पहचानो कौन हैं वे!

सौ से कम बड़े कॉर्पोरेट घरानों (ख़रबपतियों) पर बैंक का 12 लाख करोड़ क़र्ज़ है….

यह हम सब जानते हैं कि यह पैसा किसी सरकार, मंत्री या बैंक की अपनी सम्पत्ति नहीं है.

आम जनता की गाढ़ी कमाई के… इन पैसों को किसने इन भ्रष्ट उद्योगपतियों में बांटा था और क्यों??

एक उदाहरण – साल 2006 में इतवार के दिन बैंक खुलवा कर 958 करोड़ का लोन किसने और किसके इशारे पर दिया था?

कुछ लोगो के पास जब मोदी की नोटबन्दी पर कोई तर्क नहीं सूझता तो वे ‘डिफाल्टर लोन’ की चर्चा करने लगते हैं…

उन्हें किसी भी तरह मामले को घुमाना है…. वे किसी भी तरह मोदी को आरोपित करना चाहते हैं, पर कन्फ्यूज़ हो जाते हैं, कुछ निशाने पर नहीं बैठता.

उन्हें नोटबन्दी कितनी अखर रही कि दिमाग इम्बैलेंस हो गया है, कुछ भी बक बैठते हैं….. बानगी देखिये!

‘मोदी पहले डिफाल्टर रूपये वसूलते, फिर यह नोटबन्दी चलाते.’

भई, डिफाल्टर लोन है, कानून के दायरे की बातें हैं…. ब्लैक मनी या नकली करेंसी नहीं. नकली करेंसी, ब्लैक मनी राष्ट्र-द्रोह है. सीधा देश और जन-सामान्य का दुश्मन.

नोटबन्दी का मामला बिलकुल ही अलग तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थ-व्यवस्था को विनष्ट होने से बचाने का है.

वह ‘डिफाल्टर लोन’ कब और उन्हें ही क्यों दिया गया था…??

कांग्रेस ने ही कांग्रेसी उद्योगपतियों को अपनी सरकार के दौरान बंटवाया था…. मोदी ने नहीं.

फिर भी लोन रिकवरी हो ही जाती है और होगा ही.

वह मोदी है.

उसके लिए उनका घर तक बिकवा देगा. कोर्ट आदि के तले कार्रवाई नहीं हो पा रही उसकी आड़ में ये बच निकलते हैं.

वह कार्रवाई पर आमादा न होता तो माल्या जैसे को भागना नहीं पड़ता.

जिस मोदी को मैं जानता हूं वह वोट या सरकार या भविष्य को ध्यान में रखकर निर्णय नहीं लेता.

जैसे उसने आज ब्लैकियों को घेर लिया है वैसे एक दिन ‘रोमनों’ को भी घेर ही लेगा.

खबर यह भी है विदेशों का अधिकांश नकदी काला धन सरकार जाने (2014) से पहले ही ट्रकों से भारत ले आया गया था…

उसको लगातार खपाया जा रहा था… वह रकमें इतनी बड़ी है कि दस-बीस सालों में भी सारा धन नहीं खपाया जा सकता.

वही हैं ‘वे’ जो छटपटाते घूम रहे हैं, टीवी पर दीख रहे हैं. ये वही ब्लैकमनी होल्डर हैं (असली/ बड़े वाले) नकद-कालियों पर कार्यवाई तो दूर, आप सुप्रीम कोर्ट के बार-बार कहने के बाद एसआईटी तक गठित करने को तैयार नहीं थे.

बार-बार पूछने पर उन लोगों के नाम उजागर नहीं करते थे. क्योंकि उसमें उनके खुद के नाम थे.

अभी कुछ दिनो पूर्व तक ‘काले धन के खिलाफ एकता’ सुनी थी, आज ‘काले धन के लिये एकता’ पहली बार देख रहा हूं….

सारी पुरानी वैचारिक दुश्मनियां भुलाकर इस मामले में सारे नेता एक दिख रहे हैं. सब दुखियारे गलबहियां डाल-डाल रो रहे हैं…

चोर-चोर मौसेरे भाई!

अब यहाँ विचार कीजिये कि आखिर माजरा क्या है?

कांग्रेस सरकारों ने बैंकों का 12 लाख करोड़ रुपया कॉर्पोरेट्स को बाँट दिया. ये वही कार्पोरेट्स हैं जिन कॉर्पोरेट्स के हितों की रखवाली वे सत्तर सालों से कर रहे थे.

उनसे वसूलने की जरूरत तक नहीं समझी गई. जिसने जैसा चाहा जमीन-रुपया बांटा गया.

आखिर भारतीय बैंकिग कुछ परिवारों के हितों के लिए स्थापित की गयी थी क्या?

शाबाश मोदी जी, आपने उस बैंकिग का भी उपयोग जन-हित में कर लिया जो किसी अन्य उद्देश्य (खपाने के लिए) से बनाया गया था… किसी ने ऐसा सोचा भी न होगा.

मोदी सरकार उसका ब्‍याज भी माफ़ करके किसी तरह वसूलना चाहती थी… परन्तु उनके हाथ बहुत लंबे है.

कोर्ट में भी उनके खैरख्वाह बैठे हैं… हर कार्रवाई इतना लंबा खींचना चाहते हैं कि किसी तरह मोदी का कार्यकाल खत्म हो…. आगे पूरी जान लड़ाएंगे कि इसे न आने दिया जाए.

मोदी को विकास करना है, सुरक्षित और व्यवस्थित राष्ट्र समाज खड़ा करना है, उसे निर्णय लेना आता है….

उसने सीधे सिंडिकेट (ब्यूरोक्रेट, नेता, माफिया और कार्पोरेट्स) जिसमें मीडिया भी है, पर वार किया… निकालो पूंजी, लगाओ विकास में…. वरना भुगतो.

उनसे निपटने के लिए बहुत ज़रूरी है कि किसान, मजदूर, खोमचे वाले, पटरी दुकानदार, तीसरी-चौथी श्रेणी का कर्मचारी, आम महिलाएं और मध्यम वर्ग सब समझें और जागें…

क्योंकि इन सत्तर सालों में उन्ही का पैसा हड़पा गया है, वही सबसे ज्यादा परेशान किए गए हैं.

सत्तर सालों के स्थापित भ्रस्टाचारी-कालाबाजारी दंग हैं कि पूरे संयम और अनुशासन से करीब पाँच करोड़ लोग खुद और परिवार के साथ खड़े हैं और मोदी का साथ दे रहे हैं… फुरसत से मजे ले ले…. अपने सामने किले दरकते देख रहे… यही इन नेताओं, भ्रष्टों और वामियों-सामियों को अखर रहा है.

सामान्य-जन सुबह से बैंकों, पोस्ट आफिसों की लाइनों में खड़े हो रहे हैं…. मैं भी खूब लाइन में लग-लग के देख रहा हूं… उनकी बातें सुन रहा हूं…

तीन-चौथाई से अधिक लोग मोदी के इस कड़े कदम का साथ ख़ुशी-ख़ुशी दे रहे हैं… पहली बार लोगो को लग रहा की ‘राष्ट्र-निर्माण’ यज्ञ में उनकी भी भूमिका हो सकती है.

प्रयोग के लिए आप खुद बस्तियों में जाइये. हर तरह की बस्तियों में अधिकांश लोग प्रशंसा कर रहे और थोड़ा-बहुत आ रहा कष्ट सहजता से स्वीकार कर रहे हैं… उन्हें पता है, यह समस्या 10-20 दिन में खत्म हो ही जाएगी.

परेशानियां किसको है… नेताओं, कुछ नौकरशाहों और कुछ बेईमान कारोबारियों को…. और उनकी पोषित मीडिया के एक वर्ग को… वामी-सामी अंध-विरोधियो को.

गौरतलब है कि ये सब इस कदम से अलग-थलग पड़ चुके हैं. अब समझ में यह नही आ रहा है कि लाइनें खत्म होने के बाद ये नेता किसके नाम पर रोयेंगे.

ध्यान दीजियेगा, जो बुराई में लगे हैं प्रायः वे पूर्वाग्रहों से ग्रस्त लोग हैं… ये 2014 के पहले भी मोदी के अंध-विरोधी थे, 2019 के बाद भी रहेंगे.

जल्द ही सब कुछ सामने होगा.

इनमें से शायद ही कोई वह हो, जिसको पकड़ने के लिये ये नोटबंदी की स्कीम लाई गई है…. इसलिए जनता ने इस पूरी योजना को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकारा है…. देश भर से सहयोग की खबर है.

देश में शायद ही कोई उदाहरण हो कि किसी मजदूर, पटरी दुकानदारों के यहाँ चूल्हा नहीं जला हो… लोग अचानक मानवीय और सहयोगी वृत्ति से भर गए.

इन पलों का इन्तजार लोग एक युग से कर रहे थे, यह इतिहास के वह अभूतपूर्व पल हैं, जिसकी भारत की जनता दृष्टा ही नहीं, निर्माण-कर्ता भी है.

लेकिन नेता और वामी-मीडिया उकसाने में कोई कसर नही छोड़ रही… फिर भी कोई नही उकस रहा, यही मोदी की जीत है.

सरकारी आदेश में शर्त है कि अगर किसी के खाते में आज से लेकर 30 दिसम्बर तक ढाई लाख से ज्यादा रकम जमा हुई तो वह जांच के घेरे में आएगा और उस पर टैक्स के साथ दो सौ परसेंट पेनाल्टी लगायी जाएगी….

जिसने मेहनत से, ईमानदारी से, सच्चाई से पैसा कमाया है उनको कोई कष्ट नही है. वह पैसे की कीमत जानता है.

कष्ट उन परजीवियों को हो रहा है जिन्होंने ‘हराम’ का इकट्ठा कर रखा है.

आम किसान और मजदूर परिवारों और निम्न मध्य वर्ग में कहीं इतना पैसा हो सकता है?

मान लिया कुछ लोगो ने पाँच-सात-दस लाख जोड़ भी लिया हो… या पत्नियों द्वारा सालों-साल पतियों से मिलने वाले घर खर्च में से बचा लिया गया हो…. पूँजी एकत्र की हो, वह काला धन नहीं होने पायेगा….

सरकार उतने तक के लिए तो रास्ते लाई है… और रास्ते लायेगी भी….. परन्तु छटपटा वह रहे हैं जो हरामखोरी के करोड़ो रूपये डम्प करके रखे हुए हैं, वह भी बेईमानी और घूस की.

केवल लालच-भ्रष्टाचारी स्वभाव के कारण ‘बटोरे’ हुए को सड़ा रहे हैं, उनको छोड़ा नहीं जाएगा.

सबको पता है यह अपार राशियां, अधिकाँश-तर विदेशी बैंकों से नेपाल रूट से निकाल कर लाया गया पैसा फ़ार्म-हाउसों में पड़ा सड़ रहा है.

देश अच्छी तरह से जान गया है कि देश में स्लीपर सेल के रूप में ‘मीडिया और साहित्यकार’ बने लोग हमेशा देश के वास्तविक दुश्मनों कालाबाजारियों की वकालत करते हैं.

वे देश में किसी भी तरह का सुधार नहीं होने देना चाहते हैं. वे एक ही ढर्रा, जो उनके मालिकानों को सत्ता दे, लूटने की व्यवस्था दे, वही बनाये रखना चाहते हैं.

आज भी जो लोग जनता की लाइनों को लेकर असंतोष फैला रहे हैं, वे शायद धन की आवक ना होने से परेशान हैं… वही असली लुटेरे हैं. देश के दुश्मनों को पहचानो.

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