विमुद्रीकरण : फैलाना ही हो तो अफवाहों की बजाय सच फैलाइये

विमुद्रीकरण (नोटबन्दी) के बाद नए आये दो हज़ार और पांच सौ की नोटों के बारे में अवसादी और विलोमी मानसिकता के नारेबाज़ों को हमने देखा है.

नारेबाज़ी के नाम पर ‘चूरन वाले नोट’ जैसे जुमले और फर्ज़ी अफवाहें फैलाने के सस्ते उपाय भी किये जाने की बातें सोशल मीडिया में हम सभी ने देखी हैं.

कुछ मानसिक दिव्यांगों को ऐसा अभी भी करते देखा जा सकता है.

आइये जानें, स्याही (रंग) छोड़ने वाले इस प्रिंटिंग तकनीकी की सच्चाई और इसका सुरक्षित होने की कहानी क्या है.

सील प्रिंट या इंटैग्लियो प्रिंट, आरबीआई द्वारा जारी किए गए नोटों में गांधीजी की तस्वीर, अशोक चक्र, आरबीआई गवर्नर के हस्ताक्षर व सील और गारंटी व प्रॉमिस क्लॉज़ उभरी हुई इंक में प्रिंट किए जाते हैं.

इन्हें छू कर महसूस किया जा सकता है. ये सभी यदि किसी नोट में छूने से उभरे हुए ना लगें तो नोट नकली हो सकता है.

आइये देखें…. इस अति सुरक्षित और नकल की न के बराबर संभावना वाली प्रिंटिंग विधि का इतिहास क्या है?

लगभग मध्य युग के बाद या उससे भी पहले से यूरोप में धातु की चीजों जैसे कि बंदूकें, कवच, कप और प्लेटों में सजावट के क्रम में सुनारों और अन्य धातु-कर्मकारों द्वारा एचिंग प्रचलित थी.

वैसे भी जर्मनी में कवच की अलंकृत सजावट एक ऐसी कला थी जो संभवतः 15वीं सदी के अंत के आस-पास – एचिंग के एक प्रिंट तैयार करने वाली तकनीक के रूप में विकसित होने से कुछ समय पहले, इटली से लाई गयी थी.

माना जाता है कि प्रिंट तैयार करने में उपयोग की जाने वाली प्रक्रिया के रूप में इसका आविष्कार ऑस्बर्ग, जर्मनी के डेनियल होफर [Daniel Hopfer (लगभग 1470-1536)] द्वारा किया गया था.

होफर एक शिल्पकार थे जिन्होंने कवच को इस तरीके से अलंकृत किया था और लोहे की प्लेटों का उपयोग करते हुए इस विधि का प्रिंट तैयार करने में प्रयोग किया था, जिनमें से कई आज भी मौजूद हैं.

आशा है, इन तकनीकी और तथ्यात्मक जानकारियों के बाद राजनैतिक विरोध के अवसाद में मुहर्रम मनाते तमाम गिरोहों को अपनी शर्म धोने के लिए पर्याप्त पानी नसीब होगा.

विरोध करना ही हो तो, विरोध के नारों को एक स्तर का बनाइये, फैलाना हो तो अफवाहों की बजाय सच फैलाइये.

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