प्रेम प्रतीक्षा परमात्मा : तेरा मेरा क्या क्या नाता, सजनी, भाभी, मौसी, माता

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Ma Jivan Shaifaly

“कहते हैं मनुष्य की आत्मा चाहे सबकुछ भूल जाए लेकिन उसकी देह को सारे स्पर्श हर जन्म में याद रहते हैं…. उसे देह की सुगंध याद रहती है…”  … अपना एक अनुभव साझा करना चाहूंगी….

गणेश विसर्जन के दिन की बात है मैं और स्वामी ध्यान विनय बाइक से घर लौट रहे थे… रास्ते में एक आदमी मिला जो पुरानी सी लूना पर एक साल के बच्चे के साथ गाड़ी घसीटते हुए चला जा रहा था…

जब हम करीब पहुंचे तो देखा वो एक पैर से खराब  लूना को घसीट रहा है, और दूसरे पैर को लूना पर टिकाए घुटने पर बच्चे को लिटाये हुए है जो गहरी नींद में सो  रहा है…

मैंने जैसे ही बच्चे को देखा मन में अजीब सा महसूस हुआ मैंने स्वामी ध्यान विनय को गाड़ी रोकने के लिए कहा….

और उस व्यक्ति को रोककर उससे परेशानी पूछी तो उसने बताया गाड़ी खराब हो गयी है और बेटा सो गया है… आज उसका जन्मदिन है… उसे घुमाने लाया था…

उस बच्चे को देखकर मैं वैसे ही न जाने क्यों बहुत व्याकुल  हो रही थी… मैंने उससे कहा आपको परेशानी ना हो तो इसे मैं अपनी गोदी में ले लेती हूँ और आप अपनी गाड़ी हमारे साथ चलाते हुए चलिए… बच्चे को घर तक पहुंचा देते हैं…

वो भी न जाने क्यों एकदम से मान गया…

मैंने सोते हुए बच्चे को जैसे ही गोदी में लिया वो एकदम से मेरी छाती से चिपक गया… एक पल को मुझे ऐसा लगा जैसे छाती से दूध रिस रहा है… मुझे ऐसा लग रहा था जैसे इस बच्चे की गंध को मैं पहचानती हूँ..

हम कुछ ही दूर चल पाए थे कि बच्चे ने आँखें खोली… उसने मेरा चेहरा देखा और समझ आया उसे कि वो उसके पिता के पास नहीं है तो रोने लगा…. चूंकि उसके पिता साथ ही चल रहे थे… उसे मैंने दिखाने का प्रयास किया देखो पापा यहीं है… हम घर चल रहे हैं भैया…

लेकिन वो नहीं माना तो उसके पिता ने हमें धन्यवाद देते हुए बच्चा वापस लिया और आगे बढ़ गया…

मैं कुछ पल के लिए वहीँ खड़ी रह गयी… स्वामी ध्यान विनय ने मुझे स्पर्श किया… और कहा… माँ लौट आइये इस जन्म में… बस एक स्पर्श काफी था… पिछ्ला ऋण मुक्त करने के लिए…..

मैं उस दिन पूरे समय उस बच्चे की गंध से घिरी रही…. एक चिर परिचित गंध.. और दिन भर मन के साथ छाती भी भरी रही…

जीवन में ऐसे कई रिश्तों से हम गुज़रते हैं…. जिन्हें हम अचानक किसी का मिलना कहते हैं, वो न जाने किस जन्म के बंधन से मुक्त होने के लिए आता है….

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