व्यंग्य : एक महान सूफी संत था जिसका नाम था औरंगज़ेब

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टोमिला रापर और हिर्फान अबीब  जैसे इतिहासकारों द्वारा प्रमाणित –

एक समय की बात है, एक महान सूफी संत था जिसका नाम था औरंगज़ेब. जब वह बड़ा हुआ उसने अपने पिता शाहजहां को अपना साम्राज्य चलाने और काफिरों को मारने के तनावपूर्ण काम के बोझ तले दबा हुआ पाया तो उसे बहुत बुरा लगा.

औरंगज़ेब ने अपने पिता को तत्काल राहत देने के लिए आगरा में बुजुर्गों के लिए एक आरामदायक सेवानिवृत्ति गृह में भेज दिया. उसके अपने बड़े भाइयों में शांति और कला के लिए तड़प देखी तो उनको स्वर्ग भेज दिया जहां वे चिरशांति प्राप्त कर सके.

औरंगज़ेब केवल एक सूफी संत ही नहीं था, बल्कि वह हिंदू ग्रंथों का विशेषज्ञ भी था. उनका मानना था कि बहुत ज्यादा धन संपत्ति ने हिंदुओं को भौतिकवादी बना दिया है और यह उनके आध्यात्मिक विकास में बड़ी रुकावट बन रही है.

औरंगज़ेब अपने राज्य के हिन्दुओं को आग्रह किया की वे स्वेच्छा से राजकोष को अपनी धन संपत्ति दान करे ताकि वे देवों की आराधना पर अपनी ऊर्जा और ध्यान केंद्रित कर सके. इस  स्वैच्छिक अध्यात्मिक दान को उसने “जज़िया” का नाम दिया था!

उसने काशी और मथुरा के महान हिंदू मंदिरों की वास्तुकला में भारी बदलाव किया क्योंकि वह हिन्दु समाज को अपनी ऊर्जा आंतरिक रूप से आत्मा के गहरे रहस्य सुलझाने में केन्द्रित करने को प्रोत्साहित करना चाहता था और चाहता था कि हिन्दू समाज मंदिरों जैसे तुच्छ बाहरी दिखावे की चीजों की पीछे अपना समय व्यतीत ना करे.

औरंगज़ेब का मानना था हर हिन्दू का अंतिम लक्ष्य पुनर्जन्म के चक्र को तोड़ कर मोक्ष प्राप्ति था. औरंगज़ेब ने लाखों हिन्दुओं को अपनी अध्यात्मिक खोज पूर्ण करने के लिए उनके शरीर रूपी पिंजरे से उनकी आत्माओ को मुक्त करवाया. इस प्रकार, हिंदुओं की एक पूरी पीढ़ी को मोक्ष पाने मे मदद की.

उन्होंने आगरा में मराठी विद्यालयों को शुरू करने की संभावना पर चर्चा करने के लिए महान मराठा राजा शिवाजी का आह्वान किया. हालांकि, शिवाजी को मुग़लटेसरी(Mughaltessori) प्रथा से मुग़ल शिक्षा पद्धति पसंद नहीं आई और आवेश में आ कर वापस महाराष्ट्र प्रस्थान कर गए.

शिवाजी महाराज की यह बढ़ती असहिष्णुता के प्रदर्शन से दुखी  औरंगज़ेब ने महाराष्ट्र में शिवाजी के राज्य में किले की वास्तुकला का अध्ययन करने का फैसला किया.

औरंगज़ेब और उसके शांतिपूर्ण अनुयायी महाराष्ट्र के इस शैक्षिक दौरे की योजना बना रहे थे, उस समय शिवाजी महाराज की मृत्यु हो गई. तब औरंगज़ेब उनके बेटे संभाजी को महाराष्ट्र की शिक्षा प्रणाली पर चर्चा के लिए बुलाया.

औरंगज़ेब ने अंग दान से मिलने वाली परम आनंद के विषय पर एक प्रभावशाली भाषण दिया वह सुन कर संभाजी ने स्वेच्छा से अपने दोनों आंखें दान करने की पेशकश की. औरंगज़ेब ने सहर्ष संभाजी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और स्वयं उसकी आँखें निकालने में मदद की.

वास्तव में, औरंगज़ेब अंग दान के विषय में बहुत प्रवीण था. दिल्ली में रहते हुए, इस विषय पर अपने कुशल व्याख्यान से सिख गुरु तेग बहादुर को अपने पूरे सिर दान करने के लिए भी आश्वस्त किया था!

औरंगज़ेब महाराष्ट्र के विकास गति से इतना प्रभावित था कि औरंगाबाद में हाथ से बुनी हुई जालीदार टोपी बनाने की एक छोड़ी इकाई स्थापित की और वहीँ अपने जीवन के आखरी दिन बिताने का निर्णय लिया.

उन्होंने खुद को “शताब्दी का श्रेष्ठ बुनकर” के पुरस्कार से नवाज़ा और फिर तुरंत मराठा शासन के अधीन बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ विरोध प्रदर्शित करने के लिए पुरस्कार लौटा दिया!

स्वयं को सम्मानित करने की यह कार्रवाई कुछ सदियों बाद जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के लिए महान प्रेरणा का स्रोत बन गयी थी  जब उन्होंने खुद को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया!

– शेफाली वैद्य के अंग्रेज़ी लेख का मोनिका शर्मा द्वारा अनुवाद

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