करने ही होंगे इस वैश्विक कट्टरता के प्रति शमनकारी उपाय

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कट्टरता कितने निचले स्तर तक जा सकती है, इस बात को हमें पिछले तीन चार दशकों ने सबसे अधिक दिखाया है.

आत्मघाती हमलावरों ने मनुष्यता को कहीं भी सुरक्षित नहीं रहने दिया है. इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, यमन, सोमालिया, लीबिया, ट्यूनीशिया आदि जैसे देश बर्बादी के कगार पर हैं.

आईएसआईएस, बोकोहरम जैसे संगठनों ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. ऐसे में सवाल यह है कि इस कट्टरता के बीज कहाँ छुपे हुए हैं? और इसका शमन कैसे हो सकता है?

टॉलस्टाय के एक पारिवारिक नाटक “द लाइट शाइंस इन द डार्कनेस” में एक संवाद इस पूरे संदर्भ को समझने में मददगार हो सकता है.

इस नाटक का प्रतिनिधि चरित्र निकोलस एक पादरी से संवाद करता है जिसमें निकोलस पादरी से कहता है –

“अगर मैं यह कहूं कि ईश्वर सच है तो हर कोई मुझसे सहमत हो सकता है और हम सब में एकता हो सकती है.”

“लेकिन अगर मैं ये कहूं कि ईश्वर एक है लेकिन वो केवल ब्रह्म है या केवल यहोवा है या फिर केवल त्रिमूर्ति है तो ऐसी बातों से लोगो में मतभेद होते हैं.”

“जबकि हममें से प्रत्येक को अपनी आत्मरक्षा करनी है और स्वयं अपने आप ईश्वर का काम करना है. लेकिन इसके बजाय हम अपना समय दूसरों को ये बताने में लगाते है कि ईश्वर ने छह दिन में दुनिया पैदा कर दी.”

“हम उन्हें सिखाते हैं कि ईसा मसीह उड़ के स्वर्ग चले गए और वहां जा कर अपने स्वर्गीय पिता के दायीं ओर बैठ गए. इसी तरह की भयंकर और वाहियात बाते सिखायी जाती हैं.”

“एक बच्चा, जिसका दिमाग साफ़ और ताज़ा है और अच्छी शिक्षा ग्रहण करने के लिए तैयार है और हम उसके कोमल मष्तिष्क में सत्य और प्रेम की शिक्षा देने के बजाय चालाकी से तरह तरह की वाहियात बातें भर देते है, क्या ये भयानक नहीं है?”

“इससे बड़ा पाप और अपराध कोई और हो सकता है? और आप और आपका गिरजा तो यही करते है, बस माफ़ कीजिये.”

जिन्हें ईसाइयत के प्रसार और इतिहास का ज्ञान है, उन्हें उपरोक्त संवाद में तनिक भी असत्यता नज़र नहीं आएगी पर वर्तमान संदर्भ में यदि गिरजा के जगह ‘मदरसे’ और ‘मस्जिदों’ का उल्लेख कर दें तो वस्तुतः विश्व की बढ़ती कट्टरता को आसानी से समझा जा सकता है.

भारत में मुस्लिम आबादी की मात्र 3 प्रतिशत जनता साक्षर है पर दीनी तालीम में ये प्रतिशत बहुत ज्यादा है.

आतंक और कट्टरता से लड़ाई का सीधा संबंध दीनी तालीम से है जो पूरी दुनिया में खूब फल फूल रही है.

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि फ्रांस ने अपने यहाँ मदरसों को बंद करने के आदेश दिए है, जबकि भारत सरकार ने मदरसों को आधुनिक बनाने की पहल की है, जिसे व्यापक सामुदायिक समर्थन हासिल नहीं हुआ है.

किसी भी प्रकार की संगठित धार्मिक शिक्षा के लिए वर्तमान संदर्भ में बने रहना उचित नहीं है.

अब यदि हमें कट्टरता और आतंकवाद से लड़ना है तो इस दिशा में भी निर्णायक कदम उठाने ही होंगे.

भारत में पिछले दो दशकों में सिमी और इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठनों का अस्तित्व में आना इस बात की पुष्टि करता है.

कट्टरता, वर्तमान विश्व का एक यथार्थ है जिससे मुँह नहीं चुराया जा सकता. इसके कारण भी साफ़ हैं. अब इस पर ढिलाई का मतलब, मानवता का आतंक के सामने घुटने टेक देने के अर्थ में ग्रहण किया जायेगा.

इस्लामिक देशों में लोकतंत्र का न होना, उनका बर्बादी के कगार पर खड़ा होना और प्रतिक्रिया स्वरूप पूरे विश्व में इस्लाम के प्रति तीव्र प्रतिक्रिया और गैरइस्लामिक लोगों का अनुदारता के प्रति आग्रह, संघर्ष का सतह पर आने जैसा है.

इसी वर्ष के अक्टूबर माह की ‘टाइम’ पत्रिका की कवर स्टोरी को देखें तो आतंक, कट्टरता और इस्लामिक खतरे के प्रति दुनिया की संवेदनशीलता बढ़ी है और सभी देशों में, जहाँ इस्लामिक जनता बहुमत में नहीं है, तीव्र प्रतिक्रिया हो रही है.

अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में मंजी हुई राजनेता हिलेरी क्लिंटन के सामने कारोबारी डॉनल्ड ट्रम्प का मजबूत दिखना भी इसका संकेत देता है.

भारत निश्चित ही अब पहले जैसा मृदु राष्ट्र नहीं रहा पर अभी भी इसे अधिक कठोरता से निबटने की जरूरत है. अल्पसंख्यक कट्टरता के प्रति शमनकारी उपाय करने ही होंगे.

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