मोदी का ‘परमाणु बम’ आतंकी देश पर तो गिरा ही, कई भ्रष्ट नेताओं को बर्बाद कर गया

Indian Prime Minister Narendra Modi
file photo : PM Narendra Modi in decisive gesture

यह युद्ध ही है. आपने नोट-पाबंदी पर मोदी का भाषण सुना था न???

मैं भौचक रह गया जब पीएम ने साफ़ कहा ”भारत में इस वक्त 80 से 90 प्रतिशत एक हजार और पांच सौ रुपया नकली नोट, या ब्लैक-मनी है.”

व्हाट्सएप पर एक मजाक चल रहा.

‘सारी दुनिया का एकमात्र चायवाला जिसने 100 करोड़ लोगों को बिना चाय के जगा दिया एक झटके में.’

अगर आप इसे हल्के में ले रहे तो आप या तो जन्मजात मूर्ख हैं, या फिर गैर-जिम्मेदार…. या फिर आपकी निष्ठा इस देश में न होकर कही और है.

ऐसे फैसले तब लिए जाते हैं जब ‘फाइनल डेस्टिनी’ सामने खड़ी हो..!!

विश्वास मानिये फाइनल डेस्टिनी बहुत करीब थी…. और ईश्वर का शुक्रगुजार होइए कि ‘मोदी, प्रधानमंत्री है.’

क्या समझे??

देश के दुश्मनों का असल उपयोग कर आतंकी देश दो लड़ाई लड़ रहा था. पिछले 35 साल से एक बड़ी लड़ाई यह भी चल रही थी. हमारे कुछ लोग भी स्वार्थ और लालसा के अनजाने में उसमें शामिल हो गए थे.

1. सीमा पर गोली-बारी के बहाने घुसपैठ द्वारा आतंकी घुसाना…. यह उनका ध्यान भटकाने का तरीका था. वह असल युद्ध नहीं था… दुश्मन एक रणनीति के तहत यह कर रहा था, जिससे उनके असल युद्ध की तरफ किसी का ध्यान न जाए.

2. नकली नोट और नशे का कारोबार. नशे का कारोबार भी तुलगमा था… एक प्रकार का भ्रम पैदा कर देना जिससे देश कन्फ्यूज़ रहे…

भारत को तीनो तरफ से नकली नोट भर देना… भारत-पाक बॉर्डर, भारत-बांग्लादेश बार्डर, भारत नेपाल बॉर्डर वाया चीन सल्तनत.

दुश्मन असल युद्ध यहां लड़ रहा था. उनको स्लीपर सेल के रूप में एक बड़ा समूह हासिल हो चुका था…

अगर थोड़ी भी बुद्धि होगी तो आगे की कल्पना कर ही लेंगे!!

आईबी और दूसरे इंटेलिजेंस इनपुट सरकार के पास काफी समय से लगातार आ रहे थे, परन्तु पूर्व सरकारों का मनोबल और मंशा साफ न होने के कारण कुछ न हो सका.

अब मोदी सरकार ने न केवल आतंकी देश के आईएसआई नेटवर्क सहित तमाम गुंडे-माफियाओं को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया बल्कि उस अवैध धन पर फल-फूल रहे एक बौध्दिक वर्ग को भी जोरदार झटका दिया है.

सन 1977 से ‘हामिद गुल साज़िश’ के तहत भारत में पनप रहा ‘गज़वा-ए-हिन्द’ अपनी शिशु अवस्था में पहुंचा दिया.

उन्हने बड़ी रकम और मेहनत पिछले आठ माह में कम से कम एक हजार ट्रक नकली नोट ‘हिल-रुट एवं चीन-नेपाल रूट’ से लगाईं थी.

उनकी दस साल की मेहनत पर पानी फिर गया. ट्रकों से पैसे आये थे…. पाक सोचता था इसी से भारत को बर्बाद कर देगा.

एक बड़ा कारपोरल नेटवर्क भी उन्हें सहयोग करने पर आमादा था. सरकार की सटीक सूचना और इतना बड़ा ऐक्शन उन्होंने कल्पना में भी नही सोचा था.

पूरा नेटवर्क और लागत टूट गयी….. लाखों स्लीपर सेल एक साथ नष्ट हो गए.

समझिये कि अवैध-धन पर सालों से चल रहा उनकी ही फ़ौज पर आईएसआई का नियंत्रण खत्म हो गया.

अब उनकी फ़ौज जहां से तनख्वाह पाती है उनके नियन्त्रण में होगी…. एक जवाबदेह कानून व्यवस्था की सीमाओं में.

फिर उनकी सरकार भी आतंक पर शिकंजा कस सकेगी. यह सबके लिए शुभ है भारत में रह रहे कुछ देश-द्रोही नेताओं के सिवाय.

बीच में रिजर्व बैंक ने नोटों पर ‘प्रिंट-ईयर’ छाप कर नियंत्रित करने की कोशिश की किंतु दुश्मन देश इतनी बड़ी मात्रा में नकली नोट छाप रहा था कि रोक पाना नामुमिकन हो गया.

यह केवल मनोबल का मामला ही नही रह गया था. बहुत से ‘बड़े नेताओं’ ने सरकार समाप्ति से पहले विदेशी बैंकों से अपना पैसा निकाल लिया.

ट्रकों रुपया नेपाल रूट से आकर दूर-दराज के फ़ार्म हाउसों में डम्प था. वे धीरे-धीरे इसे भारत में खपाने वाले थे. यह पैसा काफी कुछ चुनाव पर भी असर डालने वाला था.

हे हे हे हे!!!

तभी तो कई पार्टियों के कार्यालयों से ईर्ष्या का धुआं उठ रहा है लेकिन बू कागज जलने की आ रही है.

पुरानी पार्टियों के कई नेताओं के गांव वाले घर / फ़ार्म हाउस के बाहर भी कागज जलने की बू फैली हुई है. रद्दी वाले मालामाल हो रहे.

मोदी का असल ‘परमाणु बम’ आतंकी देश पर तो गिरा ही… उनको पूरी तरह तबाह करने के साथ कई भ्रष्ट नेताओं को बर्बाद कर गया… कई उद्योगपति, कई माफिया, कई नौकरशाह… न रो पा रहे हैं, न हंस पा रहे.

इन बड़ी खबरों में से एक भी समाचार जनता को समय से किसी भी चैनल या अखबार वाले न दे सके. आखिर क्या हो गया पहले तो बहुत उछलते थे?

वर्तमान में भारतीय मीडिया पर कब्जेदार ‘वामी पत्रकारिता’ की औकात इसी से समझ सकते हैं कि जनवरी से नोट आदि छापने का काम चल रहा था इनको भनक तक न लग सकी… जबकि इस काम में 25 हजार से अधिक लोग लगे थे.

और तो और उसमें से ज्यादातर समय कांग्रेस का एक एजेंट गवर्नर भी रहा… पर उसे पूरी सतर्कता से इस सबसे दूर रखा गया.

सरकार ने ब्लैक-करेंसी वालों को दो-दो बार कड़ी चेतावनी देकर इशारा भी दिया था. इस साल 160 से भी अधिक इस तरह के फैसले लिए गए. पर यह चूहा-बिल्ली-सिनेमा और बनाऊ खबरों में डूबे रहे.

उनकी भूमिका विश्लेषक या प्रचारक में बन चुकी है. सामान्य तौर पर वे खुद ही एक ‘पार्टी’ होते हैं.

एक वामी चैनल, जिस पर प्रतिबंध का खतरा मंडरा रहा है, खुद ही एक जज और पार्टी की भूमिका में होता है. मेरा कहना है भारतीय पत्रकारिता अगर प्रचार पत्रक है तो उसे समाचार उद्योग न माना जाए.

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