भंडपीर इंदौरी : गुलेगेंदा की लड़ें

क्या ख़ूब तजल्ले है दिवाली की रात के
ढूमर थी लगाए थी दुकां राजबाड़े पे
”गुलेसदबर्ग की बेलें ले लो
गेंदें की लड़ियाँ दस दस बस इकन्नी में
लछमी जी सदा सहाय होंगी
तज्जार, पंडें, लाला, नवाब की भरेंगी तिजोरियाँ
बस एक इकन्नी में”

भरे न भरे तिजोरियाँ, भर जाया करें थे पेट
ढूमरन के घर-भर के बस एक इकन्नी में
तुनकजिस्म तत्तामिज़ाज वो मिली
पड़वा के रोज़- गली के घुप चप्पे में इस साल
जानो हाथ आ गया हो गुलेसदबर्ग का एक हार
हाँ, गुलेगेंदा ज्यूँ ही था
रंग दहन का जो घुटाव में पसीजता, गहराये जाए था
‘घाई न बताना, कलाई छुड़ाकर न जाना’

घनेरे गेसुओं में घुसाकर नाक जो कहा
तो वहाँ भी महकती थी गुलेगेंदा की लड़ें
दस जो मिल जाए हैं बस एक इकन्नी में
नसें नीलगूँ यहाँ से वहाँ जाती और हाथ
ज्यूँ चाँदी का दिया, घी से भरा, जलता हुआ
और जो न मिलेगा इमली बाज़ार तक में
कम से कम अठन्नी में

वहीं, ग़र्म, जोतभरी हथेलियाँ छुड़ाकर जो भागी
पीछे पकड़े केस, झोंटा खुला
गेंदे की लड़ों पे बाँध काली पोत
जैसे सेठानी छिड़कती हो गुलाबजल का घड़ा
ऐसे हुई दिवाली हाथ आई गुलेगेंदा की लड़ें
जिसके लिए राज़ी थे इंदोरी रईस सब
देने कलदार अशर्फ़ियाँ

मुफ़्त वो मिली हमकू न इकन्नी में न अठन्नी में
असरेघोला नहीं है सच है
शबेमावस है हुआ करें मगर रौशन है,
वस्ल की बेला
उसकी बंद नयनों की तरह
जो लगाती है हमारे छज्जे पे दिया
चढ़कर निसन्नी पे.

– भंडपीर इन्दौरी

(हालाँके भंडपीर इंदौरी सिवाय होली और मुहर्रम के कोई दूसरा त्योहार नहीं मनाते थे मगर दिवाली और दूसरे त्योहारों के मेलों पर बहुत फ़रेफ़्ता थे. इस नज़्म में दिवाली पर गेंदे के हार बेचनेवाली गेंदे की लड़ी जैसी ही एक ख़ूबसूरत ढूमर स्त्री से उनके मिलने और छेड़छाड़ का ज़िक्र है.

इस नज़्म का असर ये है कि बनते हार पर जो एक बाँध दी जाए तो महीनेभर तक फूल नहीं मुरझाते. इंदौर की मालिनें इसकी क़सम खातीं है ये इतनी असरदार है.

कुछ तंत्रिक दिवाली की रात लाल कपड़े में गेंदे के फूल रखकर इसे १००० बार पढ़ते है तो कहते है कि फूल सोना हो जाते हैं. )

*तजल्ले- रोशनी.
*गुलेसदबर्ग- गेंदे के फूल.
*तज्जार- कारोबारी.
*ढूमरन- बनियों की एक जाति.
*तुनकजिस्म- जिसका जिस्म दुबला और नाज़ुक हो.
*तत्तामिज़ाज- ग़र्ममिज़ाज.
*पड़वा- दिवाली के बादवाला दिन, जिसकी रौनक़ें दिवाली से ज़्यादा बताई जाती है.
*घुटाव- तंग, घुटन से भरा.
*घाई बताना-धोखा देना.
*झोंटा- जूड़ा.
*पोत- प्लेन सदा कपड़ा.
*असरेघोला- पानी में घुली हुई अफ़ीम का असर. त्योहारों पर अफ़ीम पानी में. घोलकर पी और पिलाई जाती थी.
*शबेमावस- अमावस्या की रात.
*निसन्नी- बाँस की बनी चल सीढ़ियाँ.

चित्र साभार जयेश शेठ

  • साभार अम्बर पाण्डेय

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