ऐसी भी क्या जल्दी थी भोपाल पुलिस, ज़रा ठहर जाते

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असल में गलती हो गयी… इस बार.. असली मुठभेड़ करके तुरन्त मार गिराया…. अमूमन पुलिस बहादुरी मोड में होती है तो इनोसेंटली यह होता है.

यही गलती हो गयी.

हथकंडा अपनाते भाई हथकंडा….. रूट एन्ड स्ट्रेस मैनेजमेंट कांग्रेसीपना और क्या…..!!

पुलिस तुरन्त न मारती तो ज्यादा अच्छा रहता. उन्हें कुछ दिन पकड़ के छुपा के रखना था.

जाट राजनीति नही जानता न, आईजी योगेश चौधरी!!
(हमारी यूपी पुलिस होती तो देखते…. अभी तक कुछ कमा-धमा भी लिया होता.. नेता भी खुश.. जेब भी भारी और निपटाते भी!!)

होना यह चाहिए था!!

स्क्रिप्ट बनाते!!

फरार… दहशत…!
करीब दस दिन… यही चलता हथियारों के साथ भोपाल में प्रेस काम्प्लेक्स और ‘चौहत्तर बंगलों’ के पास ही कहीं छुपे हैं…..

दिग्गी राजा के बंगले के आस-पास दिखे हैं… चार इमली, 45 बंगले के आस-पास लोकेशन्स मिल रही… उनके पास भयानक हथियारो की सूचना है.

भोपाली दिल्ली तक न दौड़ जाते तो फिर मैं शर्त हार जाते…. अपने कुछ भाई इस बीच भोपाल छोड़ चुके होते…

कुछ मित्र अब तक दो-चार शांतिदूतों को निपटा चुके होते लिख-पढ़ के… कुछ अपनी दोनाली लिए रातभर पहरा देते..

और तो और हमारे कुछ मित्र तो अब तक बीसों कविता नुमा पोस्ट लिख के कई पुलिस वालों को बर्खास्त करवा चुके होते.

‘भोपाल की भयावह रातें’ नामक उनका उपन्यास बेस्टसेलर होता. एक मित्र ‘भोपाल : नौ रातों का विमर्श’ नाम की अपनी 88 वीं किताब का विमोचन करवाते…….

तब दिग्गी का रूप देखते!!

जब डर के मारे घिग्घी बंध जाती…. इस बीच शेखुलरियों और वामियों का रूदन देखते…. मानवाधिकार गया तेल लेने..!!

मंज़र देखते ही बनता…!

तब लाकर मारते…. बिलकुल फर्जी तरीके से…

‘पैंतालीस बंगलों’ के मैदान में बिलकुल बड़े वाले संपादक जी के घर के सामने… 400 राउंड गोलियों की तड़-तड़… धायँ-धायँ….!!

उसी गोलीबारी में उनके कुकुरौ को उड़ा देते.

तब देखते संपादक जी का कहते!…. क्या बहादुरी… क्या हिम्मत… गज़ब शौर्य….

शेर है शेर, भोपाल पुलिस.

उस दिन 16 वो पेज पर संपादकीय लिखा जाता. सप्लीमेंट अलग से.

‘फर्जी सेकुलरिज्म आफत आने पर अपनी राह जानता है कि किधर से घुसना है’

तब आतंकी किसी मज़हब का नही होता. वह केवल और केवल आतंकी होता है बस.

देश के सभी राज्यों की पुलिस को इसमें महारत भी हासिल है…वही काम भोपाल पुलिस को भी करना चाहिए था…. क्या जल्दी थी.

तब देखते सारे भोपाली और प्रेस वाले मिलकर उन पुलिस वालों को अशोकचक्र तो छोडो परमवीर चक्र दिलवा के ही मानते.

सब कबाड़ कर दिया इन बेवकूफों ने.

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