विपक्षी सांसद के मन की बात, सच जानेंगे तो चौंधिया जाएंगे!

मिथिलेश कुमार जी का सत्य अनुभव है.. उनका ही लिखा हुआ है.

पवन जी, मेरे एक पत्रकार मित्र हैं *** न्यूज़ चैनल में वि** भ***, कल संसद के अनुभव को आप के साथ शेयर कर रहा हूँ.

आज संसद के शीतकालीन सत्र का दूसरा दिन है… पहली मंजिल पर हम कुछ पत्रकार आपस में बाते कर रहे थे तभी वहां एक सांसद आ पहुंचे. वे संसद की SBI ब्रांच से पैसे निकालने आये थे.

हम भी नोटबंदी पर बात कर रहे थे, सो वे भी उसमे शामिल हो गए. हाल ही में उनके राज्य को बने 16 बरस पूरे हुए हैं. उनकी पार्टी विपक्ष में है और सरकार की नोटबंदी की योजना के खिलाफ है.

अब उनके साथ बातचीत का ब्यौरा यहाँ लिख रहा हूँ. ये इसलिए क्योंकि बातचीत पूरी तरह ऑफ रिकॉर्ड है और इसको मैं उनके नाम से रिपोर्ट नहीं कर सकता.

सवाल – आप क्या सोच रहे हैं इस योजना पर निजी तौर पर?

जवाब – मोदी की नोटबंदी की योजना के साथ हैं, लेकिन राजनीतिक मज़बूरी है, इसलिए इस योजना का विरोध कर रहे हैं. योजना तो हम जैसे गरीब सांसदों के लिए अच्छी है.

मैं तो दुर्घटना से सांसद बन गया. हमारी पार्टी के एक-एक MLA ने तीन-तीन प्रत्यशियों से पैसा ले रखा था लेकिन सीबीआई की रेड हुई और सब MLA डर गए और मैं राज्य सभा चुनाव जीत गया.

सवाल – क्या राजनीतिक मज़बूरी है?

जवाब – पैसा नहीं होगा तो चुनाव कैसे लड़ेंगे, क्या कांग्रेस, क्या जदयू, क्या हम, और क्या… यही मज़बूरी है.

सवाल – केजरीवाल की क्या मज़बूरी है?

जवाब – अब आप मुझसे सुनना चाहते हैं तो सुनिए. जो चंदा ब्लैक में मिला था वो तो सब बर्बाद हो गया… अब कौन चंदा देगा.

सवाल – लेकिन वो तो सबसे ईमानदार नेता है, कैसे ब्लैक में चंदा लेंगे?

जवाब – अब बस छोड़िये…. दर्द तो इसी बात का है कि चुनाव कैसे लड़ेंगे केजरीवाल. और अब कौन चंदा देगा उनको.

सवाल – आप इसको ऑन रिकॉर्ड क्यों नहीं बोलते हैं?

जवाब – देखिये ये तो अब तक मैं ****** (अपना नाम लिया) बोल रहा था लेकिन जब ऑन रिकॉर्ड की बारी आयेगी तो मै पार्टी लाइन बोलूंगा और झूठ बोलना पड़ेगा. अब छोड़िये मैं पैसा निकालने जा रहा हूँ.

करीब 15 मिनट बाद वे पैसा निकाल कर आये तो फिर मुलाकात हुई, मैंने उनसे कहा- आपका इंटरव्यू करूंगा.

उन्होंने कहा- किस बात पर?

मैंने कहा – आपकी दिल की बात पर… काला धन पर…

वे बोले – तब तो झूठ ही बोलेंगे.

हम संसद की पहली मंजिल से बात करते हुए नीचे आ गए… कुछ पुरानी बातों को याद करते हुए.

सवाल – हम लोग कभी-कभी सोचते हैं कि क्या वाकई में 10 हज़ार करोड़, 20 हज़ार करोड़… इतना पैसा होता है राजनीतिक दलों के पास?

जवाब – अरे है… 3-4 करोड़ तो आप चिल्लर मानिये. मैं तो चुनाव लड़ा हूँ न, मुझे पता है, आँखों से देखा हुआ है 100-150 करोड़ तो… अपनी आँखों से देखा है.

अब हम संसद के गेट नंबर 4 के बाहर पहुंच चुके थे. यही कैमरा मैन को बुलाया और उनका इंटरव्यू शुरू किया… लेकिन उन्होंने वाकई में दिल की बात ज़बान पर नहीं आने दी…

उन्होंने बड़ी सफाई से अपनी पार्टी का पक्ष रखा… मैंने अपने इंटरव्यू का अंत भी ऐसे ही किया – ‘आप अब पूरे नेता हो गए हैं, दिल की बात ज़बान पर नहीं आने दी आपने’.

वे हँसे और इंटरव्यू ख़त्म हो गया.

कैमरा ऑफ होते ही फिर बोले, अगर दिल की बात ज़बान पर आ जाती तो दिल्ली के चैनल की सभी OB वैन (लाइव करने वाले वाहन) मेरे घर पर डेरा डाल देते.

हंसी ठहाकों के बीच वे अपने घर के लिए निकल लिए… मैं फिर सोचता रहा कि राजनीति और देश नीति में ज़मीन आसमान का अंतर है… और कुछ पार्टियां राजनीति ही करती रहेंगी.

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