जीवन के रंगमंच से : मोक्ष

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WOMEN

मध्यम वर्ग की औरतें हमेशा मध्यम मार्गी होती हैं, इसका सबसे सही उदाहरण देखना हो तो सड़क पर किसी महिला को गाड़ी चलाते हुए देखिये. वो कभी भी दायें या बाएं गाड़ी नहीं चलाती, हमेशा सड़क के बीचो बीच चलाती है.

फिर लाख कोई पीछे से हॉर्न देता रहे वो अपनी दुनिया में ही मस्त रहती है, क्योंकि वो गाड़ी चलाते हुए भी सोच रही होती है, कैसे इस बार खर्च को नियंत्रित किया जाए ताकि आवश्यक वस्तुएं भी आ जाए और बचत भी हो जाए.

बिलकुल वैसे ही जैसे वो अपनी भावनाओं को नियंत्रित किये रहती है कि आवश्यकता की पूर्ति भी हो जाए और वो अपनी भावनाओं को बचे हुए रुपयों की तरह घरवालों की नज़र से बचाकर दिल के किसी डिब्बे में छुपाकर रख दे, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उसका “सदुपयोग” कर सके.

मध्यम वर्ग की औरतें हमेशा मध्यम मार्गी होती हैं, इसलिए वो बहुत अधिक रूढ़िवादी भी नहीं होती और बहुत अधिक आधुनिक भी नहीं. साड़ी से उधड़ी फॉल में पाँव न फंस जाए इसलिए अपने हाथों से तुरपन करके अच्छे से इस्त्री कर फिर से उसे चकाचक कर देती है, टूटी चप्पल को मोची से ऐसे टांका लगवाती है कि किसी को पता न चले….

बिलकुल वैसे ही जैसे उधड़ी हुई किस्मत में भी करीने से तुरपन कर चकाचक कर लेती है. ऊपर से देखने पर पता ही नहीं चलता किसी को कि कहीं से कुछ उधड़ गया है… सिवाय उस औरत के और उन जैसी तमाम औरतों के जो ऐसे ही तुरपन करके काम चलाती हैं.

मध्यम वर्ग की औरतें हमेशा मध्यम मार्गी होती हैं, सब्ज़ियों का मोलभाव करना खूब आता है… 40 रूपये किलो की सब्ज़ी को खींच खांच कर 25 रुपये में 750 ग्राम तक ले ही आती हैं…

वैसे ही जैसे पति की किसी डिमांड को 40 मिनट से कम कर 25 मिनट पर ले आती है… और बाकी के 15 मिनट को सहेज कर रख लेती है बिस्तर की चादर के साथ कि जब मन न हो तब भी डिमांड पूरी करना हो तो काम आ जाएगा यह 15 मिनट का समय…

मध्यम वर्ग की औरतें हमेशा मध्यम मार्गी होती हैं, जिसके आईने में हमेशा प्रतिबिम्ब सोलह से पैंतीस वर्ष की बीच की उम्र का ही बनता है … न उससे कम न उससे अधिक.

इसलिए सोशल मीडिया पर जब कोई औरत अपनी तस्वीर लगाती है, तो उसे उसी तरह से देखो जैसे वो देखती है खुद को… किसी के सपनों की राजकुमारी सी… जिसे किसी भी कीमत पर रात बारह बजे से पहले अपने घर लौट आना है वरना उसका असली रूप प्रकट होने लगता है….

फिर वो अपनी सेंडिल जानबूझकर अपनी प्रोफाइल में छोड़ आती है, ताकि उसको खोजता हुआ एक दिन उसका सपनों का राजकुमार उसकी फेसबुक आईडी तक आएगा….

बस कहानी यहीं ख़त्म हो जाती है… इससे कम और इससे अधिक पर नहीं जाती … क्योंकि मध्यम वर्ग की औरतें हमेशा मध्यम मार्गी होती हैं…. वो अपने प्रेम प्रसंगों के साथ गृहस्थी के लिए भी उतनी ही समर्पित होती है….

मध्यम वर्ग की औरतें हमेशा मध्यम मार्गी होती हैं, इसलिए उसकी कवितायेँ भी बड़ी अजीब होती है, ना वो ग़ज़लों के किसी मीटर पर खरी उतरती है, ना किसी आधुनिक कविता के तर्ज़ पर…

वो सिर्फ उपलब्ध शब्दों के साथ अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करके ही खुश हो लेती है… उसे कोई बहुत महान कवियित्री भी नहीं बनना होता, न गंवार औरतों में गिना जाना पसंद है…. “बस यूं ही लिख दिया” के तर्ज़ पर वो औसतन वाहवाही बंटोर ही लेती है….

मध्यम वर्ग की औरतें हमेशा मध्यम मार्गी होती हैं, इसलिए वो साहित्य और दर्शन पर गहन अध्ययन करती हैं, धार्मिक ग्रंथों, आध्यात्मिक किताबों के साथ दोपहर के खाली समय में गुलशन नंदा के उपन्यास भी पढ़ लेती है तो कभी सास बहू के सीरियल टीवी पर देख लेती है…

अच्छा ही है औरतें मध्यम मार्गी बनी रहे, तभी तो संतुलन बना रहेगा प्रकृति का, पृथ्वी बनी रहेगी अपनी धुरी पर, मौसम अपने औसतन समय के लिए बने रहे…. क्योंकि अतिशयोक्ति हमेशा से विकृत रही है…. कभी बाढ़ के रूप में, कभी सूखे के रूप में…

औरत, प्रकृति का खुशगवार मौसम है, जिससे धरती हरी रहती है और आसमान नीला, नदियों का पानी अपने पूर्ण यौवन के साथ बहता है, बसंत, सावन और पतझड़ पर कविताएँ प्रस्फुटित होती हैं…

मध्यम वर्ग की औरतें मध्यम मार्गी रहकर भी मोक्ष को प्राप्त हो पाती हैं… वह किसी आधुनिक औरत की अतिश्योक्ति की तरह अपने देह से कपड़े कम नहीं करती…

बस यूं ही मध्यम मार्ग पर चलते चलते ही उस अवस्था को प्राप्त कर लेती है… जिसे कोई अक्का महादेवी या मायम्मा देवी पा लेती है… जिनकी देह से कपड़े अपने आप छूट जाते हैं… उनकी देह और आत्मा में इतना अधिक एकाकार हो जाता है कि फिर किसी आवरण की आवश्यकता ही नहीं रहती….

औरत तुम यूं ही मध्यम मार्गी बने रहना….. इसी गृहस्थ आश्रम से एक रास्ता सिद्धाश्रम तक भी जाता है…. जहां जाने के लिए किसी योगी को कठिन तपस्या करना होती है या किसी अघोरी को तांत्रिक विद्या सीखनी पड़ती है….

…..औरत तुम वही मध्यम मार्गी हो जिसकी देह के मध्यम बिंदु के आगे परमात्मा भी नतमस्तक है….

– माँ जीवन शैफाली

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