सुनवाई टालने के लिए बार-बार तारीख लेने और देने वालों पर लगेगा जुर्माना

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नई दिल्ली. कानूनी प्रक्रियाओं में सुधार की जरुरत बरसों से मानी जा रही है. मगर सवाल ये था कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा?

कानून मंत्रालय, जो कि नेशनल लिटिगेशन पालिसी बनाने में लगा है, वो मुकदमों के जल्दी निपटारे के लिए कदम उठा रहा है.

मुक़दमे में पक्षकार जो अक्सर सुनवाई टाल कर अगली तारीख लेने के प्रयास में रहते हैं और न्यायालयीन अधिकारी जो सुनवाई की अगली तारीख दे देते हैं, उन पर अब जुर्माना लगाने की बात सोची जा रही है, ताकि अदालतों में अनुशासन रहे.

इसके लिए सिंगापुर के तरीकों से मुक़दमे में देरी पर जुर्माने का विचार किया जा रहा है. वहाँ, इस से मुकदमों के फैसले में तेजी आई थी.

एक अधिकारी से मिली जानकारी के मुताबिक, ‘समय सीमा में बंधे मुकदमों और देरी पर खर्च बढ़ने से अभी होने वाली समस्याओं से निपटा जा सकेगा.’

अभी के सिविल प्रोसीजर में किसी मुक़दमे की सुनवाई में तीन बार सुनवाई टाली जा सकती है, लेकिन इस नियम पर शायद ही कोई कायम रहता है.

राजस्थान में औसत पर देखें तो व्यवहार न्यायालय में मुक़दमे 12-42 बार और आपराधिक मामलों में 4-34 बार लंबित किये जाते हैं. ओड़िसा में व्यवहार मामलों में ये गिनती 151 और अपराध में 33 है.

कई बार निचली अदालतों में मामले 544 से लेकर 1438 दिन तक लटके रहते हैं, क्योंकि ऊपरी अदालत (उच्च न्यायालय) ने मामले में स्टे दिया होता है.

न्यायाधीशों (जजों) की संख्या में कमी और न्यायालय में कर्मचारियों की कमी भी देरी का कारण होती है.

रिक्तियों को उच्च प्राथमिकता पर भरा जाना भी जरूरी है, लेकिन यहाँ ये नहीं कहा जा सकता कि न्यायाधीशों की कमी के कारण ही मुकदमों में देरी होती है.

अधिकारी के अनुसार, ‘अदालतों में प्रबंधन का अभाव, मामले की सुनवाई पर रोक, वकीलों की हड़ताल, पहली अपील का जमावड़ा, रिट का गलत इस्तेमाल और मामलों तथा उनकी सुनवाई की खबर रखने के किसी तंत्र का ना होना भी देरी का कारण है.’

अब तक नेशनल जुडिशल डाटा ग्रिड पर मौजूद आंकड़ों के मुताबिक जिला अदालतों में 2 करोड़ 22 लाख 37 हज़ार 248 मामले लंबित हैं.

इनमें से 22 लाख 42 हज़ार 401 मामले दस साल से ज्यादा समय से लंबित हैं जिनमें से करीब 80 फीसदी अपराधिक मामले हैं.

पांच साल से ज्यादा मगर दस साल से कम समय से लंबित मामलों की गिनती 37 लाख 20 हज़ार 343 है, और वो भी किसी तरह से कम नहीं है.

The New Indian Express में प्रकाशित Kanu Sarda की रिपोर्ट का आनंद कुमार द्वारा अनुवाद

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