International Day of Tolerance : काफी महंगा पड़ता था महात्मा को गरीब बनाये रखना

International Day Of Tolerance
International Day Of Tolerance

भारतीय समाज में देखें तो एक अनोखी सी चीज़ दिखेगी. आपके त्याग को यहाँ बहुत महत्व दिया जाता है. जैसे कि गांधी सिर्फ इसलिए गांधी नहीं होते क्योंकि उनके तरीकों पर चलकर करीब सौ राष्ट्रों ने अपनी आजादी की लड़ाई लड़ी है.

उनका खुद को धन संपत्ति से दूर रखना भी उनके जीवनकाल में उनके सम्मान की एक बड़ी वजह रहा है. जैसा कि उनके बारे में सरोजनी नायडू भी कहती थी, महात्मा को गरीब बनाये रखना काफी महंगा पड़ता था! लेकिन क्या करें त्याग को तप समझने वाले लोग हैं हम लोग.

तप का मतलब ही निकाला जाता है कष्ट सहने की क्षमता. शारीरिक कष्ट झेल जाने को हठ योगी तप की संज्ञा देते हैं. उनके “नौली” क्रियाओं जैसे और भी कई अभ्यास हैं जो बरसों के कष्टसाध्य परिश्रम से ही सीखे जा सकते हैं.

भारतीय बहुओं को इसका ख़ासा अनुभव होता है. सहनशील बहु हमेशा अच्छी मानी जाती है. उसे सास ननद के ताने भी सहने हैं, देवर के कभी तो कभी अन्य ससुराल वालों के नखरे भी, उसे घर के बच्चों की जिद को भी झेलना है, कई बार तो पति के बुरे बर्ताव को भी सहना होता है.

इन सब के साथ ऊपर से समाज उसे सिखाता है कि उसकी सहने की क्षमता ही उसे महान नहीं तो अच्छी बहु का दर्जा दिलाएगी.

जब तक ये लड़की बहु नहीं थी तब उसे नहीं सहना था ऐसा नहीं है. उसे अपने भाइयों, चाचा, ताऊ के तुगलकी फरमानों को सहना था. उसे घर के अन्य सदस्यों के खाना खा लेने तक भूख को सहना था.

कहीं बाहर से वापिस आने पर अपने साथ ही आये भाई को पहले पानी देने तक प्यास को सहना था! यकीन ना हो तो अपने घर आस पड़ोस में अभी भी नजर आ जायेगा, टीवी देखता आदमी बैठे बैठे किसे पानी लाने का हुक्म देता है? बेटे को या बिटिया को?

इतने पे ही हो जाता तो खैर क्या बात थी, उसे किसी मनचले की सीटियाँ भी सहनी थी! पलट के थप्पड़ जड़ना नहीं सिखाया जाता उसे, चुप चाप सह कर घर आ जाने की सलाह दी जाती है !

पुरुषों को समाज ने छोड़ दिया हो ऐसा भी बिलकुल नहीं है. सहने के मामले में उनपर भी कम ध्यान नहीं दिया गया. बचपन से ही चोट लगने पर रोने की बजाये सहना सिखाया जाता है.

बड़े होने पर तो खैर अमिताभ कह गए हैं, “मर्द को दर्द नहीं होता !” क्यों भइये क्यों नहीं होता? किसी ने सही जगह मारा है कभी? अभी पता चल जाएगा कि दर्द कैसा होता है.

घर में पुरुष को हर मामले में नहीं बोलना था, माँ और पत्नी के झगड़े में उसे चाहे किसी पर भी गुस्सा आ रहा हो उसे चुप होकर सहना था, इधर बोला तो “जोरू का गुलाम” उधर बोला तो “अम्मा के ही आँचल में रहते, शादी क्यों की?” पिसते रहो चुप चाप.

अपनी मर्ज़ी से नहीं, कभी माँ बाप, कभी बीवी, कभी बच्चों की मर्ज़ी से करना है, सहना है. अपने शौक दबा कर दूसरों की जरूरतें पूरी करनी है, सहना है.

मगर ऐसे में लोग इंसानी शरीर की बनावट भूल जाते हैं. दर्द ऐसे ही अपने आप नहीं हो रहा होता. दर्द आपका ध्यान आपके शरीर के उस हिस्से पर ले जाता है जहाँ कुछ गड़बड़ी हो रही है और उसे जल्दी ठीक किये जाने की जरुरत है. दर्द इलाज़ मांगता है.

आतंकियों के नकली नोट हों या आधे देश को भूखा रख के बनाया गया नोटों का गद्दा और तकिया, इस से भी उतनी ही दिक्कत होती है. लेकिन इसका इलाज नहीं करना है क्योंकि ये इलाज की प्रक्रिया में तो तकलीफ होगी. इसलिए चुपचाप बर्दाश्त कर लो.

अभी हाल में जब लोगों ने “निर्भया” मामले में और सहने से इनकार कर दिया तो कानून बदले थे. भारत जैसे धीमे राष्ट्र ने भी फ़ौरन दर्द का इलाज़ किया.

भ्रष्टाचार के मामले में जब कांग्रेस ने ढुल मुल रवैया अपनाया तो लोगों ने फिर से सहने से इनकार किया. हालत बेहतर हो रहे हैं, कम से कम प्याज 80 रुपये किलो तो नहीं लेना पड़ता अब.

अभी हाल में जब तथाकथित बुद्धिजीवी लेखकों ने पुरस्कार वापसी की बात करनी शुरू की तो फिर लोगों ने उसके विरोध में आवाज उठाई, राष्ट्रपति भी अब सुनते हैं!

तो ये जो “सहनशीलता” के महान होने का ढोंग है, कम से कम ये तो अब छोड़ना होगा.

बाकि जब मिल के सामने दिन भर हड़ताल करते मजदूर दिन भर अपनी मांगो का नारा लगाते हैं और बात ना सुने जाने पर शाम ढले नारा लगाते हैं “बहुत हुआ सम्मान, तुम्हारी माँ …..” तो सही ही करते होंगे !

International Day of Tolerance? तुम्हारी….

 

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