हिन्दू त्यौहार : वाणी और कर्म का अंतर

mera desh badal raha hai

नेहरु युग वाली कांग्रेसी मानसिकता से ग्रस्त लोगों को छोड़ दें तो पर्यावरण के संतुलन से हिन्दुओं का पुराना नाता रहा है. इसमें नेहरु युग की कांग्रेसी मानसिकता हम किसे कह रहे हैं वो समझना हो तो थोड़ा सा आस पड़ोस के लोगों, रिश्तेदारों वगैरह को याद कीजिये.

तुलना के लिए आपको दो तीन अलग अलग पीढ़ियों के लोगों को देखना होगा. जो लोग 1950-60 वाले दशक में जन्मे थे और अभी करीब सत्तर-अस्सी साल के बुजुर्ग हैं उनको देखिये. उसके बाद होता है 1970-80 के दौर वाला जनरेशन एक्स (जिसे कूल डूड पीढ़ी कहते हैं) ये लोग अभी 50 की आयु-वर्ग में होंगे. तुलना के लिए तीसरी पीढ़ी 2000 के बाद पैदा हुई जनरेशन वाय (Generation Y) को भी लीजिये.

अब रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली कलम (pen) देखिये, आपके आस पास ही पड़ी होगी. कई साल पहले फाउंटेन पेन इस्तेमाल होता था. जो बुजुर्ग वाली पीढ़ी है उन्होंने वही स्याही वाली कलम इस्तेमाल की है.

याद करने की कोशिश करेंगे तो याद आएगा कि इनका हैण्डराइटिंग पर भी बहुत ध्यान रहता था. जिन्हें दादा-दादी वाली पीढ़ी ने लिखना सिखाया होगा वो आसानी से बता देंगे कि पहले पेंसिल और फिर इंक-पेन से लिखना सिखाते समय ये लोग अच्छी राइटिंग के लिए लगातार टोकते रहते थे. जल्दबाजी में जैसे तैसे अक्षर लिख डालना उन्हें बिलकुल पसंद नहीं होता था.

ये कांग्रेसी मानसिकता के शुरू होने पर थोड़े बड़े हो चुके लोगों की पीढ़ी थी. उन्होंने कांग्रेसी मानसिकता देखी तो जरूर, लेकिन उस संस्कृति को अपनाया नहीं था. ये हिन्दुत्ववादी किस्म के लोग थे, बचपन से इन्होने पर्यावरण संतुलन अपने रोज़मर्रा के जीवन में ही ऐसे शामिल कर लिया था कि उसे निकाला ही ना जा सके.

इसके बाद वाली जो कूल डूड्स की जनरेशन एक्स वाली पीढ़ी थी वो बेचारे कांग्रेसी मानसिकता के चरम पर बच्चे थे. अभी जरूर 50-55 के हैं और कुछ नहीं सीखते लेकिन उस दौर में इन्हें गलत चीज़ें सिखा देना बड़ा आसान था.

यही वजह थी की “कल की किसको खबर, एक रात का ये सफ़र” इन्होने आसानी से सीख लिया. विदेशी चीज़ें इनके दौर में लाइसेंस-परमिट पर बड़ी मुश्किल से आती थी तो उसे शो ऑफ करने का तरीका भी बना लिया.

इनके हाथ में फिर से कलम देखिये जरा! क्या दिखा? अब पेन अगर आप विदेश से ले आये हैं तो थोड़े दिन शो ऑफ तो चलेगा, मगर उसका रिफिल तो यहाँ मिलेगा नहीं! यानि यूज एंड थ्रो की मानसिकता. रेय्नोल्ड, रोटोमैक, लिखो-फेंको वाली कलम से लैस कूल डूड्स की पीढ़ी.

पुरानी पीढ़ी जहाँ इंक पेन का निब टूटने पर सिर्फ निब बदलती थी, स्याही ख़त्म होने पर दोबारा ड्रॉपर-दवात से इंक भरती थी वहीँ इस पीढ़ी ने हर महीने कलम फेंकनी शुरू कर दी.

टोकने पे अब जरा कूल डूड्स की कांग्रेसी टेढ़ी भी देख लीजिये! फटाक से कह देंगे अजी एक पेन से क्या होगा? भारत की 50 प्रतिशत साक्षरता का मतलब 50 करोड़ लोग होते हैं. यानि सबने अगर 5 पेन भी फेंके तो भारत में 250 करोड़ पेन, प्लास्टिक के नॉन रीसायकलेबल कचड़े के तौर पर फेंक दिया है.

छोटी सी चीज़ बदल देने से क्या नुकसान हुआ ये याद दिलाने का, ये सिर्फ एक उदाहरण है. लेकिन ये इकलौता उदाहरण नहीं है. ये वही कूल डूड पीढ़ी है जो टीवी पर शाम होते ही “सांस में कभी बदबू थी” लगा के बैठ जाती है.

ये बिलकुल वही वाली पीढ़ी है जो “बदन के लिए इतना कुछ और दांतों के लिए कोयला?” वाला कोलगेट का प्रचार देखकर कोलगेट खरीदती थी और नीम से परहेज रखती थी. हल्दी के एंटीसेप्टिक गुणों की बात करने पर “प्रूफ दिखाओ, वीडियो लाओ” कहने वाले सारे कूल डूड इसी पीढ़ी के युगपुरुष हैं भइये!

सारे कूल ड्यूड्स गिन लीजिये सरकार, “बहुत किरंतिकारी” कदम होगा. सर दे साईं गिनिये, रोम का था नबी भी गिनिये, बरखा ‘राडिया’ दत्त भी गिनिये, अभी सेक्स मन्नू संघवी गिनिये, पचौरी गिनिये, तेजपाल गिनिये, महमूद फारुखी भी गिनिये. सारे कूल डूड जनरेशन एक्स वाले! तीन तलाक-चार निकाह के समर्थन में हल्ला-हलाला करने वाले मुल्लों को भी जोड़ लीजियेगा.

नयी पीढ़ी में बदला क्या है? भाई ये लोग सोशल मीडिया इस्तेमाल करने लगे. ये घर के बाहर “कुत्तों से सावधान” टांगने वाले लोग नहीं थे, इन्होंने सभी नए मित्रों से बात-संपर्क का स्वागत किया.

जब चीनी सामान का विरोध सिर्फ सोशल मीडिया का हल्ला है कहकर इन्हें टरकाने की कोशिश की गई तो ये सुनते भी नहीं. उधर कुहर्रम होता रहा और इधर नयी पीढ़ी ने चुपचाप खुदरा खरीद को 45% गिरा डाला.

शादियों में जहाँ कूल डूड, जनरेशन एक्स के लोग सूट में दिखते थे, वहीँ ये पीढ़ी कुर्ते-शेरवानी-दुपट्टे में नजर आने लगी. ऑर्गनिक फिर से महंगा बिकने लगा है. बिजली की झालर हटा कर ये दिए-पटाखे जलाने पर भी तुले हैं.

ऐसे दीयों से कीड़े मकोड़ों की गिनती कण्ट्रोल होती है, धुंए से डेंगू-चिकनगुनिया के मच्छड़ भी मरते हैं. पॉल्यूशन और इकोसिस्टम के लिए ये ए.सी. बंद कर के पेड़ लगा लेते हैं.

बच्चे अब फिर से अपने जन्मदिन पर, शुभ अवसरों पर पौधा लगाने की जिद करते हैं. पेड़ों पर्यावरण के मामले में इनके तौर तरीके फिर से वैदिक होते दिखते हैं (ऋग्वेद 5.43, 6.33, 13.22, 13.37, 13.49).

कांग्रेसी मानसिकता वाले कूल ड्यूड्स को राजीव और संजय गांधी को जरूर याद करना चाहिए. राजीव गाँधी पेड़ लगाने के लिए नहीं जाने जाते थे, योजनायें सुनाई देंगी उनके नाम पर मगर पेड़ नहीं दिखेंगे.

इसके विपरीत संजय गाँधी के नाम पर योजनायें नहीं सुनाई देंगी, लेकिन आज भी दिल्ली में आपको जितने बड़े पेड़ दिखाई देते हैं लगभग सब संजय गाँधी के लगवाए हुए हैं.

नतीजा और फायदा भी पूछना होगा ना कूल ड्यूड्स को? अच्छा तो फिर राहुल गांधी का डूबना देखिये, और वरुण के हर बार स्कैंडल से बच निकलने में देख लीजिये. इसमें आप अपना पाप-पुण्य और कर्म-फल का हिसाब किताब भी ढूंढ सकते हैं.

बाकी पर्यावरण पर अगर ज्ञान देने का मन हो तो अपने वड्डे से ऑफिस के सारे ए.सी. महीने भर के लिए बंद करवा के कार के बदले पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल कीजिये. साल भर में पॉल्यूशन उस से ही तो ज्यादा फैलता है !

ओजोन लेयर में छेद, माफ़ कीजिये deplete हो जाती है. पर उपदेश कुशल बहुतेरे कहने पर मजबूर मत कीजिये कूल ड्यूड, वाणी के बदले कर्म में अपनी मंशा जताइए.

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