खालिस्तान – 3 : समापन

कई वर्ष पहले तक सिखों और असिख हिन्दुओं में विवाह-सम्बन्ध भी होते थे. तीसरी शक्ति की उपस्थित से ही इस प्रकार के झगड़े खड़े हुए हैं, वास्तव में आज भी इनका सम्प्रदाय-जीवन उन्हीं विचारों एवं अनुभूतियों से परिव्याप्त है, जिनसे कि शेष हिन्दुओं का.

अभी वर्तमान काल में ही शताब्दी पूर्व प्रत्येक हिन्दू परिवार से एक पुत्र ‘सिख’ नाम धारण करने वाला हुआ करता था, हमारे परस्पर रक्त-सम्बन्ध आज तक चले आ रहे हैं….

फिर ऐसा क्या हुआ कि सबकुछ बिखरने लगा, हर घर के पहले पुत्र के केश, कंघा कच्छा, कड़ा और कृपाण धारी सिख बनाने वाले हिंदू पराये हो गये और सिख अलग ‘धर्म’ की “पृथक धार्मिक पहचान वाले” बन गये…??

पंजाब की असल सशस्त्र खालिस्तान नामक समस्या की शुरुआत 1970 के दशक से अकाली राजनीति में खींचतान और अकालियों की पंजाब संबंधित माँगों के रूप में हुई थी.

सन् 1973 और 1978 ई. में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया, मूल प्रस्ताव में सुझाया गया था कि भारत की तत्कालीन केंद्र सरकार का केवल रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा पर अधिकार हो जबकि अन्य विषयों पर राज्यों को पूर्ण अधिकार हों यानि बिलकुल कश्मीर की तरह, पंजाब को भी सरासर धारा 370 सरीखी लगा कर पूर्ण स्वायत्तता देने सरीखी मांगे!

वे भारत के वृहद उत्तरी क्षेत्र में संपूर्ण स्वायत्तता चाहते थे उनकी माँग थी कि – चंडीगढ़ केवल पंजाब की ही राजधानी हो, पंजाबी भाषी क्षेत्र पंजाब में शामिल किए जाएँ, नदियों के पानी के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय की ही राय ली जाए, ‘नहरों के हेडवर्क्स’ और पन-बिजली बनाने के मूलभूत ढाँचे का प्रबंधन पंजाब के पास हो, फ़ौज में भर्ती काबिलियत के आधार पर हो और इसमें सिखों की भर्ती पर लगी कथित सीमा हटाई जाए, तथा अखिल भारतीय गुरुद्वारा क़ानून बनाया जाए, इन मांगों के सानिध्य में अकालियों का समर्थन और प्रभाव बढ़ने लगा था!

इसी बीच अमृतसर में 13 अप्रैल 1978 को अकाली कार्यकर्ताओं और निरंकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई. इसमें 13 अकाली कार्यकर्ता मारे गए. रोष दिवस में सिख धर्म प्रचार की संस्था के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

अनेक पर्यवेक्षक इस घटना को पंजाब में चरमपंथ की शुरुआत के रूप में देखते हैं. भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी पर सिख समुदाय में अकाली दल के जनाधार को घटाने के लिए जरनैल सिंह भिंडरांवाले को परोक्ष रूप से प्रोत्साहन देने का आरोप लगाया जाता है.

सन् 1980 में ही मूल अकाली दल का बादल गुट और तलवंडी गुट में विभाजन हो गया था तत्पश्चात अकाली दल – बादल का नाम शिरोमणि अकाली दल हो गया जो अभी पंजाब का सत्ताधारी दल है.

तलवंडी गुट का प्रभुत्व शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी / SGPC पर और संपूर्ण सिख समाज पर है. पर हाँ नवंबर 2014 में पंजाब में सिख संस्थाओं को शिरोमणि अकाली दल “बादल” के चुंगल से छुड़ाने के लिए पुराने संयुक्त अकाली दल “यूनाईटेड अकाली दल” का पुनर्गठन किया गया था.

दमदमी टकसाल के प्रवक्ता भाई मोहकम सिंह को इसका संयोजक बनाया गया, गुरदीप सिंह बठिंडा एसएडी के महासचिव बनाया गया, इसके साथ ही 26 सदस्यीय एक तदर्थ समिति भी गठित की गई.

अमृतसर के गुरूनानक भवन में आयोजित बैठक में एसएडी के पुनगर्ठन की घोषणा करते हुए गुरदीप सिंह ने कहा कि शिरोमणी अकाली दल का इतिहास कुर्बानियों वाला रहा है लेकिन बादल ने इसकी पहचान को नुकसान पहुंचाया है.

आज के अकाली दल बादल में रेत, बजरी तथा नशा माफिया शामिल हो गए हैं इसलिए सिख इतिहास की पहचान कायम रखने के लिए एसएडी के रूप में नए अकाली दल का गठन जरूरी हो गया था.

यहाँ सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि “यूनाईटेड अकाली दल” का गठन जरनैल सिंह भिंडरावाले के पिता बाबा जोगिन्दर सिंह ने किया था ,, कुछ पृथकतावाद के ही स्पष्ट होते इतिहास से ही समझे मित्रों….?

सिख कलैंडर के रूप में मान्यता प्राप्त हो चुकी तथाकथित नानकशाही_जन्त्री किन्ही ज्योतिर्विदों और कालगणना विशेषज्ञों की रचना नहीं अपितु ग्रिगोरियन, विक्रमी सम्वतों का घोलमेल है और अनेक संत बाबाओं, साधु मण्डलियों, इतिहासकारों तथा राजनीतिज्ञों द्वारा पकायी गयी खिचड़ी है.

पर चाहे जो हो, इसी से सिख पंथ की पहचान अलग बनती है का भाव निर्माता ने स्थापित किया, क्योंकि विक्रमी संवत् का प्रवर्तक राजा विक्रमादित्य तो हिन्दू था.बस यही पृथकतावादी भावना इतनी प्रबल है कि इंग्लैंड स्थित एक सिक्ख पृथकतावादी संगठन दल ‘खालसा’ के मनमोहन सिंह खालसा ने वैशाखी के पर्व पर पाकिस्तान के हसन अब्बदाल गुरुद्वारे में आनन्द विभोर होकर कहा कि इस जन्त्री की घोषणा से हम खालिस्तान की प्राप्ति के अपने लक्ष्य के नजदीक पहुंच गये हैं.

अनजाने में ही क्यों न हो नानकशाही तिथिपत्रक में पवित्र तिथियों का चयन करते समय खालिस्तान के लक्ष्य से प्रेरित हिंसा और आतंकवाद के इतिहास को महिमामंडित किया गया है.

तिथिपत्रक तैयार करने वाले पालसिंह पुरेवाल ने स्व. इंदिरा गांधी के हत्यारों सतवंत सिंह और बेअंत सिंह तथा भारत के प्रधान सेनापति जनरल वैद्य के हत्यारों हरजिंदरसिंह जिंदा और सुखदेव सिंह सुक्खा के शहीदी दिवस मनाने की सिफारिश की थी किन्तु रणनीति के तहत उन्हें हटा दिया गया.

नानकशाही जंत्री तिथिपत्रक में चार जून (ज्येष्ठ 21) को आपरेशन ब्लू स्टार और छह जून (ज्येष्ठ 23) को जरनैल सिंह भिंडरावाले के शहादत दिवस के रूप में मान्यता दी गयी है.

चिन्ता की बात बस यह है कि जिन गुरु नानक देव जी ने भारत की हजारों साल की आध्यात्मिक चेतना को स्वर दिया, दशमेश ने पूरे भारत की आध्यात्मिक वाणी को अपने भीतर संग्रहीत किया, जिन गुरु दशमेश ने अपने दशम ग्रंथ में भारत की समूची ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परम्परा को समाहित किया, उन्हीं महान गुरुओं के अनुयायियों के काल बोध को संकुचित करने का प्रयास किया जा रहा है.

और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति फिर से वही इतिहास दोहराने जा रही है जो उसने 1909 के विवादस्पद आनन्द कारज एक्ट 1928 में सिख मर्यादा के रूप में मान्यता देकर की थी, अकालियों की सहायता में महात्मा गांधी ने बड़ा योगदान दिया और कांग्रेस ने अकाली आंदोलन को पूरा-पूरा सहयोग दिया.

सन् 1925 से गुरुद्वारा ऐक्ट बनने के पश्चात् इसी के अनुसार गुरूद्वारा प्रबंधक समिति / GPC का पहला निर्वाचन 2 अक्टूबर 1926 को हुआ, अब नये नाम SGPC यानि शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक समिति के नाम से जाने जानी वाली है.

समिति का निर्वाचन प्रति पाँचवें वर्ष होता है इस समिति का प्रमुख कार्य गुरुद्वारों की देखभाल, धर्म प्रचार, विद्या का प्रसार इत्यादि है. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के अतिरिक्त एक केंद्रीय शिरोमणि अकाली दल भी अमृतसर में स्थापित है. इसके जत्थे हर जिले में यथाशक्ति गुरुद्वारों का प्रबंध और जनता की सेवा करते हैं.

तब से आज तलक व्यापक सिख समाज आनन्द कारज एक्ट के बारे में दुविधाग्रस्त है, इधर पंजाब में आतंकवाद और पृथकतावाद पर एक नजर दौड़ाने से मामला और अधिक स्पष्ट हो जाता है.

सन् 1857 की लडाई में अंग्रजों को भारतीय जमींदारों के अलावा गोरखा और सिखों ने सहयोग दिया इसके बाद से अंग्रेजों ने सिखों पर भरोसा करना प्ररंभ कर दिया इधर चंद नेता सिखों के मन में यह भाव जागृत था कि अंग्रेज जाने के बाद वे अपने सिद्धांतों का मुल्क ले लेंगे.

लेकिन जाते जाते अंग्रेज किसी कारण से ऐसा नहीं कर सके, तब इस मामले को लेकर मास्टर तारा सिंह ने इस विवाद को बनाये रखने के लिए सिखों को लामबंद किया और सिखों के अंदर यह प्रचारित किया कि दिल्ली उनके हकों के लिए उचित नहीं है, कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि तारा सिंह पाकिस्तान के साथ रहने की योजना बनाई थी लेकिन पाकिस्तान के निर्माता मुहम्मद अली जिन्ना के साथ तालमेल नहीं बैठने के कारण वे भारत के साथ आ गये.

लेकिन मास्टर तारा सिंह और उनके सहयोगियों के मन में यह भाव रह ही गया कि जिस प्रकार महाराजा रंजीत सिंह ने सिख राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर एक सिख राष्ट्र की नीव ,रणजीतशाही के तहत रखी थी उसी प्रकार सिखों का अपना एक देश, खालसा सिद्धान्त के तहत ही होना चाहिए, इस वैचारिक विषबेल को पुष्पित करने का काम कालांतर में कई सिख नेताओं ने किया लेकिन सबसे ज्यादा उसे मजबूत किया पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेसी #सरदार_ज्ञानी_जैल_सिंह ने………

ज्ञानी जैल सिंह ने सिखों के लिए अलग से एक दल बनाया और उस दल का नाम रखा #दल_खालसा जिसका अध्यक्ष #सरदार_जरनैल_सिंह_भिंडरावाले को बनाया गया.

इस देश में सबसे पहले न्यायालय को चुनौती देने का श्रेय सिख चरमपंथियों को जाता है, एक आपराधिक मामले में चरमपंथी दबाव के कारण गुरूद्वारा में न्यायालय लगाया गया और अपने ढंग से न्याय करवाया गया. इसका समर्थन कांग्रेस पार्टी ने भी किया और ज्ञानी जैल सिंह ने भी किया.

सिख चरमपंथों को उस समय और बल मिला जब केन्द्र सरकार के द्वारा कई स्तरों पर सिखों को रियायत दी जाने लगी, फिर देश के बाहर की शक्ति चरमपंथियों को सहयोग करने लगी,, उस समय संयुक्त राज्य अमेरिका पाकिस्तान के साथ था और पाकिस्तान सिख पृथकतावादियों को सहयोग करने लगा, खुली सीमा का लाभ लेकर सिखों को हथियार और पैसे पहुंचाये जाने लगे साथ ही मादक पदर्थों की खेप भी सिख युवाओं को दिया जाने लगी, सीमावर्ती क्षेत्र के आर्थिक दृष्टि से कमजोर सिखों ने नशे के कारोबार में अपनी ताकत झोक दी और उसके संरक्षण के लिए हथियार भी उठा लिया.

इधर सिख पंथ के जत्थेदारों में यह भावना भी घर करने लगी थी कि लगातार सिख युवक बाल कटवा रहे हैं और हिन्दू देवी देवताओं एवं पंडित पुजारियों की शरण में जा रहे हैं, जिससे सिख कौम को घाटा होगा इन तमाम वैचारिक बिन्दुओं को ध्यान में रखकर “सिख चिंतकों” ने भी पृथकतावाद को हवा देनी प्रारंभ कर दी,बस ये तमाम एेसे कारण है जिससे पंजाब में #खालिस्तानी_आतंकवाद का उदय हुआ.

देश और विदेशों में कई सिख अब भी उज्जवल सिंह मजीठिया, भिंडरावाले , जगतार सिंह हवारा समेत मास्टर तारा सिंह की ही अलगाववादी आवाज विदेशी सहयोग से बुलंद कर रहे हैं कि “बंटवारे में हिंदुओं को #हिंदुस्तान मिला (?) मुसलमान को #पाकिस्तान मिला, सिखों को क्या मिला..??

वे सिखों को अलग कौम मानते हैं और मानते हैं कि भारत में सिखों का दमन हो रहा है और यह भी मानते हैं कि मनुस्मृति शासन और हिंदू राष्ट्र के धारक वाहकों के साथ मिलकर सिखों की मौजूदा राजनीति सिखों की शहादत की विरासत के साथ गद्दारी कर रही है. वे खालिस्तान का ख्वाब पूरा करने के लिए रोज नई स्कीमें बना रहे हैं और भारत सरकार और उसकी खुफिया एजेंसियों को इसकी जानकारी होनी ही चाहिए.

वैसे भी बदबूदार पोतड़े कालीन या पलंग के नीचे डालकर छुपाने से उनकी बदबू नहीं छुपती,,,, अब तक विदेश संबंध, राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे शब्दों की आड़ लेकर कुकर्म करती व अपने कुत्सित कुकर्म छुपाती हर सरकार (चाहे काँग्रेस की, चाहे भाजपानीत चाहे तीजें पाँचवे मोर्चों की) को देरसबेर ‘एक राष्ट्रहित’ में सबकुछ सामने ला कर सार्वजनिक करना ही होगा.

और विदेशी जमीन से भारत विरोधी काम करने वालों पर सवाल उठा कर सख्ती से कार्यवाही करनी ही होगी चाहे वो विदेशी जमीन ब्रिटिश हो, कनाडाई हो, अमेरिकी हो, ऑस्ट्रेलियाई हो या यूरोपीय या कांग्रेस INC, AAP जैसी कुत्सित मानसिकता से लबालब भरी मानसिक रोगी पार्टियां हो….

जवाब तो माँगना ही पड़ेगा, कब तक लुंज पुंज नपुंसकता, हमारी ही चुनी सरकार के नाम पर सहन की जायें…???

– डॉ सुधीर व्यास की फेसबुक वाल से साभार

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