सत्ता के लिए क्या ये शहीदों के खून की दलाली नहीं थी!

V.K. Krishna Menon-Jawaharlal Nehru
Jawaharlal Nehru with then Defence Minister V.K. Krishna Menon

साठ के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आंकलन के विपरीत चीन सिंगकियांग तिब्बत रोड के पश्चिम में सत्तर मील आगे बढ़ आया और चार हज़ार वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र अपने कब्जे में ले लिया.

नेहरू और तत्कालीन रक्षा मंत्री वी के कृष्णा मेनन को जवाब देना मुश्किल हो रहा था.

इस दौरान नेहरू ने तत्कालीन सेना प्रमुख पी एन थापर को इन पोस्ट को छुड़ाने का आदेश दे दिया.

आर्मी चीफ ने नेहरू को आगाह किया ये बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसा काम होगा.

इसके बाद मेनन के नेतृत्व में एक हाई लेवल मीटिंग हुई जिसमें सेना प्रमुख ने साफ़ साफ़ कह दिया कि भारतीय फ़ौज के पास जंग में जाने लायक ताकत नही है, भारत चाइना का अनुपात एक के मुकाबले छः का पड़ता है.

थापर की बात को काटते हुए मेनन ने कहा कि उनको पुख्ता जानकारी है कि चाइना हिट बैक नही करेगा.

सेना प्रमुख बनते ही थापर ने 1960 में ही एक नोट सरकार को भेजा था जिसमें उन्होंने बताया था कि सेना के साजोसामान बहुत खराब हालात में हैं और पाकिस्तान और चाइना हमे आसानी से हरा सकते हैं.

ऐसा लगता था कि सरकार बिना किसी तैयारी के चाइना से युद्ध करने पर आमादा थी.

मेनन के साथ बातचीत का फायदा न होते देख थापर ने नेहरू से मुलाक़ात के लिये वक्त माँगा.

मीटिंग से कुछ ही मिनट्स पहले जनरल थापर से मिलने कैबिनेट सेकेट्री एसएस खेरा आये.

खेरा ने कहा, जनरल अगर मैं आपकी जगह होता तो मैं अपना डर पंडित जी के सामने ना कहता, क्योंकि हो सकता है वो आपको लड़ाई से डरने वाला समझ लें.
(if I were you, I would not express my fears before Panditji for he might think that you are afraid to fight)

थापर ने कहा, मुझे स्थिति की जानकारी प्रधानमंत्री को देनी है, निर्णय उन्हें लेना है.

थापर अपनी कार में बैठने लगे, तभी खेरा ने फिर कहा – आपको पता होना चाहिए अगर लड़ाई नहीं हुई तो सरकार गिर जायेगी
(you must realise that if India did not fight, the government would fall.)

थापर ने कार का दरवाज़ा बन्द किया और नेहरू से मिलने चल दिये. मन ही मन वो समझ गये थे कि चाइना से लड़ाई सामरिक हित के लिये नहीं राजनीति से प्रेरित है.

आखिर में हुआ वही जो नेहरू और मेनन चाहते थे और भारत को एक शर्मनाक हार झेलनी पड़ी. बिना रसद पानी के भारतीय फौजी लड़ते रहे और जान देते रहे.

29 जुलाई 1970 थापर ने कहा – उस समय मुझे अपना इस्तीफा सौंप देना चाहिये था, शायद मैं देश को उस शर्मनाक हार से बचा लेता.

सवाल ये है कि क्या सत्ता बचाने के लिये पंडित नेहरू ने बिना तैयारी के सेना को युद्ध में झोंक दिया? क्या ये सत्ता के लिये शहीदों के खून की दलाली नहीं थी?

(मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर की Beyond The Lines के कुछ अंश)

– प्रस्तुति अवनीश बाजपेयी 

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