छद्म आपातकाल की धुंध में नहीं छुपा सकोगे वास्तविक आपातकाल का इतिहास

देश में आपातकाल तब भी नहीं आया था जब वो सही में आया था. देश में आपातकाल तब भी नहीं आया था जब घोटालों का सौ-दो सौ करोड़ का होना सलमान ख़ुर्शीद को कम लगता है.

देश में आपातकाल तब भी नहीं आया था जब सरेआम मालदा, बर्धमान, कैराना, मथुरा आदि जगहों पर एक समुदाय विशेष ने उत्पात मचाया था. देश में आपातकाल तब भी नहीं आया था जब सरकार प्रधानमंत्री कार्यालय की जगह कहीं और से चलती थी.

देश में आपातकाल तो आया है. लेकिन ये आपातकाल जनता के लिए नहीं है. ये आपातकाल एक विचारधारा के लिए आया है जिसने ये समझ लिया है कि एक पार्टी से घृणा करना आलोचना है और सिर्फ एक व्यक्ति के विरोध में होना सत्ता के ख़िलाफ़ सीना तानकर खड़े होना है.

ये आपातकाल कुछ लोगों के दिमाग़ में आया है जो अभी तक भाट-चारण बने घूमते थे. ये आपातकाल राडिया, कौन जात हो, मेडीसम स्क्वायर थप्पड़ वालों के लिए आया है.

आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब वैचारिक असहिष्णुता अपने चरम पर है. जहाँ हर उस आदमी को, जिसे सरकार का काम सही लगता है, भक्त-संघी कहकर तुच्छ निगाहों से नकार दिया जाता है.

हम वैसे समय में हैं जहाँ पत्रकारिता में हाथ घुमाकर अपनी ही पीठ थपथपाने का प्रचलन बढ़ गया है क्योंकि जनता में ऐसे पत्रकारों का पीठ थपथपाने वालों की कमी होती जा रही है.

कहते हैं विचार को आप मार नहीं सकते. सही बात है. लेकिन इस बात का आकलन कौन करता है, या करेगा, कि वामपंथी विचारधारा बढ़िया है और दक्षिणपंथी हीन?

आपको ये लाइसेंस कौन देता है कि आप अपने से इतर सोचने वाले को, चाहे वो आपसे सौ गुणा ज्यादा तादाद में ही क्यों ना हों, ‘डिसमिस’ कर देते हैं? और जब जनता आपको डिसमिस कर रही है तो आप लंगोट संभालने के चक्कर में दिल्ली के प्रदूषण में आए कार्बन कणों को देश में (आपकी कल्पनाशीलता में आया) आपातकाल बता देते हैं!

पत्रकारिता में विचारों की जंग होती है. छिछली आलोचना, प्रतिक्रिया या फिर तर्कहीन रिपोर्टिंग नहीं. आप सचिन तेंदुल्कर हैं लेकिन आप शून्य पर आउट होंगे तो आपको वापस जाना पड़ेगा; आप एक लंबे समय तक आउट ऑफ़ फ़ॉर्म हैं तो आपकी आलोचना होगी.

कुछ पत्रकार अपने ‘स्टैचर’ या अपने ब्राँड को खुद से बड़ा बना चुके हैं. उनको लगता है कि टीवी पर अँधेरा कर देने से ही आपातकाल आ जाता है देश में. उनको लगता है कि टीवी स्क्रीन पर लाल रंग से ग्रंज फोंट में, इंडिया गेट को एडिटिंग के काले धुएँ वाले बैकग्राउंड में रखकर, ‘यही आपातकाल है’ लिख देने से आपातकाल आ जाता है.

एक पत्रकार सिर्फ पत्रकार नहीं होता. उसकी सच्चाई उसकी नौकरी भी है. और उतना ही सच है कि आपको नौकरी के लिए अपने मालिकों की विचारधारा के साथ सुर में सुर मिलाना होगा. जब पत्रकार ये करने लगता है तो एक समझदार दर्शक को ये दिखने लगता है.

जब पत्रकार सत्ता का प्रवक्ता बन बैठता है, तब भी जनता को दिखने लगता है. पत्रकार का काम विचारहीन आलोचना तक सीमित नहीं है. पत्रकार का काम फ़ेसबुक के बुद्धिजीवियों की तरह फ़ैज़-फ़राज़ के सत्ता-विरोधी अश’आर लिखने जैसा नहीं है.

पत्रकार का काम है कि वो हर पहलू को दिखाए. पत्रकार का काम एक एनकाउंटर पर सवाल उठाना है, तो उतनी ही शिद्दत से आतंकियों की भूमिका पर भी सवाल करना है. वो अगर आतंकियों को न्यायालय के फ़ैसले तक दोषी नहीं मानता तो उसे उसी न्यायालय की याद एक पुलिसवाले को फ़र्ज़ी एनकाउंटर में शरीक होने वाला कहते वक्त भी आनी चाहिए.

और अगर वो न्यायालय को सर्वेसर्वा मानता है तो उसे शायद याकूब मेमन, अफ़ज़ल गुरू जैसे सजायाफ्ता आतंकवादियों के लिए चर्चाएँ रखते वक्त कोर्ट को कटघरे में नहीं रखना चाहिए.

पत्रकार को पत्रकारिता करनी चाहिए. आज पत्रकार जज हो गया है. आज पत्रकार बिना युद्ध देखे सामरिक विशेषज्ञ है. आज पत्रकार फ़ोरेंसिक एक्सपर्ट है जो व्हाट्सएप्प पर शेयर हुए वीडियो को आधार बनाकर विश्लेषण करता है.

आज पत्रकार इतना शातिर हो गया है कि वो ये बताता भी है कि इस वीडियो की प्रामाणिकता संदिग्ध है, लेकिन फिर भी दिखाता है क्योंकि वो जानता है कि देखने वालों को फ़ोरेंसिक लैब के रिज़ल्ट आने तक का इंतज़ार नहीं रहता. पत्रकार जब धूर्त हो जाए तब उसे जनता पहचानने लगती है.

आज पत्रकारिता का वो हाल है कि पत्रकारिता की ग़लती गिनाने के लिए पत्रकारों ने पोर्टल खोल रखे हैं. इसे कौन सा स्तंभ कहेंगे, मुझे नहीं मालूम.

पत्रकारिता अब प्राइम टाइम स्टूडियो से ढोंगी बाबाओं, मस्जिदों के मुल्लाओं का वो डिक्टैट होता जा रहा है जहाँ से वो सिर्फ बोल देते हैं और उसकी आलोचना पर उनके समर्थक आपको नोचने दौड़ जाते हैं.

जिनकी ज़मीन घोटालों और सीबीआई द्वारा टैक्स इवेजन के केस में फँसने और अपने मतलब की सरकार आने पर ख़ारिज होने पर खड़ी है, उनके कर्मचारी आज आपातकाल की दुहाई दे रहे हैं.

जिन्हें उनके मतलब की सरकार में पद्म सम्मान मिले हैं वो उन्हें हीन निगाहों से देखते हैं जिन्हें उनकी विरोधी सरकार ने सम्मानित किया है. किसी पत्रकार का एक प्रधानमंत्री से सम्मान ना लेना एक निजी मामला है, लेकिन वो आत्मसम्मान का मामला नहीं है.

ज्यों ही आप किसी दूसरे से सम्मान लेते हैं, या ले चुके हैं, आपके आत्मसम्मान की सफ़ेद धोती का छेद दिखने लगता है.

मेरे जानने वालों में पत्रकारिता के छात्र भी हैं, शिक्षक भी. जो लोग काली स्क्रीन को, स्टूडियो में चल रहे मूक अभिनय को पत्रकारिता का माइलस्टोन मान रहे हैं, उन्हें पत्रकारिता के माइलस्टोन के लिए गूगल में सर्च करना चाहिए.

आज दौर सुपरलेटिव विशेषणों का है. आज दौर वो है जब एक मीडियोकर फ़िल्म को बेहतरीन कह दिया जाता है क्योंकि दस साल में पाँच काम भी वैसे नहीं हुए जिन्हें अच्छा कहा जाए. आज सत्रह इनिंग के परफ़ॉर्मेंस पर बैट्समैन नेक्स्ट सचिन बन जाता है.

उसी तरह आज अपनी आँख खोलने की कोशिश करते नन्हें छात्रों के लिए ये बुरा दौर है. इन पर सुपर्ब, ऑस्सम, माइंडब्लोइंग, पाथब्रेकिंग आदि हेडलाइनों और लिंकों की ऐसी बौछार फेंकी जा रही है कि इनके सामने बेहतर उदाहरण आ ही नहीं पाते. इनको कुछ भी नया, जो उन्होंने नहीं देखा हो, बेहतरीन लगता है. ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. ये बौद्धिक आपातकाल है.

ये करने के अलावा पत्रकार और कुछ कह नहीं सकते, क्योंकि लोग मान नहीं रहे हैं. अपनी खोती ज़मीन को समेटने की कोशिश में ये उनके टूटते नाखूनों और चींखती जीभों की वो आवाज़ है जिसे कोई सुनने को तैयार नहीं. जब आपातकाल का प्रयोग हर दूसरे दिन होने लगे; जब आपातकाल एक सांसद के ज़बरदस्ती पुलिस की जीप में बैठकर ना उतरने पर याद किया जाने लगे; जब आपातकाल एक चैनल के नियमों को तोड़ने पर लगे टोकन बैन की बात पर आ जाए; जब आपातकाल अपने हिसाब के उत्तर ना पाने पर आने लगे तो समझ जाईए, कि आपातकाल एक मरती विचारधारा के ठेकेदारों द्वारा इस्तेमाल होता वो जुमला है, जो अंतिम है.

चलते-चलते ये बताता चलूँ कि इनके लिए देश में आपातकाल तब भी नहीं आया था जब वो सही में आया था.

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