आखिर चाहता क्या है RSS, और क्या है इसकी असली सोच!

Rss Dr Hedgewar, Guruji Golwalkar
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एक हजार वर्षों से हिन्दू समाज विदेशियों की गुलामी में रहा था. उस मानसिक गुलामी से हिन्दू समाज को सदा के लिए मुक्त करना डाक्टर जी के लिए अत्यन्त आवश्यक कार्य था.

हिन्दू समाज को विजय की ओर बढ़ाना और एक ऐसे सुसंगठित और सामर्थ्य-संपन्न रूप में खड़ा करना कि दुनिया की कोई भी शक्ति इस समाज की ओर बुरी दृष्टि से न देख सके, इस उद्देश्य से संघ की स्थापना के लिए डाक्टर जी ने सोच-समझकर विजयादशमी जैसे महान दिवस को चुना था.

डाक्टर जी का समाज का अनुभव बहुत गहरा था. उन्होंने छात्र जीवन से ही स्वातंत्र्य आंदोलन से स्वयं को जोड़ दिया था. उस समय स्वातंत्र्य आंदोलन करने वाली प्रमुख संस्था थी कांग्रेस और कुछ क्रांतिकारियों की संस्थाएं.

इन दोनों संस्थाओं में सक्रिय होने एवं क्रान्तिकारी गतिविधियों में लम्बे समय तक सक्रिय रहने के पश्चात् डाक्टर जी को अनुभव हुआ कि इन उपायों से हिन्दू समाज के पतन का मूल कारण नष्ट नहीं होगा.

क्योंकि लड़ कर तो हम स्वतंत्रता हासिल कर लेंगे. परन्तु जब फिर से कोई आक्रमणकारी आयेगा तो गुलाम मानसिकता एवं अपनी गौरवशाली संस्कृति एवं इतिहास की अज्ञानता से ग्रस्त हिन्दू फिर से उसका सामना नहीं कर पायेगा. एवं फिर से पराधीनता की वही कहानी दुहरायी जाएगी.

उस समय कांग्रेस एक जनांदोलन था, फिर भी इस आंदोलन में हिन्दू समाज के आत्मगौरव को कोई स्थान नहीं दिया गया था.

सदियों से जिन इस्लामी सत्ताओं ने हिन्दू समाज के जीवन-मूल्यों को ध्वस्त किया, उस इस्लामी सत्ता के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलना, इतना ही नहीं वह इस्लामी सत्ता ही अपनी गौरवपूर्ण परंपरा है, यह मानने वाले मानसिक रोगियों एवं मुस्लिम-तुष्टिकारियों को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना कांग्रेस की चाल थी.

क्रांतिकारियों का संगठन पूरे समाज को संगठित करने का विचार नहीं करता था. कुछ अंग्रेज अधिकारियों को मारकर हिन्दू समाज अपने निजी रूप में अपने बलबूते पर खड़ा नहीं रह सकेगा, यह डाक्टर जी की धारणा थी.

उनके विचार से पूरे हिन्दू समाज को अपनी गौरवशाली संस्कृति एवं सुनहरे अतीत का परिचय होना अत्यंत आवश्यक था. केवल अंग्रेजों के चले जाने से ही हिन्दू समाज का भला नहीं होगा, क्योंकि आज अंग्रेज गए तो कल फिर कोई आयेगा.

इसीलिए स्वतंत्रता आन्दोलन जारी भी रहे परन्तु गौरवशाली आत्मबोध के साथ.. ताकि हमारा स्वातंत्र्य संग्राम एवं उसके बाद मिलने वाली आजादी दोनों ही हमारी सांस्कृतिक विरासत को और भी उच्चतम शिखर पर पहुँचाने में सहायक बन सके.

संघ की स्थापना के चार वर्ष पूर्व कांग्रेस ने खिलाफत आंदोलन छेड़ा था. जिस इस्लाम के कारण लगातार एक हजार वर्ष तक हिन्दुस्थान का पूरा समाज जीवन ध्वस्त हुआ, धार्मिक जीवन कलंकित हुआ, स्वातंत्र्य नष्ट हुआ, उस इस्लाम के सम्मान के लिए कांग्रेस द्वारा हिन्दुस्थान में आंदोलन छेड़ना और प्रथम श्रेणी के कांग्रेसी हिन्दू नेताओं का और साधारण हिन्दू समाज का इस आंदोलन में सक्रिय होना, एक ऐतिहासिक आश्चर्य था.

हिन्दू समाज अपना स्वाभिमान किस सीमा तक खो बैठा था, इसकी कल्पना आज इतने वर्षों के बाद भी हम कर सकते हैं.

डाक्टर जी की सोच कितनी दूरदर्शी थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बाद में उनकी बातें बिल्कुल सच साबित हुई. जब इसी खिलाफत आन्दोलन ने मुसलमानों में पाकिस्तान की अवधारणा को उत्पन्न कर दिया तथा मुस्लिम लीग जैसे संगठन को क्षेत्रीय स्तर से उठाकर राष्ट्रीय स्तर का बना दिया जो बाद में भारत-विभाजन का कारण बना.

संघ संस्थापक तथा उनके पश्चात् जिन्होंने संघ कार्य का भार संभाला, उनकी संघ के बारे में कल्पना बिल्कुल स्पष्ट थी. अंग्रेजों या मुसलमानों को जिम्मेदार न ठहराते हुए उन्होंने सोचा कि हिन्दुओं की यह दुर्दशा हिन्दुओं की मूढ़ता, भव्य अतीत का विस्मरण, स्वार्थ, लालच आदि कतिपय दुर्गुणों के कारण हुई है.

एकाध लड़ाई जीतने, सत्ता हासिल करने से या इने-गिने लोगों के देशभक्त बनने से हिन्दुओं की यह दुरावस्था खत्म नहीं होगी. इस दृष्टि से हिन्दू समाज में प्रतिदिन अच्छे, देशभक्तिपूर्ण संस्कार भरना जरूरी है.

ऐसे संस्कारित लोग ही समाज को सदा के लिए सामर्थ्य-सम्पन्न कर सकते हैं. इन्हीं के दम पर स्वतंत्रता मिल सकती है तथा समाज की प्रगति भी हो सकती है.

Rashtriya swyam sevak sangh
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संघ का कार्य –

एक बार एक गृहस्थ ने डाक्टर जी से पूछा, “डाक्टर साहब, आप समाज को सद्वृत्ति की राह पर ले जाकर देश का उद्धार करने के लिए इतने कष्ट क्यों उठा रहे हैं? भगवान श्रीकृष्ण ने तो गीता में कहा ही है कि “परित्राणाय साधूनाम विनाशाय च दुष्कृताम’ मैं स्वयं इस धरती पर आऊंगा. क्या आप भगवान श्रीकृष्ण पर भी वि·श्वास नहीं करते?’

उन सज्जन से डाक्टर जी ने कहा “आपकी बात ठीक ही है. भगवान श्रीकृष्ण तो आने वाले हैं ही. लेकिन भगवान के इस वचन में एक शर्त भी है. भगवान कहते हैं कि मैं साधुओं के रक्षण के लिए आऊंगा. इसलिए संघ भगवान की शर्त को पूरा करने का काम कर रहा है.

समाज को, लोगों को, हिन्दुओं को साधु बनाना, सच्चरित्र बनाना, कर्मप्रवण बनाना-संघ यही काम कर रहा है.’

संघ कार्य का महत्व डाक्टर जी ने कितने सरल शब्दों में स्पष्ट किया.

आखिर देश का आधार देशवासी हैं. जो लोग इस देश को मातृभूमि मानते हैं, इस मातृभूमि का अपमान अपना अपमान मानते हैं, इस मातृभूमि का गौरव स्वयं का गौरव मानते हैं, ऐसे लोगों का निर्माण करना ही संघ का कार्य है.

यह काम हर पांच साल बाद आने वाले चुनाव की तैयारी करना नहीं, या विदेशी आक्रमण के समय जोर-शोर से गीत गाना नहीं है. इस काम का स्वरूप “तुरन्त दान महाकल्याण’ जैसा भी नहीं है.

यह सच है कि हिन्दू एक हजार वर्षों से अवनत अवस्था में रहा, लेकिन यह भी इतना ही सच है कि इन हजार वर्षों ने हिन्दू संघर्ष करता रहा. इस संघर्ष का रहस्य अपनी संस्कृति में है.

हमारी संस्कृति एक ई·श्वर, एक ग्रंथ, एक मजहब यानी एक उपासना पद्धति जैसी सीमित संस्कृति नहीं है. न ही हम किसी पर अपना धर्म या अपनी संस्कृति को जबरदस्ती लादते हैं.

स्वाभाविक है कि ऐसी संस्कृति को मानने वाले मुसलमानों या ईसाइयों के अत्याचारों और जबरदस्ती का हमने सामना किया है. एक हजार साल हिन्दू लड़ते रहे, मुकाबला करते रहे. इस लम्बी लड़ाई में आखिर मुसलमानों की हार हुई. फिर भी हममें सामाजिक गुणों की जो कमी थी, उसका लाभ उठाकर अंग्रेजों ने हमें परास्त किया.

संघ क्या करना चाहता है? इस सम्बंध में संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी ने स्वयं जो कहा है, वह समझना उचित होगा.

उन्होंने बताया था, “एक बार जब मैं दिल्ली में था, तब उस समय के केन्द्रीय शिक्षा मंत्री मो. करीम छागला से मेरी भेंट हुई. उन्होंने मुझसे कहा, “रूसी विद्यार्थियों में अनुशासन है, जीवन के हरेक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व निर्माण करने की महत्वाकांक्षा उनमें है. पता नहीं अपने विद्यार्थियों को क्या हुआ है. जब भी देखो तब हड़ताल, अनुशासनहीनता और लापरवाही…. क्या, अपने देश के युवा वर्ग के लिए आप कुछ उपाय सुझाएंगे?’

श्री गुरुजी ने छागला जी से पूछा “आपने अपने विद्यार्थियों के सामने कोई महान उद्देश्य रखा है?’ श्री छागला ने कहा, “यह बात सच है कि अपने युवकों के सामने ऐसा कोई महान उद्देश्य नहीं है.’

देश के शिक्षा मंत्री का यह उत्तर सुनकर श्री गुरुजी ने उनसे पूछा, “अगर विद्यार्थियों के सामने कोई भी महान ध्येय नहीं रखा गया तो अनुशासन की, श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों के लिए जीवन को समर्पण करने की हम अपेक्षा भी कैसे करेंगे?

युवकों की उच्छृंखल वृत्ति पर अगर काबू पाना है तो उनके यौवन का जोश राष्ट्रनिर्माण के कार्य में लगाया जा सकता है. विद्यार्थियों में उच्चतम राष्ट्रीय आदर्श रखने के लिए सर्वप्रथम एक बात पर ध्यान देना होगा. विद्यालयों-महाविद्यालयों में विद्यार्थियों को अपना असली इतिहास पढ़ाना होगा.

विद्यार्थियों को मालूम होना चाहिए कि हम ऐसे देश के सपूत हैं जिसकी परंपरा अति उज्ज्वल है. भौतिक ज्ञान तथा आध्यात्मिक क्षेत्र में हमारे पूर्वजों ने श्रेष्ठतम आदर्शों का निर्माण किया है. अपने विद्यार्थियों को इस प्रकार की पढ़ाई की आवश्यकता है और यह पढ़कर उनके मन में भी श्रेष्ठतम आदर्श निर्माण करने की प्रेरणा जागेगी.

हमने अपने इतिहास के केवल दो कालखंड माने हैं. एक मुसलमानों का कालखंड और दूसरा ब्रिटिश कालखंड. हम विद्यार्थियों को क्या पढ़ाते हैं? हम विदेशियों से हमेशा मार खाते आए हैं, हमारा भूतकाल कभी भी सम्पन्न नहीं था.

देश में जो भी प्रगति हुई, वह केवल मुगल और ब्रिटिश के सत्ताकाल में ही, यह हमारी पाठशाला और महाविद्यालयों में विद्यार्थियों को पढ़ाया जाता है. ऐसी स्थिति में अपने विद्यार्थियों से हम अच्छे कर्तृत्व एवं सद्वृत्ति की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं?’

श्री गुरुजी से यह सुनकर शिक्षामंत्री श्री छागला क्षण मात्र को स्तब्ध हो गए. कुछ देर बाद वे बोले, “आपने जो बताया वस्तुस्थिति ऐसी ही है.’

परम पूजनीय डा. हेडगेवार और श्री गुरुजी ने संघ के बारे में जो कुछ कहा, उसका निचोड़ यह है कि उनका लक्ष्य समाज था, लोग थे. लोगों के सामने आदर्श स्वयंसेवकों के कार्य खड़ा करना, संघ से संस्कारित प्रचारक गांव-गांव में, नगर-नगर में वनवासियों के बीच भेजना, वहां के समाज को अपने गले लगाने के लिए अथक परिश्रम करना.

अगर रामसेतु से हिमालय तक पूरा हिन्दू समाज एक हो जाता है तो यह देश फिर किसी भी आक्रामक का गुलाम नहीं बनेगा, किसी भी “सेमेटिक’ मजहब का शिकार नहीं बनेगा.

हिन्दू समाज को इतना सक्षम, समर्थ, संस्कारित, सद्गुण-सम्पन्न करना संघ का कार्य था और है. यह कार्य राज्यसत्ता हासिल करने, सरकार बनाने से परे है.

हमारा राष्ट्र और हिन्दू एक अजेय शक्ति के रूप में पूरे संसार के गौरव का विषय बने, यही संघ का लक्ष्य है.

जय श्री राम, जय माँ भारती.

– अज्ञेय आत्मन

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