विमुद्रीकरण, सरकार और दंगे

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सोशल मीडिया पर चर्चा है कि विमुद्रीकरण के कारण दंगे हो सकते हैं, कुछ लोगो ने संभावित दंगा स्थलों की सूची भी देने का प्रयास किया है, तो कुछ लोगो ने ये भी बताया है कि इन स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था कम है. (अतः दंगा करने में आसानी है)

सुप्रीम कोर्ट के सवालों की आड़ लेकर लोग अपनी खुन्नस स्वतंत्र भारत के सबसे महत्वपूर्ण फैसले के विरोध के रूप में माननीय प्रधानमंत्री जी का विरोध कर रहे हैं.

मोदी जी का विरोध करते-करते ऐसे लोग कब देश विरोधी हो गए उन्हें खुद ही नही पता.

विरोध में आम आदमी का बार-बार उल्लेख किया जा रहा है.

कौन है ये आम आदमी?

वही आम आदमी जिसका वोट मिलने के बाद नेता कभी उसके गाँव, मोहल्ले या जिले में भी दिखाई नही पड़ता?

वही आम आदमी जिसे अपने छोटे से छोटे काम के लिए भी बड़ी से बड़ी रिश्वत देनी पड़ती है.

वही आम आदमी जिसको पैदा होने के लिए भी लाइन में लगना पड़ा था और मरने के बाद जलने/दफन होने के लिए भी अपनी बारी का इन्तजार करना पड़ता है.

हाँ तो बात आती है लाइन में लगने की..

पैदा होने के लिए सरकारी अस्पतालों की लाइन में लगें तो कभी टीकाकरण की लाइन, बड़े हुए तो कभी विद्यालय की लाइन तो कभी वजीफे की लाइन, उसके बाद कभी राशन की लाइन तो कभी मिट्टी के तेल/केरोसिन आयल की लाइन तो कभी गैस सिलेंडर की लाइन में लगना पड़ा.

जब मतदाता पहचान पत्र बनवाने गए तो वहां भी लाइन, बैंक में खाता खुलवाने गए तो वहां भी लाइन. आधार कार्ड बनवाया तो उसमें भी लाइन सिनेमा देखने गए तो उसमें भी लाइन.

लैपटॉप बंटा उसमें भी लाइन, साइकिल बंटी उसमें भी लाइन. मतदान करने गए तो उसमें भी लाइन बेरोजगारी भत्ता लेने पहुंचे तो उसमें भी लाइन.
और तो और अभी जब जियो सिम बटा तो भी लम्बी लाइन में लगकर ही लिया.

तो भैया आज तक हर आम आदमी ने अपना हर काम शांतिपूर्वक लाइन में लगकर ही करवाया है. छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो किसी भी ऐसी लाइन में तब तक दंगे नहीं हुए जब तक दंगाइयों ने जबर्दस्ती दंगे नही कराएं.

क्या आम आदमी के पास इतनी शक्ति होती है कि वो दंगा करे? जो घर में अपने माँ-बहन-बीवी-बच्चों को छोड़कर यहाँ लाइन में लगा है वो अपना काम निपटाएगा या दंगा करेगा?

‘देश में दंगे होने वाले हैं’, ‘जनता बहुत आक्रोश में है’, ‘सब के सब बहुत परेशान हैं’, ‘लोग मर रहे हैं’ आदि इस तरह की ऊल-जुलूल पोस्ट डालने वाले ये भूल जाते हैं कि मोदी विरोध करने के चक्कर में वो देश का विरोध कर रहे हैं.

आप मोदी जी से सहमत नहीं, एक व्यक्ति के तौर पर आप उनका विरोध करने के लिए स्वतंत्र हैं, पर देश के आम आदमी का नाम लेकर देश में दंगे भड़काने का आप को कोई अधिकार नहीं है.

आप लोग अपनी कलम का दुरूपयोग क्यों कर रहे हैं.

देश में दंगे होने वाले हैं, गलियों में दंगे होने वाले हैं ऐसा लिखकर आप दंगाइयों को आमंत्रित कर रहे हैं कि आओ और मोदी विरोध में दंगा करो.

संवेदनशील इलाकों की जानकारी देकर दंगाइयों का काम और आसान किया जा रहा है कि हाँ भाई यहाँ आकर दंगा करो यहाँ पुलिस और सेना को पहुँचने में बहुत समय लगेगा.

8 नवंबर की रात को विमुद्रीकरण का फैसला लिया गया था तब से आज 19 नवंबर यानी 11 दिन हो गए किसी भी प्रकार की कोई अप्रिय घटना नहीं घटी जो कि इस बात का सबूत है कि लाइन में लगने वाला हर व्यक्ति देश हित में लिए गए इस फैसले का समर्थन करता है और जो छिटपुट घटनाएं हुई भी है वो सामान्य दिनों के जैसी ही हैं.

फिर भी यदि आपको मेरी बात का विश्वास नहीं तो जाइये किसी बैंक की सबसे लंबी वाली लाइन में और चिल्लाकर मोदी जी को गाली देकर देखिये, लाइन में सबसे आगे खड़े व्यक्ति से लेकर सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक सब आपको बारी-बारी से कूटेंगे, फिर भी यदि आप बच गए तो बैंक स्टाफ जो कि सुबह से शाम तक लगातार परेशान हो रहा है वो भी आप पर अपना हाथ साफ कर जाएगा.

और फिर सब सामान्य हो जायेगा लोग फिर से लाइन में लग जायेंगे.
देश की अर्थव्यवस्था में कोढ़ बन चुकी इस समस्या से निजात पाने के लिए इस चिकित्सा की बहुत आवश्यकता थी.

जब भी पुराने सड़े हुए घाव पर शक्तिशाली दवा डाली जाती है तो भयंकर जलन मचती है और उसी जलन से छटपटा कर गंदगी और कीड़े बाहर आते है.

ये वही कीड़े है जो विरोध में बोल रहे हैं.

क्योंकि इनकी ऐशगाह, आरामगाह और हराम की जमाखोरी पर हमला हुआ है ये लोग कैसे वर्षों से गरीबों का खून चूस-चूसकर इकठ्ठा किया हुआ माल अपने हाथ से जाने देंगे?

हज़ारों-लाखों करोड़ की बात है. अगर कुछ करोड़ दंगो के लिए खर्च भी कर दिए जाएं तो क्या फर्क पड़ेगा इन पर? पर ये चाहकर भी ऐसा नहीं कर पा रहे. जानते हैं क्यों?

क्योंकि इनके पास दंगा कराने के लिए जो धन उपलब्ध है वो तो मिट्टी हो चुका है. यदि मोदी जी मुद्रा को तत्काल प्रभाव से न बंद करते तो ये लोग देश को अब तक दंगों की आग में झोंक चुके होते.

कश्मीर की शांति इस बात का प्रतीक है कि यही नोट घाटी में उपद्रव करने के लिए अलगाव वादियों में बांटे जाते थे. उन्हें नोट मिलना बन्द तो उनका उपद्रव करना भी बंद.

मैं मानता हूँ कि पैसों की कमी के चलते बहुत सी समस्याएँ हो रही हैं.
किसी के घर शादी है तो किसी के घर कोई बीमार है. परंतु इन समस्याओं का सामना मिल-जुल के किया जा सकता है.

धन की कमी का सामना आपसी सहयोग से संभव है परंतु भ्रष्टाचार के विरूद्ध युद्ध बिना सरकार के सहयोग से संभव नहीं.

समस्या मुझे भी है समस्या आपको भी है परंतु कुछ दिनों की समस्या से यदि हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो जाए तो क्या ये हमारे लिए बेहतर विकल्प नही होगा?

यही एक मात्र विकल्प बचा है हमारे पास.

देश की सबसे बड़ी पार्टी ने हम पर लगभग 70 वर्ष तक शासन किया पर क्या कभी उन्होंने देश हित के लिए ऐसे कड़े कदम उठाएं? खैर मैं यहाँ उनकी बुराई के लिए नहीं बल्कि आप सभी से सहयोग अपेक्षित करता हूँ.

मेरे जो मित्र कलम के धनी हैं उनसे भी मैं आग्रह करता हूँ कि अपनी कलम की शक्ति का जौहर दिखाएं और देश हित के लिए लिखें.

भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस युद्ध में हम माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के साथ हैं.

*भारत माता की जय*

– आकाश

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