माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः

भारत भूमि का निसर्ग मनुष्य का पालना रहा है. भारत भूमि की आदि संतानों ने अनुभव, आस्था और विश्वास के साथ उद्घोष किया ‘माता भूमिः, पुत्रोहं पृथिव्याः.’ यह भूमि मेरी माँ है. मैं उसका पुत्र हूँ.

उसी भूमि माता ने मानव को प्रकृति के पालने में झुलाया. गोदी में सुलाया. अपनी छाती से निपजे दूध भरे अन्न को खिलाया. नदी, नद, निर्झर का जल पिलाया. अरण्यों में बसाया.

जीवन के मूल्यों से सजाया. चिंतन की राह पर चलाया. सप्तदीप -नवखण्ड पृथ्वी के बीच गुण संपन्न कर बैठाया. तीन लोक, चौदह भुवन, सप्त पाताल में संचरित सत्य को दिखाया.

ऐसी भूमि और ऐसे पृथ्वी-पुत्र विश्व-कुटुम्ब की संरचना और सर्जना में अपने कर्म के बीज बोते रहे. उन्होंने पत्थरों में भगवान देखा. नदियों में माँ का ममत्व परखा. वृक्षों में मित्र रूप देखा.

गाय के रोम-रोम में देवत्य का वास देखा. त्याग में भोग की आकांक्षा को फलित देखा. जल में कमल की तरह जीने को असली जीना माना. शब्द की साधना करते हुए अक्षर–ब्रह्म तक पहुँच गए.

इतने पर भी तन पर लँगोटी लगाये आत्मा के प्रकाश में अरण्यों में उभाने पाँव चलते रहे. मिट्टी के स्पर्श अनुभव की पावनता को माँजते रहे. परदुःखकारता में आत्मोत्सर्ग का प्रकाश-बिंदु पाते रहे. प्रकृति की गोद में निश्छल प्राकृत जीवन जीते रहे.

जीवन को रचने, सँभालने और जीने की जुगत में बहुत कुछ बाहरी–अनावश्यक छूटता जाता है. मूल्य बचे रहते हैं. जीवन बोध और मानुषभाव संग-साथ चलते–चलते निविड़ क्षणों में ढांढस बँधाते हैं.

जिनके पास मूल्य, जीवनबोध और मानुषभाव सघन और तरल हैं, वे भारतपुत्र मानव जीवन, मानव विकास और मानव संस्कृति के सच्चे प्रतिनिधि हैं. वे हमारे पूर्वज भी हैं. वे ही हमारे आदिम बड़, पीपल, आम, नीम और तुलसी-हल्दी सरीखे प्राणत्व से पूरित पीयूष–स्रोत हैं.

बौद्धिक अतिवादिता की नासमझ ने जिन्हें आदिवासी, वनवासी, जनजातीय संबोधन दे डाले हैं. वास्तव में वे ही मूल निवासी हैं. सभ्यता, संस्कार, संस्कृति की रेखाओं में आचरण, ज्ञान, गुण और सहज आत्मविस्तार के रंगों से स्तर भेद स्वाभाविक रूप से हुआ.

श्रेष्ठता परिलक्षित करने वाला संबोधन आर्य हो गया. साथ ही भूगोल और मौसम ने इन भारतीय मानव–समाज के सिंह के चार मुख रच दिए और समाज रुपी सिंह के चारों मुखों – आर्य, द्रविड़, किरात और निषाद के दर्शन विश्व–समाज करने लग गया.

सारनाथ के अशोक–स्तंभ की चतुर्मुखी ‘सिंहप्रतिमा’ के प्रतीक–संदर्भ भारतीय समाज की जड़ें हैं.

– कुँवर सर्वेंद्र विक्रम सिंह

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