VIDEO : ऐसी रिपोर्टिंग पर NDTV क्यों ना हो BAN

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मैं सरकार के कदम का समर्थन नहीं कर रहा हूँ लेकिन इस देश की सुरक्षा में उठाये गए एक प्रतीकात्मक कदम का समर्थन जरुर करता हूँ.

सरकार किसकी है, चैनल किसका है, यह मत सोचिये देश किसका है, यही सोचिये और समझिये. सरकारें और चैनल किसी के पूंजी स्रोत-भर है, जो आनी-जानी माया है, लेकिन देश किसी के बाप का नहीं है, बस यह याद रखिये.

यदि किसी आंतकवादी हमले के सीधे प्रसारण में कोई चैनेल उस स्थान की रणनीतिक गोपनीय सूचनाएं प्रसारित करके दुश्मन तक यह सूचना पहुंचा रहा हो कि जहाँ वह हमला हो रहा है, वहां पर कहाँ – कहाँ कितना और कैसा गोला बारूद और रखा है और उस हमले को नाकाम करने में जुटे राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड की टुकड़ी की चिंता और कमजोरी क्या-क्या है?

तो वह टीवी चैनल किस पुरस्कार का अधिकारी हो सकता है – यह आप उस समय का वीडियो देखकर तय कीजिये?

यह तय करते समय आप यह भी जानिए कि ऐसे ही सीधे प्रसारण का परिणाम यह देश 2008 में मुंबई हमले के दौरान भुगत चुका है. जब आतंकवादियों के करांची में बैठे आकाओं को वहां बैठे-बिठाये फ्री में यहाँ हमारी स्पेशल फोर्सेज की कार्यवाही की जानकारी लाइव अपडेटेड मिल रही थी और उनके निर्देशों पर यहाँ आतंकवादी एक बाद एक निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतारे जा रहे थे और हमारे सारे स्पेशल फोर्सेस पंगु बनते जा रहे थे. तो क्या वे प्रसारण उचित थे?

पठानकोट हमले की सीधे रिपोर्टिंग करते हुए जो सामरिक सूचनाएं लीक करने की सजा पाया चैनल जिस पर एक दिन का प्रतिबंध लग रहा है, वह यह नहीं बता रहा है कि उसके साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है बल्कि इस मामले में ‘प्रश्न पूछने की आजादी’, ‘अभिव्यक्ति की आजादी’, ‘प्रेस और सेंसरशिप’, ‘लोकतंत्र में आपातकाल’, ‘रविश की शहादत’ या ‘रविश के बिहार गौरवत्व’ जैसे असंगत विषयों को मामले से भिन्न होते हुए भी प्रमुखता से प्राइम टाइम में इस से जोड़कर मेलोड्रामा के रूप में कुटिलता से उठाया जाना कहाँ तक तर्क संगत है?

वस्तुस्थिति को चतुराई से झुठलाया जा रहा हो और उससे आम जनता को तथाकथित पत्रकार और उनके अनुगामी बुद्धिजीवी भी दूर करने का अथक प्रयास कर रहे हो, तो इस वर्ग को आप क्या कहेंगे?

उस पत्रकारिता को आप क्या कहेंगे, जो ‘अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’ के नाम पर देश की सुरक्षा को फिर से खतरे में डालती हो, तो उसे आप क्या और कैसा पुरस्कार देंगे, यह आप खुद तय कीजिये.

हो सकता है आपके लोकतान्त्रिक-नैसर्गिक चयन को भी ये पत्रकार और बुद्धिजीवी कोई संदेहास्पद नई संज्ञा दे दे, फिर यदि लोकतंत्र है तो आपका भी कुछ तो अधिकार इन नेताओं और पत्रकार–बुद्धिजीवियों की मुट्ठी से परे तो है ही. उस अधिकार से ही नागरिक बुद्धि जरुर चलाइए.

  • ओमप्रकाश ‘हाथपसारिया’

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