श्री एम : आप में शिष्यत्व है तो प्रकृति का गुरुत्व प्रकट होगा ही

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Sri M Himalayin Guru Ke Saye Me
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आप में यदि शिष्यत्व है तो प्रकृति का गुरुत्व प्रकट होगा ही, और इसी गुरुत्वाकर्षण बल से ही  शिष्य बार बार गुरु के चरणों में गिर पड़ेगा.

कुछ ऐसा ही मेरे साथ अक्सर होता है, गुरु बनने की मेरी कोई चाह नहीं है… शिष्य बने रहने में मुझे अब रस आने लगा है. ये जानते हुए कि जब तक ये रस रहेगा तब तक मेरे और प्रकृति के सम्बन्ध को लेकर उठने वाले प्रश्न रह रहकर मेरे मन को विचलित करते रहेंगे.

लेकिन प्रसन्नता अपने उत्कर्ष पर तब होती है जब हर बार प्रकृति गुरु बनकर मेरी समस्या को न सिर्फ सुलझाती है बल्कि मुझे ज्ञान के उस स्तर तक ले जाती है जहां प्रश्न कम नहीं होते हाँ प्रश्नों का स्तर अवश्य उठ जाता है.

ऐसी ही किसी समस्या से घिरकर मैं बार बार स्वामी ध्यान विनय को उल्हाना देती हूँ… बहुत परीक्षा ले चुके आप “लोग”, अब नहीं आऊँगी आप “लोगों” के झांसे में. हर बार आप “लोग” मुझे समस्या की तपती भूमि पर खड़ा कर देते हैं, और हर बार खुद ही समाधान की भीनी बौछारों से भिगो भी देते हैं.

ध्यान विनय हर बार मुस्कुरा देते हैं, देवि! मैं कुछ नहीं करता… समस्या भी आप ही की खड़ी की हुई होती हैं, और समाधान भी आप ही खोज लाती हैं, मैं तो बस माध्यम मात्र हूँ जो आपकी उस विशेष भाव भूमि पर बीज छिड़क देता हूँ. बीज तो उर्वर भूमि पर ही उगते हैं ना, वरना पत्थर पर कितने ही बीज डालते रहो कहाँ पनप पाते हैं.

ये जो ध्यान विनय से बात करते हुए आप के साथ “लोगों” लगाती हूँ जानते हैं किसके लिए हैं, ये उन तमाम गुरुओं के लिए हैं जो कभी शरीरी रूप में कभी अशरीरी रूप में स्वामी ध्यान विनय के माध्यम से या उनके साथ मिलकर मेरी आध्यात्मिक यात्रा को जारी रखे हुए हैं.

ध्यान विनय के माध्यम या उनके साथ मिलकर इसलिए कहा क्योंकि ध्यान विनय खुद मेरे लिए आज तक रहस्य बने हुए हैं, इसलिए निश्चित रूप से मैं भी नहीं जानती किस तरह.

जब मैं उनके साथ “लोगों” की बात करती हूँ तो मेरा तात्पर्य ओशो, श्री एम, सद्गुरु सहित उन तमाम अशरीरी लोगों से होता है जिनको स्वामी ध्यान विनय तो देख या अनुभव कर पाते हैं, मैं नहीं.

आप लोगों को लग रहा होगा कि यह आत्म मुग्धता की पराकाष्ठा है जो मैं खुद को इतना महत्वपूर्ण बता रही हूँ कि जैसे ये सब लोग अपना काम छोड़कर मेरे मार्गदर्शन के लिए  ही तो इतने फुर्सत में बैठे हैं.

तो इस प्रश्न के उत्तर में सद्गुरु की ही एक बात का ज़िक्र करना चाहूंगी जो आजकल मेरे मन में उठे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए जब तब प्रकट हो जाते हैं.

सद्गुरु का लेख –

जब कौरवों ने भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरण करने की कोशिश की, उस समय कृष्ण वहां मौजूद नहीं थे। उन्हें इसकी जानकारी भी नहीं थी। क्योंकि जब वह राजसूय यज्ञ में जाने वाले थे, तो एक राजा शाल्व, जो उनसे ईर्ष्या करता था, ने आकर द्वारका पर धावा बोल दिया।

उसने अपने आदमियों के साथ मिलकर लोगों को मारा और घरों, पशुओं और हर चीज में आग लगा थी। जो यादव बचकर निकल पाए, वे पहाड़ों पर जंगलों में जाकर छिप गए। उस पर हद यह हो गई कि शाल्व ने कृष्ण के पिता वासुदेव का अपहरण कर लिया।

जब कृष्ण वापस द्वारका पहुंचे, तो सारा शहर जल कर नष्ट हो चुका था और बचे हुए लोग पहाड़ों में छिपे हुए थे। जब उन्होंने कृष्ण को देखा, तो वे नीचे उतर आए। कृष्ण ने अपने समुदाय को फिर से संगठित और स्थापित किया, शहर का पुनर्निर्माण किया और अपने पुत्र को अपने अपहृत पिता को छुड़ाकर लाने के लिए भेजा। चूंकि वह इन चीजों में व्यस्त थे, तो उन्हें यह पता ही नहीं चला कि हस्तिनापुर में क्या चल रहा है।

अगर कृष्ण को द्रौपदी की दुर्दशा के बारे में पता तक नहीं था, तो उन्होंने उसकी रक्षा कैसे की? द्रौपदी की रक्षा का चमत्कार कैसे हुआ। इसका संबंध कृपा से है। लोग लगातार मुझसे पूछते हैं – कुछ विनम्रता से, कुछ व्यंग्य से और कुछ आरोप लगाने वाले अंदाज में – ‘कृपा कैसे काम करती है?’ कृपा के काम करने के लिए जरूरी नहीं है कि आपके साथ जो हो रहा है, मुझे उसकी जानकारी हो।

शांभवी महामुद्रा जैसी किसी आध्यात्मिक प्रक्रिया में दीक्षा के माध्यम से ऊर्जा का एक खास निवेश किया गया है, जो कृपा के रूप में काम करता है। अगर मैं इस बारे में जागरूक होना चाहूं कि किसी के साथ क्या हो रहा है, तो मैं जागरूक हो सकता हूं। मगर ज्यादातर समय, मैं जागरूक नहीं होना चाहता क्योंकि बहुत सारी चीजें एक साथ चल रही होती हैं। जो लोग ग्रहणशील हैं, उन्हीं के लिए कृपा काम करती है। जो लोग ग्रहणशील नहीं हैं, उन पर कृपा का असर नहीं होता।

ऐसा बिल्कुल भी जरूरी नहीं है कि जिसके जरिये कृपा काम कर रही है, उसे मानसिक तौर पर जानकारी हो कि क्या घटित हो रहा है।

तो बस इसी तरह से कृपा हम सब पर काम करती हैं, चूंकि मैं इसे जादू कहकर अचंभित होती रहती हूँ, प्रसन्न होती हूँ अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए अपना मार्ग प्रशस्त करती हूँ इसलिए प्रकृति को भी मुझे अचंभित करने में आनंद मिलता है.

तो कभी ओशो, कभी श्री एम, तो कभी सद्गुरु तो कभी कई अन्य अशरीरी लोग जिनको मैं नाम से नहीं जानती मुझ पर कृपा बरसाते रहते हैं. अब मैं ये दावे के साथ नहीं कह सकती कि स्वामी ध्यान विनय इन सब बातों से अनभिज्ञ रहते हैं. पूछने पर वो बताते नहीं, और जो उनको बताना होता है वो मुझे पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती.

जैसे कुछ दिनों पहले मामूली बुखार से उठी तो शरीर तो उठ गया मन से उठ नहीं पा रही थी, निराशा के गर्त में धंसी जा रही थी, स्वामी ध्यान विनय भी अनजान नहीं थे इस स्थिति से, लेकिन उनकी तरफ से भी कोई सकारात्मक प्रयास नहीं दिख रहा था, बल्कि कई बार उनको मुझे इस निराशा में धकेलते हुए ही पाया.

फिर खबर आई आज़म खान ने योगी आदित्यनाथ पर विवाह को लेकर कुछ तंज कसा है. कुछ बातें ऐसी होती है जिनका आपसे कोई लेना देना नहीं होता लेकिन वो आपको अन्दर तक उद्वेलित कर देती है. ऐसे में आज़म खान को योगी के लिए दिया बयान मुझे पता नहीं क्यों बहुत गहरे में चुभ गया.

मैंने योगी के बारे में इन्टरनेट पर जानकारी हासिल की उन पर लेख लिखा, प्रकाशित किया. उसी से पता चला योगी गोरखनाथ परम्परा के हैं, चूंकि श्री एम भी उसी परम्परा के हैं तो गोरखनाथ के बारे में जानने की उत्सुकता प्रबल हुई और जानकारी हासिल करने के लिए फिर इन्टरनेट का सहारा लिया…

और जैसा कि आजकल कहती हूँ कि सद्गुरु जब तब मार्ग दर्शन देने चले आते हैं, तो सामने सबसे पहला लेख उन्हीं का पाया. गोरखनाथ परम्परा और बाबा गोरखनाथ पर बहुत रोचक बातें उन्होंने बताई. लेकिन जिस बात पर मैं अटक गयी वो यह है –

नाथ परंपरा साधना की तीव्रता पर जोर देती हैं. उन लोगों ने इंसान के मनोवैज्ञानिक पहलू की बिल्कुल चिंता नहीं की, क्योंकि उनका मानना था कि मनोवैज्ञानिक पहलू इंसान का बेहद सूक्ष्म और दुर्बल हिस्सा है.

उनका पूरा काम एक अलग स्तर पर है. वे जीवन-ऊर्जा को पूरी तरह से अलग आयाम में ले जाते हैं. इन परंपराओं में इस बात की कभी परवाह नहीं की गई कि इंसान को खुशहाल और प्रेममय कैसे बनाया जाए.

बस यह पढ़ते ही जो सबसे पहला ख़याल आया वो मैंने स्वामी ध्यान विनय को कहा कि मुझे शक़ है कि आप भी ज़रूर योगी और श्री एम की तरह नाथ परम्परा के हैं… क्योंकि वो अक्सर कहते हैं – “मैं यहाँ किसी की अपेक्षा को पूरा करने नहीं आया हूँ… I am very difficult man to live with….

इस पूरी प्रक्रिया में निराशा वाली भावभूमि या जब भी कोई बात समझाना होती है उसके पहले स्वामी ध्यान विनय द्वारा बनाई भाव भूमि ब्लैक बोर्ड की तरह काम करती हैं, जिस पर सफ़ेद चॉक से लिखा हुआ बिलकुल साफ़ और स्पष्ट शब्दों में उभरकर आता है.

इसे शायद हिमालय वासी गुरु के साए में पुस्तक से श्री एम को उनके गुरु द्वारा कही गयी बात से समझा जा सकता है-

“उपनिषद” शब्द “उप” धातु से उपजा है जिसका अर्थ होता है पास, निकट. इसका आशय यह है कि उपनिषद उन लोगों द्वारा समझा जा सकता है जो गुरु के निकट बैठते हैं या जो एक “बहुआयामी” सत्य को समझने की प्रक्रिया में गुरु के साथ घनिष्ठता से जुड़े होते हैं. यह समझ एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में व्यंजित नहीं किया जा सकता क्योंकि मस्तिष्क तो सीमित आयाम में काम करता है.

मैं जानती हूँ श्री एम के गुरु की यह बात इस बात की पुष्टि कर रही है कि मैं जिन आयामों पर इन “लोगों” द्वारा ले जाई जाती हूँ और जो भी परिक्षण मुझ पर होते हैं, मैं इस लेख द्वारा समझाने में असफल हुई हूँ.

स्वामी ध्यान विनय ठीक ही कहते हैं He is really very difficult man to live with.

और यह भी पूर्ण सत्य है कि आप में यदि शिष्यत्व है तो प्रकृति का गुरुत्व प्रकट होगा ही, और इसी गुरुत्वाकर्षण बल से ही  शिष्य बार बार गुरु के चरणों में गिर पड़ता है…. मेरी तरह…

  • माँ जीवन शैफाली

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