इस्लाम की जिहादी विरासत और वामपंथी बुद्धिजीवी मीडिया

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जब से सिमी के आतंकियों को मप्र पुलिस ने मारा है तब से वामपंथी गिरोहों द्वारा प्रायोजित न्यूज़ चैनलों ने उन आतंकियों का छद्म बचाव करने में कोई कोताही नहीं बरती है.

उदाहरण के तौर पर एनडीटीवी का ट्वीट देखें तो उसने मारे गए उन आठ आतंकियों के लिए ‘आतंकवादी’ शब्द का उल्लेख तक नहीं किया. यद्यपि सिमी के वे सभी गुर्गे टेक्निकली अंडर ट्रायल ही थे तथापि उनका उद्देश्य क्या था यह उनकी जेल तोड़ने की रणनीति से प्रमाणित हो जाता है.

जेल कॉन्स्टेबल यादव की गला काट कर निर्मम हत्या करना किसी ‘स्टूडेंट मूवमेंट’ से सम्बंधित व्यक्ति का modus operandi नहीं हो सकता. इसके विरोध में कई अनर्गल तर्क दिए जा सकते हैं किंतु उन तर्कों को मनोवैज्ञानिक दुर्बलता के लक्षण के सिवा और कोई संज्ञा नहीं दी जा सकती.

जब भी किसी संदिग्ध को पुलिस द्वारा पकड़ा जाता है तो जाँच के दौरान सबसे पहले यह देखा जाता है कि अपराध करने के पीछे उस व्यक्ति या संगठन का उद्देश्य क्या रहा होगा. आखिर क्या कारण है कि सिमी (Student’s Islamic Movement of India) और इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठन ‘आतंकी’ घोषित किये जाते हैं?

इनके हीरो कौन लोग हैं? इसका जवाब हमें गुप्तचर विभाग (IB) के भूतपूर्व चीफ़ और सम्प्रति प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजित डोभाल के दो वर्ष पूर्व SASTRA यूनिवर्सिटी में दिए गए लेक्चर में मिल सकता है.

डोभाल साहब हमें इतिहास में पीछे ले जाते हैं और बताते हैं कि तेरहवीं सदी में जब अब्बासिद वंशजों और इस्लामी शासकों को मंगोलों से और ईसाईयों से दोहरी मार पड़ रही थी और उनके हाथ से स्पेन निकल चुका था तब इस्लामी जगत बहुत घबराया हुआ था.

जिन मंगोलों ने हमला किया था वे भी इस्लामी मत में परिवर्तित योद्धा थे और उनका लक्ष्य राजनैतिक सत्ता हासिल करना था. उसी दौरान तुर्की के मार्दिन शहर में एक इस्लामी स्कॉलर हुआ जिसका नाम इब्न तैमिया था.

इब्न तैमिया ने एक फतवा जारी किया जिसे मार्दिन फतवा कहा जाता है. उस फतवे में उसने लिखा कि मंगोलों को मारो क्योंकि वे हमारे राजनैतिक हितों के विरुद्ध हैं और ईसाईयों से स्पेन वापस हासिल करने के लिए लड़ो.

यहाँ डोभाल साहब कहते हैं कि इब्न तैमिया ने युद्ध करने के लिए इसलिए कहा क्योंकि मंगोल मुसलमानों के राजनैतिक विरोधी हो गए थे और ईसाई ग़ैर इस्लामी काफ़िर थे.

ध्यान देने वाली बात ये है कि इब्न तैमिया ने लिखा कि राजनैतिक हित को साधने के लिए मज़हब का सहारा लो. मुस्लिम जगत और शासक वर्ग के अब्बासिद वंशजों ने भी इसको नकार दिया और कालांतर में इब्न तैमिया की मृत्यु हो गयी.

इन सब के पश्चात सन् 1703 में दो व्यक्तियों का जन्म हुआ: मुहम्मद इब्न अब्द अल वहाब और वली उल्लाह. वहाब सऊदी में था और वली उल्लाह हिंदुस्तान में. संयोगवश ये दोनों सन् 1730 में मदीने में मिलते हैं और वहाँ इन्हें इब्न तैमिया के मार्दिन फतवे के बारे में पता चलता है.

वहाब ने सऊदी में वहाबी विचारधारा की नींव रखी और वली उल्लाह वापस हिन्दुस्तान लौट आया. उस समय भारत में औरंगज़ेब का शासन खत्म हो चुका था. यहाँ आकर वली उल्लाह ने सन् 1755-56 में अहमद शाह अब्दाली के नाम एक गुप्त पत्र लिखा जिसमें यह कहा कि मराठा, जाट, सिख आदि तेजी से उभर रहे हैं और यदि अब्दाली ने हिंदुस्तान पर आक्रमण नहीं किया तो वे पूरी तरह से हिन्दुस्तान पर कब्जा कर लेंगे.

वली उल्लाह ने यह पत्र गुप्त रूप से इसलिए लिखा था क्योंकि उस समय मराठा, सिख और जाटों के राजदरबार में मुसलमान हुआ करते थे जो अब्दाली के विरोध में बोल सकते थे. अर्थात् ऐसे मुसलमान भी थे जो इस्लामी मज़हब के नाम का राज नहीं चाहते थे. उनके लिए वही शासक था जिसके पास राजनैतिक सत्ता थी, यहाँ हिन्दू विरोधी मुसलमान सत्ता का प्रश्न नहीं था.

कालांतर में वली उल्लाह के समर्थकों ने पहला जिहादी गुट बनाया जिसका नाम था ‘तहरीक ए मुजाहिदीन’. यहाँ से भारत में जिहादी मानसिकता का आरंभ होता है. पहले इन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध जिहाद छेड़ा.

अंग्रेजों ने इनसे कहा कि हम तो कलकत्ता में हैं यहीं से चले जाएंगे लेकिन सिख तो तुम्हारे चिर प्रतिद्वंद्वी हैं, हम तुम्हें हथियार देंगे तुम सिखों को खत्म कर दो. अंग्रेजों की सहायता से और वली उल्लाह के पुत्र शाह अब्दुल अज़ीज़ से प्रभावित होकर सय्यद अहमद (शहीद) बरेलवी ने महाराजा रंजीत सिंह के विरुद्ध जिहाद छेड़ा.

परिणामस्वरूप सन् 1831 में सिखों ने मुजाहिदों के साथ इन जिहादियों को भी पराजित किया. सय्यद अहमद बरेलवी ने पहली बार भारत में जिहाद किया और वली उल्लाह के पुत्र शाह अब्दुल अज़ीज़ ने पहली बार भारत को दार-अल-हर्ब बताया जिसके अनुसार हिंदुस्तान ऐसा मुस्लिम बहुल मुल्क था जिसका शासक मुसलमान नहीं था इसलिए जिहाद आवश्यक था.

शाह वलीउल्लाह ऐसा व्यक्ति था जिसके बारे में एम जे अकबर ने अपनी पुस्तक Tinderbox में लिखा है कि उसने मुसलमानों को हिंदुओं से इतनी दूरी बना लेने को कहा था कि किसी मुसलमान को हिन्दू के घर जलने वाली आग तक न दिखाई दे. मतलब कि जो हिन्दू विरोधी मानसिकता औरंगज़ेब के साथ खत्म हो जानी थी उसे वलीउल्लाह ने ज़िंदा रखा.

डोभाल साहब अपने लेक्चर में आगे बताते हैं कि 1857 के युद्ध के बाद मौलाना नानोतवि और मौलाना गंगोही ने देवबन्दी मदरसा बनाया जिन्होंने कट्टर मुसलमान होते हुए भी कांग्रेस के साथ मिल कर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी.

ये सर सय्यद की विचारधारा से भिन्न थे जिनके नेतृत्व में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से द्विराष्ट्र सिद्धांत का जन्म हुआ. इस पूरी कथा में हमें दो महत्वपूर्ण तथ्य मिलते हैं. एक है राजनैतिक इस्लाम की विचारधारा द्वारा मज़हबी उन्माद का जन्म और दूसरी है कट्टर होते हुए भी जिहाद से दूर रहने की इस्लामी विचारधारा.

इन दोनों में राजनैतिक इस्लाम के जन्म के साथ मज़हबी उन्माद को बढ़ावा मिला. इन सबका स्रोत वही इब्न तैमिया की विरासत है. इब्न तैमिया और सय्यद बरेलवी ओसामा बिन लादेन सहित इंडियन मुजाहिदीन और सिमी के गुर्गों के हीरो हैं.

भारत में सन् 2000 से पहले पकड़े गए आतंकियों में ज्यादातर देवबन्दी हुआ करते थे किंतु विगत एक दशक से जो भी पकड़ा या मारा जाता है वह सलाफी वहाबी या अहले हदीसी मानसिकता से ग्रसित होता है.

श्री अजित डोभाल के लेक्चर में कुछ लोच भी हैं. उन्होंने इब्न तैमिया के पहले क्रूसेड के बारे में नहीं कहा और वली उल्लाह से पहले औरंगज़ेब के बारे में भी नहीं कहा.

प्रोफेसर शंकर शरण जी ने अपने आलेखों में लिखा है कि अमरीकी विशेषज्ञ सी क्रिस्टीन फेयर ने शोध में पाया कि लगभग हर आतंकवादी के दिमाग में 72 हूरों का फितूर अनिवार्य रूप से पाया जाता है.

सितंबर 11-2001 का कांड करने वाले मोहम्मद अट्टा के दिमाग में क़ुरान की आयतें थीं. परन्तु भारत में अभी भी मुसलमान तबके का अस्सी प्रतिशत शांति और चैन से रहना चाहता है यह भी एक तथ्य है. समस्या यह है कि बीस फीसदी तबका जो जिहाद में विश्वास रखता है वह असदउद्दीन ओवैसी और ज़ाकिर नाईक जैसों के नेतृत्व में बाकी के अस्सी फीसदी मुसलमानों के दिमाग में धीरे धीरे ज़हर घोलने में कामयाब हो रहा है.

इनका साथ देने में वामपंथी गिरोहों द्वारा प्रायोजित न्यूज़ चैनलों ने कभी कोई कोताही नहीं बरती है. इन्होंने जानबूझकर कभी इस्लामी आतंकवाद का नाम नहीं लिया. ऐसा कर के ये वामपंथी बुद्धिजीवी और मीडिया घराने भारत के मुसलमान के साथ दोगलापन करते हैं.

ये मुसलमानों को उनकी समस्या से अवगत ही नहीं कराना चाहते. इस कारण अस्सी फीसदी मुसलमान तबका यह समझ ही नहीं पाता ही उसका नेता कौन है: देवबन्दी, बरेलवी, या वहाबी.

देवबन्दी मदरसा अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा हुआ था उसने कभी भारत का विभाजन स्वीकार नहीं किया. विडंबना है कि आज भारत के मुसलमान को जमीयत उलेमा ए हिन्द और जमात ए इस्लामी में फर्क नहीं समझ में आता.

उसे मौलाना मौदूदी और अबुल कलाम आज़ाद में अंतर नहीं पाता. इसीलिए जो जन्म से वहाबी नहीं होता वह भी दाइश से प्रभावित हो जाता है और गेहूं के साथ घुन भी पीस जाता है. इसका सबसे बड़ा कारण है इस देश का वामपंथी बुद्धिजीवी वर्ग.

कुछ भी सीखने अथवा जानने के लिए दो तरीके होते हैं: या तो सबको एक समान दृष्टिकोण से देखा जाये या भेद कर के परखा जाये. हर विषयवस्तु generalization से नहीं समझी जा सकती.

बच्चा बोलना सीखता है तो यह समझता है कि पुरूष को पिता और स्त्री को माँ कहना है. बिना लिंगभेद किये हर मनुष्य मात्र को पिता नहीं कह सकता. उसी तरह ‘हर मुसलमान आतंकी नहीं होता’ की जगह ‘हर आतंकी मुसलमान क्यों होता है’ इस पर चर्चा करनी चाहिये.

वामपंथी गिरोहों को अपने अंदर झाँक कर देखना चाहिये कि वो आतंकियों का बचाव कर किसका भला कर रहे हैं. भला कर भी रहे हैं या आँखों में ‘भाला’ घुसा रहे हैं ये भी सोचना चाहिये. समस्या का निदान तब तक नहीं हो सकता जब तक समस्या का मूल पहचाना न जाये.

मज़हबी किताब में भले ही कुछ भी लिखा हो जब तक उस पर अमल न किया जाये वो कागज़ का एक टुकड़ा मात्र है. सैद्धांतिक रूप से कट्टर होना उन्मादी होने की निशानी भी नहीं है. कोई किसी मतानुसार किसके प्रति आस्था रखता है इससे समाज को बड़े स्तर पर फर्क नहीं पड़ता.

समस्या की जड़ है वहाबी और अहले हदीसी विचारधारा का प्रभाव एक आम मुस्लिम पर पड़ना और उसे इसके खतरे का भान न होना. जिसमें इस देश के मुसलमान लीडरों का रोल यह तय करता है कि कौन किसका बेहतर नुमाइंदा है.

किसी भी प्रकार के खतरे पर रणनीतिक प्रतिक्रिया करने से पहले यह स्वीकार करना आवश्यक है कि वास्तव में खतरा है. तीन तलाक, शरिया AIMPLB ये सब कूड़ा करकट राजनैतिक शह पर ही पनपा है इसे एक शासनादेश से खत्म किया जा सकता है. हालांकि जिहादी तत्व इस कट्टरपंथ का फायदा उठाते हैं लेकिन यदि शासन तन्त्र मज़बूत हो तो मज़हबी उन्माद और कट्टरवादी ताकतों को अलग किया जा सकता है.

इसमें सबसे अहम रोल समाज के दर्पण यानि मीडिया का है जिस पर वामपंथी बुद्धिजीवियों ने कब्जा जमाया है. वामपंथी बुद्धिजीवी मुसलमानों के बड़े भारी पैरोकार बनते हैं लेकिन उन्हें जिहादी मानसिकता से निकालने या उसका विरोध किस तरह किया जाये यह नहीं बताते.

एक उदाहरण देखें: गेटवे हाउस थिंक टैंक द्वारा आयोजित एक चर्चा में रजनी बक्शी तारिक फतह से इस बात पर बहस कर रही थीं कि अख़लाक़ का मारा जाना भी फासिस्म का उदाहरण है.

इन मूढ़मति लोगों को यह नहीं पता कि अख़लाक़ के बाद कोई दूसरा नहीं मारा गया जबकि वहाबी मानसिकता ने दाइश के रूप में एक ‘स्टेट’ का स्वरूप धर लिया है.

वामपंथियों को एक अखलाक पर आसमान सर पर उठाने की आदत है, वेदों में गोमांस भी खोज लेते हैं लेकिन अपने प्रिय मुसलमानों को जाकर यह नहीं कहते कि उनकी किताब में जो लिखा है उसे अक्षरशः न मान कर भी वे सुख से जी सकते हैं और जीने दे सकते हैं.

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