श्री एम : परीक्षा में सफल होना महत्वपूर्ण नहीं, कृतज्ञ हूँ परमात्मा ने परीक्षा के लिए चुना

Babba (Osho) Sri M
Babba (Osho) Sri M

बब्बा (ओशो) कहते हैं-
पदार्थ का आकार है,
चेतना का कोई  आकार नहीं..
जैसे ही मूर्ति को प्राण दिया, प्रतिष्ठा हुई,
भक्त ने अपने ह्रदय को मूर्ति में  धड़कते सुना, मूर्ति जीवंत हो जाती है..
एक तरफ आकार रहा और दूसरी तरफ से निराकार का द्वार खुल गया…
अब इस द्वार से यात्रा करने का नाम है पूजा…..

बब्बा ने पूजा को कितने सरल शब्दों में परिभाषित किया, काश परिभाषा के शब्दों से गुज़रना भी उतना ही आसान होता… किसी एक शब्द की परिभाषा के लिए उससे अधिक शब्दों का चुनाव उस चेन रिएक्शन की तरह है जिसकी जानिब सूरज को आग का श्राप मिला है….. जो हम तक आते आते जीवन के वरदान में तब्दील हो जाता है….

हमारी पूजा का प्राण में तब्दील होना भी कुछ ऐसा ही है….

पूजा करने के लिए सामग्री का जुटाना, कंकु, हल्दी, अक्षत, कपूर, दीया बाती, पुष्प, हवन सामग्री….. और एक मूर्ति …. इसी तर्ज़ पर “उस” पूजा के लिए सामग्री का जुटाना….  समय की थाल में कर्म, धर्म, प्रेम, ध्यान, समर्पण, लगन और अगन ही तो है…  और जब सामग्री जुट जाती है तो मूर्ति अपने आप प्रकट हो जाती है… और फिर अपने ही प्राण उसमें प्रतिष्ठित होने लगते हैं….

और केवल पूजा ही क्यों, सामग्री जुटाने के दौरान ह्रदय का भाव विभोर होना, आत्मा का आतुर होना और देह का दहकना, प्राण का व्याकुल होना भी पूजा की तैयारी ही तो है…. यदि तैयारी पूरी नहीं हुई तो मूर्ति कैसे प्रकट होगी और पूजा कैसे सफल होगी…

तो परिभाषा में, शब्दों पर सवार होकर उसके संयोजन की भूल भुलैया को पार करना, अल्पविराम पर कुछ पल के लिए रुकना और पूर्णविराम के आने तक कदमों में तटस्थता बनाये रखना भी तैयारी है उस शब्द को जानने की.

फिर शब्दों की सीढ़ी के बिना उतरना होता है उसके अर्थ में और समझ को देहरी के पार रखकर उस शब्द की ध्वनि को हर उस बिन्दु से अनुभव करना होता है जहाँ परिभाषा लुप्त हो जाती है और मौन का स्वामित्व स्वीकार कर सूरज की भांति आग का श्राप अंगीकार करना होता है ताकि दूसरों को जीवन के इस रस का वरदान मिल सके…

हाँ यह रस ही है… लेकिन ऐसा नहीं है कि इसमें रस आने लगता है तो जीवन के बाकी सारे रस गौण होने लगते हैं… बल्कि जीवन के सारे रस इसी में समाहित हो जाते हैं…

ये जो सूर्य की भांति जलने का श्राप कहा है वो यूं ही नहीं कहा… जो इससे गुज़रता है वही जान सकता है… कि जब मूर्ति में अपने ही प्राणों की प्रतिष्ठा हो जाती है, और भक्त अपने ही ह्रदय को मूर्ति में  धड़कते सुनता है, मूर्ति जीवंत हो कर तरह तरह के रूप धर कर आपके सामने आती है…. जब एक तरफ आकार होता है और दूसरी तरफ से निराकार का द्वार खुल जाता है…. तब पूजा घटित होती है…

बब्बा कहते हैं अब इस द्वार से यात्रा करने का नाम है पूजा….. पूजा मूर्ति को मिटाने की कला है, वह जो मूर्ति है, आकार वाली, उसको मिटाने की कला का नाम पूजा है. मूर्त हिस्से को गिराते जाना है, गिराते जाना है. थोड़ी ही देर में वह अमूर्त हो जाती है.

श्री एम, मैं नहीं जानती बब्बा का ये “थोड़ी देर”, कितना होता है … थोड़े वर्ष या थोड़े जन्म?

तुम्हारे द्वार पर खड़े खड़े ये ‘थोड़ी देर’ … ‘बहुत देर’ हो गयी है… मूर्त और अमूर्त के बीच द्वार पर कब तक खड़ी रहूँ…..

मूर्त से अमूर्त तक के इस द्वार पर ये “थोड़ी देर” सारा जन्म है तो भी मुझे मंज़ूर है… परीक्षा में सफल होना महत्वपूर्ण नहीं है, परमात्मा ने परीक्षा के लिए मुझे चुना उसके लिए कृतज्ञ हूँ…

इस जन्म में मूर्त रूप में तुम्हारे दर्शन पा लिए हैं तो सही राह पर हूँ ये तो निश्चित है. अमूर्त के दर्शन किन आँखों से होते हैं बस ये सिखा देना.

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