जन्मदिन विशेष : एक योगी का आत्मचरित श्री एम

हम जब छोटे होते हैं हमारे छोटे से मन में बड़ों की दुनिया बहुत सुन्दर होती है और हम उनके जैसे होना चाहते हैं….

जैसे मेरा बड़ा बेटा ज्योतिर्मय कहता है मैं बड़ा होकर आपके जैसे मम्मा बनना चाहता हूँ…. उसके छोटे से दिमाग में अभी स्त्री और पुरुष का फ़र्क नहीं है… वैसे भी उसकी दुनिया आम बच्चों से बहुत अलग है…

मैं अक्सर रात को श्री एम की पुस्तक हिमालयवासी गुरु के साए में पढ़ते हुए सोती हूँ. वो साथ में लेटा हुआ पुस्तक का आवरण पृष्ठ देख रहा था… अचानक कहने लगा… आपको पता है मैं भी हिमालय से आया हूँ…

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मैं हमेशा की तरह चकित हुई लेकिन उसे बहुत सामान्य तरीके से पूछा ये हिमालय क्या होता है?

कहने लगा आपको इस किताब में हिमालय की बहुत छोटी सी तस्वीर दिख रही है लेकिन ये सच्ची में बहुत बड़ा है.

मैंने पूछा आपको कैसे पता? और ये कैसे पता कि ये हिमालय की तस्वीर है?

मैं वहीं से तो आया हूँ… मुझे यह तो नहीं पता कि इंसान कहाँ से आता है लेकिन इस घर में आने से पहले मैं किसी और घर में रहता था लेकिन उस घर से इस घर में आने से पहले मैं हिमालय गया था…

अच्छा! मैंने बहुत ही सामान्य होकर कहा… फिर क्या हुआ?

कहने लगा मैं हिमालय से गिर गया था… फिर यहाँ आ गया…

अच्छा! फिर जब आपको ये नहीं पता कि इंसान कहाँ से आते हैं तो कुछ दिन पहले आप ही तो कह रहे थे कि जब मैं मम्मा के पेट में था तब से मेरे हाथों में लकीरें बनना शुरू हो गयी थीं..

वो कुछ जवाब देते इसके पहले ही छोटे बेटे गीत बाबू बोल पड़े… आपको पता है लोग जब छोटे होते हैं तो टीवी पर कार्टून देखते हैं, पापा जितने बड़े हो जाते हैं तो न्यूज़ देखने लगते हैं और उसके बाद दादा जैसे टीवी पर भजन देखने लग जाते हैं मतलब अब बुड्ढे हो गए हैं…

मैं ज्योतिर्मय की बातें भूलकर गीत बाबू के तर्क पर ठहाका मार कर हंसने लगी… फिर जानबूझकर उनसे पूछा ये जानने के लिए कि इनका दिमाग क्या क्या सोचता है, दादा बन जाने के बाद और बड़े हो जाते हैं तो क्या बनते हैं…

सबसे बड़े हो जाने के बाद तो सब लोग अमिताभ बच्चन बन जाते हैं… और मैं भी बड़ा होने के बाद अमिताभ बच्चन बन जाऊंगा…

मैंने उसे आशीर्वाद दिया हाँ आप बड़े होकर अमिताभ बच्चन ही बनना और उसकी कल्पना पर मुग्ध होते हुए खुद सोचने लगी … मैं बड़ी होकर क्या बनना चाहती हूँ?

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श्री एम ने तो अपने गुरू जिनको वो बाबाजी कहते हैं को साफ़ मना कर दिया था… मैं कुछ बनना नहीं चाहता… कहीं जाना नहीं चाहता…… बस आपके चरणों में जगह दे दीजिये पूरा जीवन यहीं बिता दूंगा…

तब बाबाजी ने उनसे कहा था, तुम्हें जिस प्रयोजन के लिए चुना गया है उसके इतर तुम्हारी अपनी इच्छा भी कोई मायने नहीं रखती… यदि परमात्मा के मार्ग पर खुद को पूरा समर्पित ही कर दिया है तो उसकी इच्छा में ही तुम्हारी मर्ज़ी होनी चाहिए…

और ये बात उन्होंने कई बरस पहले श्री एम की युवावस्था में ही बता दिया था कि आगे जाकर तुम ‘Sri M’ के नाम से जाने जाओगे.

मधु से मुमताज़ अली, मुमताज़ अली से मधु, मधु से श्री एम की कई जन्मों की यात्राहै…

मेरी  शैफाली से आरती, आरती से शैफाली और फिर माँ जीवन शैफाली बनने की इस जन्म की यात्रा में जब पूर्व जन्म की यात्रा भी जुड़ जाएगी तब शायद मैं भी यह कह सकूं अब मुझे कुछ नहीं बनना…
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इस जन्म की यात्रा में जो चादर मैली हुई है उसके लिए तो यही ख़याल आता है “मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ….” और हर बार हरिओम शरण जी की आवाज़ में ये भजन सुनते हुए अनायास ही आँखों से आंसू झर  पड़ते हैं… क्या मेरी इस जन्म की जीवन यात्रा में मेरी चादर को इतना मैला होना ही उसकी नियति थी?

लेकिन जब स्वामी ध्यान विनय कहते हैं इसे आप सामाजिक नियमों के अंतर्गत देखकर अपनी सोच को छोटा क्यों करती हैं… अपनी दृष्टी को विस्तार दो… जो कुछ भी घटित हुआ, हो रहा है और होगा वो आपके लिए ऊपरवाले की योजना से अलग तो कुछ भी नहीं…

आपके किसी पसंदीदा शायर ने यह कह दिया कि छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार तो आप वो मान बैठीं…

आप मेरे पसंदीदा शायर की बात क्यों नहीं सुनती-
सुनिए चाँद साहब क्या कहते हैं –

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उन्हीं की महफ़िल है दुनिया सारी
इसे वो कब से सजा रहे हैं
बना रहे हैं मिटा मिटाकर
बना बना कर मिटा रहे हैं

– माँ जीवन शैफाली

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