भारतीय मुसलमान और भारतीय बुद्धिजीवी

”मुझे पता है कि अभी सुंदरता की कद्र नहीं है. चेहरे की सुंदरता, विचारों और आरजूओं की सुंदरता, सुंदर लिखावट, आंखों और नजरिए की सुंदरता और यहां तक कि मीठी आवाज की सुंदरता. – रेहाना जब्बारी

अपने साथ जबरदस्ती सेक्स करने की कोशिश करनेवाले शख्स को जान से मार देने के आरोप में करीब 7 साल से जेल की सजा काट रही रेहाना को 25 अक्टूबर को फांसी दे दी गई.

जब्‍बारी की सांकेतिक भाषा में आंखों की सुंदरता, चित्र, अभिनय और मूर्तिकला, नजरिए की सुंदरता में उत्‍कृष्‍ट दर्शनों, आदर्शों की सुन्‍दरता और मीठी आवाज की सुंदरता संभवत: संगीत और गायन के लिए आया है.

इस कातर स्‍वर के पीछे इसकी अपनी सुरुचि संपन्‍नता तो आती ही है इसका उत्‍कृष्‍टतम रूप उस वसीयत में है जिसमें उसने कामना की थी कि उसके मानवीय उपयोग में आ सकने वाले अंगों को जमीन में गाड़कर सड़ाने से अच्‍छा है फांसी के तुरंत बाद आंखे, हृदय, गुर्दा, किडनी, फेफड़ा और हड्डी तक निकाल कर इनको जरूरतमन्‍द रोगियों या अंगविकल व्‍यक्तियों को लगा दिया जाय.

ऐसा क्‍यों है कि इस्‍लाम में सुन्‍दरता के लिए जगह नहीं है और क्रूरता के लिए इतनी जगह कि गलती किसी की हो और किसी का खून बहा कर संतोष किया जाय.

गलती न हो तो भी खून करने में आनन्‍द लिया जाय. जिस जानवर को एक झटके में काट कर उसकी यातना को कम किया जा सकता हो उसे रेत कर मारा जाए.

विचार और पुनर्विचार के लिए इतनी कम जगह क्‍यों है कि जहां अक्‍ल से काम लिया जाना चाहिए वहां भी उत्‍तेजना से काम लिया जाय और आवेग को इतना प्रखर कर दिया जाय कि तार्किक सोच विचार की संभावना कम हो जाय.

क्‍यों उन औरतों को भी इतनी दहशत में रहना पड़ता है जो जानती है कि इस्‍लामी कानून इतने स्‍त्रीविरोधी हैं कि उन्‍हें अपना पक्ष तक रखते हुए डर लगे कि इसका अंजाम बुरा हो सकता है फिर भी वे कहें कि इस्‍लाम में औरत को बहुत सम्‍मान की जगह दी गई?

बहुविवाह सम्‍मान है? हिजाब सम्‍मान है? तीन तलाक सम्‍मान है? हलाला सम्‍मान है? अपने ऊपर हुए बलात्‍कार को सिद्ध करने के लिए इतने चश्‍मदीदों को पेश करना सम्‍मान है जितने हों और अपराध में शामिल न हों तो (उसी दशा में वे गवाह बन सकते है) अपराध हो ही न सके और ऐसा न कर पाने पर स्‍वयं मृत्‍युदंड पाना सम्‍मान है?

सुनते हैं और भी बहुत कुछ है जो इसी कड़ी में आता है, जिसे अपमान के सबसे गहित उदाहरण के अतिरिक्‍त कुछ नहीं कहा जा सकता, इससे परिचित होते हुए भी वह ऐसा कह सकती हैं और इसकी हिमायत कर सकती हैं, आश्‍चर्य इस पर होता है.

क्‍या बहुत सारी मुस्लिम महिलाओं के पास बुद्धि होती ही नहीं? नहीं, उन्‍हें इस हद तक कुचल दिया जाता है कि वे सोच नहीं सकतीं या आज्ञापालन के तरीके सोचने के अतिरिक्‍त सोच नहीं सकतीं. इस पर भी कि मुस्लिम पुरुषों में जिन्‍हें हम बुद्धिजीवी मानते हैं वे भी इन सवालों पर इनके विरोध में खड़ी होने वाली महिलाओं का साथ नहीं देते.

हिन्‍दू बुद्धिजीवी इससे बचते हैं यह बात समझ में आती है. वे संघ और भाजपा से अधिक कट्टरता से यह मानते हैं कि भारत हिन्‍दुओं का देश है और उनकी मुखरता हिन्‍दुओं तक सीमित रहनी चाहिए.

मानवाधिकार के सवाल हिन्‍दुओं तक सीमित रहने चाहिए और पुरुषों तक तभी जाने चाहिए जब उसका कारण कोई हिन्‍दू हो. हिन्‍दू हो कर वह भला ऐसा कैसे कर सकता था, मुस्लिम भले करते रहे. वे तो होते ही ऐसे हैं कि उन पर किसी बात का असर नहीं पड़ सकता.

मुसलमान किसी के साथ क्‍या करते हैं यह उनके विचार क्षेत्र में नहीं आता क्‍योंकि जहनी स्‍तर पर वे यहां के निवासी नहीं, मेहमान हैं. वे आपस में, अपनी महिलाओं के साथ या हिन्‍दुओं के साथ किस तरह का व्‍यवहार करते हैं यह मानवाधिकार की परिधि में नहीं आता.

यदि हिन्‍दुओं के प्रति उनकी इतनी इकहरी सोच न होती तो संघ और भाजपा तो गांधी जी की हत्‍या के बाद हाशिए पर आ ही गए थे, हाशिए पर रहते. इस सोच ने जिसे मैं कई बार दुहरा चुका हूं कि यह मुस्लिम लीग की सोच है, और यह भी समझा चुका हूं कि यह क्‍यों सेकुलरिस्‍टों में ही पाई जाती है (और बुद्धिजीवी तो होता ही सेक्‍युलर है इसलिए सारे बुद्धिजीवियों में पाई जाती है, जिसमें न मिले वह बुद्धिजीवी नहीं हो सकता).

इसलिए लीग अर्थात् सेक्‍युलरिज्‍म ने इस एक तरफा हमले, आक्षेप, योजनाबद्ध अपमान और सांस्‍कृतिक प्रदूषण के द्वारा भाजपा और संघ को स्‍वत:सिद्ध रूप में उदार, सर्वहितचिन्‍तक, सर्वधर्म समदर्शी, देशप्रेमी और प्रगतिशीलों से भी अधिक प्रगतिशील होने का दावा करने का और समाज के मूल्‍यांकन में पहले के किसी भी चरण से अधिक सम्‍मान पाने और इन दावों पर खरा उतरने का अधिकार दिया.

जब कि हिन्‍दू संस्‍कृति और सम्‍यताविमर्श के मामले में वह उत्‍पाती भले न हों नासमझी में अपना कीर्तिमान रखते हैं.

मेहमानी का भाव मुसलमानों में भी इतना गहरा है कि वे उस तरह के सुधार, उस तरह की वस्‍तुपरकता तक नहीं अपना पाते जिन्‍हें दूसरे, कई मामलों अधिक पिछड़े मुसलिम देश अपना चुके हैं.

उदाहरण के लिए बुतपरस्‍ती से परहेज के चलते वे मस्जिद, कुरान की पोथी, या किसी की समाधि या मजार के प्रति पूजा या भावनात्‍मक लगाव नहीं रखते जबकि सेक्‍युलर भारत में यह उल्‍टा है.

थोड़ी सी भी असुविधा या खरोंच पर उनका आवेश ऐसी बेचारगी का रूप ले लेती है जिसका मतलब होता है, उनके साथ अकारण जुल्‍म और जुल्‍म भी ऐसा जो इतिहास के सबसे क्रूर चरणों पर हुआ है हो रहा है और यह जिस तरह की उत्‍तेजना का प्रसार करता है वह किसी के लिए हितकर नहीं मानी जा सकती.

यह पोस्‍ट मैंने 29 को लिखी थी पर अधूरी रह गई थी. तब तक भोपाल जेल से पलायन करने वालों के एनकाउंटर का मामला न आया था. आज वह आ चुका है तो उससे बच नहीं सकता.

मुझे भी इस बात का पूरा विश्‍वास है कि भगोड़े आरोपियों के पास कोई कट्टा या बारूदी हथियार नहीं था. वे पुलिस वालों को पत्‍थर ही मार रहे थे कि वे उन्‍हें पकड़ने को आगे न बढ़ सकें.

वे घिर जाने के बाद भी समर्पण न करके ‘केवल’ पत्‍थर मार रहे थे इसलिए आदर्श स्थिति में उन पर जानलेवा गोली नहीं दागी जानी चाहिए थी. आदर्श स्थिति का अर्थ है जिसमें हम यांत्रिक वस्‍तुपरकता का निर्वाह कर सकें जिसके लिए बहुत कम देशों की पुलिस जानी जाती है और उनमें हमारा नाम नहीं आता.

परन्‍तु इसके अलावा दूसरी कहानियां मुझे उतनी ही जाली लगती हैं जितना जाली बहाना पुलिस अपने बचाव में तैयार करेगी. यह कि प्‍लेट को तोड़ कर उससे ऐसा हथियार नहीं बनाया जा सकता जिससे किसी की जान ली जा सके, अपराधियों की सर्जनात्‍मकता और कारनामों के इतिहास को जानबूझ कर झुठलाने जैसा है.

यह तथ्‍य कि वे विचाराधीन थे, छूट भी सकते थे, उन्‍हें निरपराध नहीं सिद्ध करता कारण छूटने के कारण दूसरे होते हैं, जिनमें सर्वविदित अपराधी छूटते रहते हैं.

यदि वे निरपराध होते तो उन्‍हें फैसले का इन्‍तजार करना चाहिए था, भागने का प्रयत्‍न नहीं. उन्‍हें जानबूझ कर भगाया गया, यह कहानी अपनी तार्किक परिणति में कुछ लंबी हो जाती है.

यह योजना इतनी बड़ी थी कि पहले उन्‍हें एक जेल से भगाया गया और फिर पकड़ा गया और ऐसी जेल में डाला गया जिसमें भागना कठिन था और इससे भगा कर सफाया किया गया. यह पल्‍ले नहीं पड़ता और यह तो पड़ता ही नहीं कि यह सरकारी योजना थी और जिनसे इसे कराया गया उनको ही सस्‍पेंड कर दिया गया और उनके विरुद्ध जांच बैठा दी गई.

परन्‍तु ये सन्‍देह मेरे हैं जिसने जान बूझ कर उसका पक्ष लेने का चुनाव किया जिस पर दूसरे सभी बुद्धि-जीवी पत्‍थर मारते है और वह भी इस दावे के साथ कि मैं अकेले उसे बचाने के लिए ही नहीं, पत्‍थर मारने वालों को पक्‍का अपराधी (हार्डेंड क्रिमिनल) सिद्ध करने जा रहा हूं और अपना बचाव कर सकते हो तो करो.

अभी तक मेरे बुनियादी आरोपों तक का भी जवाब किसी ने न दिया न आशा है कि इसका देगा. जो अपने ऊपर लगे आरोपों को नकार भी न सकें उन्‍हें दूसरों को परखने और निर्णय देने का अधिकार कैसे मिल गया.

पक्षधर होने के कारण मैं उन सारे आरोपों को जो लगाए गए विचारणीय और निष्‍पक्ष जांच के दायरे में मान लेता हूं, परन्‍तु यह मानता हूं कि अपने मित्र का ही नहीं, उस बल का किसके एक एक प्रतिनिधि के पीछे पूरे संगठन की शक्ति होती है, हत्‍या करने वालों का घिर जाने पर भी ऊंचाई का लाभ उठा कर उन तक पहुंचने वालों को रोकने के लिए पत्‍थर मारना या गिराना भी धैर्य चुकने और एनकाउंटर के लिए पर्याप्‍त कारण था.

इसके बाद भी यदि कोई भारत में लंबे समय से होते आए एनकाउंटरों का इतिहास नहीं जानता है और यह भूल चुका है कि सिख उग्रवादियों का सफाया करने और पंजाब में स्‍थायी शान्ति लाने के लिए जो एनकाउंटर किये गये थे वे इसकी तुलना में सैकड़ो गुना थे और उन पर हमारे बुद्धिजीवी भी चुप थे क्‍योंकि यह मुसलमानों के विरुद्ध नहीं था, इसलिए लीगी नजरिए से यह उपेक्षणीय था.

जबकि इस एनकांउटर के साथ हिटलर और उसके गैसचैंबर से नीचे की कोई मिसाल सामने आती ही नहीं.

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