरूरत बन चुकी है और नोटबन्दी के फैसले के बाद सबसे ज्यादा चिकिर-चिकिर यही लोग कर रहे…

इन्ही को नोटबंदी का फैसला तुगलकी फरमान लग रहा…. यही लोग इसकी तुलना आपातकाल से कर रहे…

शेष 95% भारतीय जनता, जो ऐसे लोगों से सौतिया डाह रखती है… नोटबन्दी के फैसले पर सरकार को उसका मजबूत समर्थन मिल रहा है.

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