किसी चैनल पर देखी है गांव के बैंक की किसी शाखा की खबर!

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ये उन दिनों की बात है जब अख़लाक़ सिंड्रोम वायरल था.

बनारस की एक मुख्य सड़क पर पच्चीस तीस लोग शाम के वक़्त मशाल जला कर जुलूस निकाल रहे थे.

इनमें ज्यादातर संभवतः कम्युनिस्ट पार्टी के अन्य राज्यों के बुद्धिजीवी थे और कुछ छात्र भी थे.

संयोगवश मैं उसी रास्ते से घर लौट रहा था. मैंने जुलूस देखा तो अपने भाई साहब को फोन लगाया जो कि एक न्यूज़ चैनल में स्ट्रिंगर हैं. उन्होंने जानकारी ली, फिर बात खत्म हो गयी.

अगले दिन मैंने उनसे पूछा कि आप गए थे जुलूस को कवर करने? उन्होंने जो जवाब दिया उसने मेरी आँखें खोल दीं.

भाई साहब ने बड़े हल्के अंदाज़ में कहा कि ये तो कोई खबर ही नहीं थी. खबर तो तब होती जब भगदड़ मचती, चार लोग मरते घायल होते या लाठी चार्ज किया जाता.

आगे उन्होंने और स्पष्टीकरण दिया कि यदि इसे कवर किया भी जाता तो उनका चैनल स्वीकार नहीं करता और उसके पैसे भी नहीं देता.

ये असली चेहरा है भारत के मीडिया का जो केवल नकारात्मक समाचार ही प्रेषित करना चाहता है. खबर तभी बनती है जब दंगे, मौत और कोहराम मचता है.

मेरे भाई साहब तो बेचारे अदने से स्ट्रिंगर हैं. उन्हें रोटी कमानी है, घर चलाना है. क्या दिखाना है क्या नहीं, ये तो मीडिया टाइकून तय करते हैं.

सकारात्मक खबरें भी केवल वही दिखाई जाती हैं जिनसे या तो सनसनी फैलती है या सरकार की चाटुकारिता होती है.

अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में पदक जीतने की खबरें और स्वच्छ भारत अभियान में गाड़े गए झंडे इसी श्रेणी में आते हैं.

अब यदि आप ये सोच रहे हैं कि ‘जो बिकता है वही दिखाया जाता है’ तो ठहरिये!

दरअसल हम वही खरीदने के आदी हो चुके हैं जो हमें देश के नकारात्मक पक्ष पर चुटकी लेने को बाध्य करता है.

अब ज़रा मीडिया में छाये एटीएम के बाहर लगी कतारों को देखिये. ये देख कर सभी को मजा आता है कि ‘इत्ते सारे लोग लाइन में लगे हैं’.

हम ये नज़ारा बन्द कमरे में टीवी सेट पर देख कर ह्ह्ह्ह… हँसते हैं और कभी मोदी पर चुटकी लेते हैं तो कभी मायावती पर.

गाँवों में एटीएम भले नगण्य हों लेकिन बैंक की ब्रांचें तो हैं. मैंने किसी भी न्यूज़ चैनल पर गाँव की कोई ब्रांच नहीं देखी. सब शहर की दिखाते हैं.

उसके बाद आप अपने टीवी सेट पर राहुल, येचुरी, शरद, अब्दुल्ला, केजरीवाल इत्यादि विपक्ष को देखते हैं, जो नारे लगाते मार्च निकालते हैं और कहते हैं कि गरीब आदमी पिस रहा है.

एटीएम के बाहर लाइन और विपक्ष का प्रलाप – हमारा दिमाग इन दोनों को एक साथ जोड़ कर वही कल्पना करने को बाध्य होता है जो मीडिया घराने चाहते हैं.

वह है नकारात्मकता. क्या आपको सोने से पहले देश के प्रति एक भी अच्छा विचार दिमाग में आता है? नहीं न!

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