डार्लिंग… यही सिला दिया है तुमने हमरी मुहब्बत का?

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मेडिकल साइंस की एक शाखा है पैथोलॉजी. इसमें रोग का निदान करते हैं, बोले तो diagnosis.

मने जब हम डॉक्टर के पास जाकर अपना रोग बताते हैं तो डॉक्टर के सामने दो विकल्प होते हैं. या तो अंदाज़ से आपके लक्षणों (symptoms) को देखते हुए दवा दे दे, कोई दर्दनिवारक और कोई एंटीबायोटिक…

या फिर आपके कुछ पैथोलॉजिकल टेस्ट करवा के आपकी बीमारी का असली अंदरूनी कारण जान के फिर उसका इलाज करे.

ऐसे में वो टेस्ट आपने कैसी लैब से कराये, वो कितनी विश्वसनीय है और पैथोलोजिस्ट कितना योग्य है ये भी बहुत महत्वपूर्ण होता है.

रोग का निदान ही न हो पाये, या गलत निदान हो जाए तो लेने के देने पड़ सकते हैं और बेचारे रोगी की जान मुफ़्त में जा सकती है.

पर ध्यान दीजिये कि बाजार में डॉक्टर का भेस बना के कुछ डाकू भी बैठे हैं, जो एकदम स्वस्थ आदमी को भी फ़र्ज़ी पैथोलॉजिकल टेस्ट रिपोर्ट बना के लाखों रु ठग लेते हैं.

ऐसे हज़ारों मामले सामने आये हैं जब बिना किसी रोग के ही डॉक्टर्स ने मरीज को लीवर ट्रांसप्लांट की सलाह दे दी.

इसलिए अपने डॉक्टर की सलाह पर आँख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि किसी अन्य डॉक्टर से सलाह, यानी एक second opinion ज़रूर लेना चाहिए.

ऐसा कहा जाता है कि महमूद ग़ज़नवी जब सोमनाथ का मंदिर लूट के वापस लौट रहा था, तो रास्ते में एक चरवाहे ने उसे जानबूझ के गलत रास्ते पर डाल दिया जहां उसकी आधी सेना प्यासी मर गयी और बची खुची को स्थानीय जाटों ने लूट लिया.

पिछले दो सालों में दिल्ली और बिहार राज्यों की पराजय का गलत विश्लेषण कर भाजपा समर्थकों को भ्रमित किया जा रहा है.

दिल्ली में मोदी का विजय रथ रोकने के लिए कांग्रेस ने स्वयं ख़ुदकुशी कर आम आदमी पार्टी (AAP) को जिताने का निर्णय लिया.

इसका नतीजा ये हुआ कि वो खुद 24.55% vote से खिसक के 9.7% पर आ गयी और AAP 29.49% से बढ़ के 53% पर आ गयी.

इस 23.5% वृद्धि में से 15% तो कांग्रेस का वोट था और शेष उस मुस्लिम समुदाय का जिसने 2013 में AAP को वोट नहीं दिया था.

मज़े की बात ये कि भाजपा ने 2013 का अपना 33% वोट 2014 के विस चुनाव में भी बरकरार रखा.

कहने का मतलब ये कि भाजपा की हार का मूल कारण कांग्रेस द्वारा की गयी ख़ुदकुशी थी… वरना उसने अपना वोट बैंक गंवाया नहीं.

कुछ मूर्ख ये कह सकते हैं कि लोकसभा में तो भाजपा को 46% वोट मिला था जो विधानसभा में घट के 33% क्यों रह गया?

उनको ये जान लेना चाहिए कि लोकसभा चुनाव के मुद्दे अलग होते हैं और voting pattern भी अलग होता है. विधानसभा, स्थानीय मुद्दों और स्थानीय चेहरों का चुनाव होता है.

इसी प्रकार बिहार की पराजय का मूल कारण भी कोई रणनीतिक चूक नहीं बल्कि नितीश कुमार द्वारा स्वयं अपनी खुद की कीमत पर लालू जैसे व्यक्ति को दिया गया जीवन दान है.

लालू मरणासन्न थे. उनका हीमोग्लोबिन रह गया था 4… नितिश बाबू ने उनको खून दान कर दिया.

लालू जी का हीमोग्लोबीन बढ़ के हो गया 17 और उनके गाल टमाटर जैसे लाल हो गए और नितिश बाबू चिचुक के चूसे हुए आम जैसे हो गए.

बिहार में गठबंधन जीता है. यही ठगबंधन ये तीनों अगर 2014 लोस में भी बना लेते तो शायद भाजपा (NDA) को 5 सीट के नीचे रोक लेते.

यदि दिल्ली और बिहार की हार का सही विश्लेषण कर सबक लेना हो तो ये समझ आता है कि यूपी में कोई ठगबंधन मत होने दो.

अमित शाह को ये सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी कीमत पर सपा, बसपा और कांग्रेस का ठगबंधन नहीं होना चाहिए.

चूँकि ये तीनों ही पार्टियां मुस्लिमपरस्त पार्टियां हैं और हमेशा से ही मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करती आई हैं, इसलिए इनमें से किसी का भी कोई तालमेल भाजपा से तो हो नहीं सकता.

आज की जो स्थिति है, उसमे सबसे ज़्यादा नुकसान सपा को होने जा रहा है. मुसलमान सपा से इस कदर नाराज है कि इस बार सूपड़ा साफ़ कर देगा.

सपा अगर 50 सीटों के नीचे आ जाये तो मुझे ताज्जुब नहीं होगा. ऐसे में भाजपा को सपा के साथ अंदर-अंदर एक रणनीतिक समझौता कर सपा का बचाव करना चाहिए और बसपा को नेस्तनाबूद कर देना चाहिए.

ठीक वही तकनीक अपनानी चाहिए जो दिल्ली में भाजपा के खिलाफ कांग्रेस ने अपनायी. भाजपा और सपा को 250-150 seats पर एक अघोषित तालमेल कर लेना चाहिए.

मुलायम सिंह ने आज़म खान की नाराज़गी को नज़रअंदाज़ कर अमर सिंह को पार्टी में लेकर स्पष्ट संकेत दे दिया है.

उन्होंने मुसलमानों को भी सन्देश दे दिया है – ‘डार्लिंग… यही सिला दिया है तुमने हमरी मुहब्बत का??? अगर हमको आँखें दिखाओगे तो हम तुमरे कपार पे भाजपा को बईठा दूंगा.’

कई बार डरा धमका के भी वोट लेना पड़ता है.

अमित शाह का पूरा राजनैतिक कौशल यही होगा कि सपा बसपा को मिलने न दे और अंदर-अंदर सपा को मिला लें.

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