ये कोई आलेख नहीं सो कोई शीर्षक भी नहीं, बस आग्रह है भारत का सैन्य इतिहास पढ़िये

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कल एक मित्र ने मुझसे कहा कि आज accession day है आपने कुछ लिखा नहीं. कश्मीर accession day का भारत के लिए क्या महत्व है मुझे सचमुच समझ में नहीं आता और आज की परिस्थितियों को देखते हुए इसके कारण स्पष्ट हैं.

डॉ कर्ण सिंह के पिता महाराजा हरी सिंह ने भारत में विलय के दस्तावेज पर किस दिन हस्ताक्षर किये थे, इस पर भी मतभेद है. प्रेम शंकर झा कहते हैं कि विलय 25 अक्टूबर को हुआ था, कोई कहता है 26 या 27 को तो अलस्टेर लैंब कहता है हरी सिंह ने हस्ताक्षर कभी किये ही नहीं.

ज्यादा जानकारी के लिए श्रीनाथ राघवन की War and Peace in Modern India देखें. हालांकि The Wire वेबपोर्टल ने कल ही नेशनल आर्काइव से Instrument of Accession की फोटो निकाल कर उपलब्ध करवाई है जिसमें हरी सिंह के हस्ताक्षर स्पष्ट हैं.

चन्द्रशेखर दासगुप्ता ने War and Diplomacy in Kashmir में लिखा है कि 1947 में भारतीय सेना के तत्कालीन ब्रिटिश कमांडर इन चीफ़ जनरल सर रॉबर्ट लॉकहार्ट को पाकिस्तान की तैयारी के बारे में पता था लेकिन उसने जानबूझकर नेहरू समेत राजनीतिक नेतृत्व को काफी समय तक अँधेरे में रखा और जब बताया तब भी नेहरू का रवैया ढीला ढाला था.

दरअसल भारत का विभाजन कर के पाकिस्तान को अलग करना, और कश्मीर को नासूर बनाना ये अंग्रेजों और मुसलमानों का साझा षड्यंत्र था जो पूरी तरह से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर वर्चस्व कायम करने के उद्देश्य से किया गया था.

यूरोपीय देशों ने पहले ही secularism की परिभाषा गढ़ कर state और Christian religion को अलग कर दिया जिससे उन्हें ईसाईयत को गुप्त छद्म state policy के रूप में इस्तेमाल करने का मौका मिला. मिशनरी ईसाई मत का प्रचार ही नहीं करते, बल्कि इंग्लैंड अमरीका की Breaking India नीति को ही लागू करते हैं.

एक उदाहरण देखें. स्वतन्त्रता से पूर्व ब्रिटिश राज में जब वनवासियों पर अंग्रेजों ने अपने कानून थोपे तो उन्होंने सशस्त्र प्रतिकार किया.

एक मिशनरी ने लिखा कि, ‘वे सभी ओर से आते थे, झुण्ड के झुण्ड…’ वनवासियों के प्रतिकार की वजह तो समझ में आती है लेकिन उस समय ये मिशनरी वहाँ क्या कर रहा था? ईसाईयत का ज्ञान क्यों बाँट रहा था?

वनवासी तो सर्वथा सक्षम थे उनका जंगल जमीन पानी ही उनका देवता था. यही राजनीतिक रणनीति आज नक्सली और उनके नेता अपनाते हैं. इस्लाम के बारे में तो मौदूदी, इब्न ए तैमिया और अयतोल्लाह खोमैनी ने साफ़ कहा है कि पूरा इस्लाम ही राजनीति है.

हमारे गुरूजी कहते हैं कि इतिहास पढ़ते समय प्रश्न किया करो. प्रश्न ये है कि हमें भारत का सैन्य इतिहास क्यों नहीं पढ़ाया जाता? 1947 में एयर फ़ोर्स द्वारा किया गया ऑपरेशन इतना बड़ा था कि उसकी तुलना विश्व युद्ध की किसी जंग से ही की जा सकती थी.

प्रथम परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा ने कबाइलियों से लड़ते समय कहा था कि मैं आखिरी गोली तक लड़ूंगा और एक इंच पीछे नहीं हटूंगा. कुमाऊं रेजिमेंट में अभी भी मेजर शर्मा को पूजा जाता है.

एक बार मेरे मित्र ने फोन किया और पूछा कि, ‘यार तेरे पास कोई किताब है जिसमें इंडिया की ‘हारी हुई’ battles का विवरण दिया हो?’

मेरा दोस्त खुद आर्मी में है पर किताब मुझसे पूछ रहा था. मैंने गर्व से कहा, ‘भारत ने 1962 के अलावा कोई war आज तक हारा ही नहीं.’

इस पर वो हँसा. उसने कहा कि, ‘मैं war की नहीं battles की बात कर रहा हूँ.’ तब मेरा पारा ठण्डा हुआ.

उसने टेक्निकल बात की थी. छोटी छोटी कई battles मिला कर युद्ध यानि war होता है. हमने कई battles लड़ाईयां हारी भी हैं. किंतु अज्ञानतावश हम युद्ध का सही अर्थ ही नहीं जानते.

कुछ दिन पहले एक अन्य मित्र ने सैम मानेकशॉ पर पोस्ट लिखी थी. विडंबना देखिये इंदिरा गांधी ने 1971 के बाद ही वन रैंक वन पेंशन खत्म कर दी थी. यह एक विजेता आर्मी को दिया गया उपहार था.

[निराधार प्रश्न उठाते ही इसलिए हैं, ताकि ढंके रहें काले कारनामे]

इंदिरा सैम की लोकप्रियता से डरती थीं इसीलिए उन्हें फील्ड मार्शल की मानद रैंक से नवाज़ा. 5 स्टार फील्ड मार्शल कभी रिटायर नहीं होते इसीलिए सैम हमेशा वर्दी पहन सकते थे.

आज़ादी के बाद ब्रिटिश इंडियन आर्मी का एक तिहाई पाकिस्तान को मिला था. जो अफसर या ‘other rank’ जिस देश की नागरिकता लेता उस हिसाब से उसे आर्मी की नौकरी बरकरार रखने को मिलती. किसी को इंडियन या पाकिस्तानी आर्मी खुद से चुनने की आज़ादी नहीं थी.

सैम ने यह मजाक में कहा था कि यदि उन्हें पाकिस्तानी आर्मी का जनरल बनाया जाता तो पाकिस्तान विजयी होता. जब सैम 90 के हुये थे तब मैंने हिन्दू में पढ़ा था. जब उनका देहांत हुआ था तब तत्कालीन आर्मी चीफ़ भी नहीं गए थे. मेरे लिए यह खबर पीड़ादायक थी.

मजेदार बात देखिये सैम बहादुर को फील्ड मार्शल हड़बड़ाहट में बनाया गया फिर देखा गया कि उनसे सीनियर जनरल कोदनदेरा मदप्पा करिअप्पा अभी जिन्दा हैं तो फिर उनको भी फील्ड मार्शल की रैंक दी गयी. उस वक़्त भारत में दो 5 स्टार फ़ील्ड मार्शल थे.

फील्ड मार्शल करिअप्पा का जन्म कूर्ग में हुआ था. कर्नाटक के मादिकेरी जिले में एक संग्रहालय है जिसमें उनसे जुड़ी चीजें रखी गयी हैं. मैं जब वहाँ गया तो ऐसा लगा जैसे समुद्र से निकले किसी पुराने क्षतिग्रस्त जहाज के अंदर घुस गया हूँ.

करिअप्पा की एक बड़ी सी तस्वीर सहित तमाम चीजें वहाँ रखी हैं लेकिन फोटो खींचने की इजाजत नहीं है इसलिए बाहरी व्यक्ति कुछ जान ही नहीं पाता. कूर्ग में करिअप्पा के नाम के स्कूल हैं वहाँ के निवासी उन पर गर्व करते हैं. एक समय में पाकिस्तान करिअप्पा से थर थर काँपता था.

हमें सैन्य इतिहास क्यों पढ़ना चाहिये? इसलिए पढ़ना चाहिये क्योंकि इतिहास हमें गलतियां स्वीकार करने पर विवश करता है. जब तक हम मानेंगे नहीं कि गलती हुई थी तब तक सुधार की कोई गुंजाइश नहीं.

सैन्य इतिहास पर विमर्श हमें भविष्य की राह दिखाता है. इससे सैन्य नागरिक सम्बन्ध यानि civil military relations मजबूत होते हैं. राज्य अपनी सेनाओं को नागरिकों की रक्षा हेतु ही खड़ा करता है. इन दोनों संस्थान में समन्वय तथा सामंजस्य नहीं होगा तो किसी देश की सामरिक संस्कृति का उत्थान कभी नहीं होगा.

देश के संसाधन भोग विलास की निर्मिति के लिए ही उपयोग में लाये जाएंगे जिससे National Power यानि राष्ट्रीय शक्ति क्षीण होती है परिणामस्वरूप राष्ट्रीय सुरक्षा का ढांचा जगह जगह क्षतिग्रस्त होता दीख पड़ता है.

अजित सिंह अपने अंदाज़ में पंजाब के मोतीमहल की कहानियां सुनाते हैं जहाँ सैकड़ों रानियाँ हुआ करती थीं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उसी मोतीमहल के राजा के वंशज कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रथम विश्व युद्ध में भारत के योगदान का सैन्य इतिहास लिखा है.

[महाराजा भूपेन्द्र सिंह का चैल… The land of romance]

अमरिंदर की महत्वपूर्ण पुस्तक है: Honour and Fidelity जिसमें ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सैन्य अभियान का पूरा लेखा जोखा है. यह कहा जा सकता है कि उस समय तो वे सिपाही अंग्रेजों का नमक खाते थे इसलिये उनके लिए लड़े थे. किंतु जब हम उन सैनिकों के लिखे वह पत्र देखते हैं जो उन्होंने सुदूर अपने गाँव और परिजनों के लिए लिखे थे तब समझ में आता है कि परोक्ष रूप से उन्होंने भारत भूमि की ही रक्षा की थी.

अमरिंदर सिंह की पुस्तक में एक चित्र है जिसमें एक सैनिक अपने सर के ऊपर गुरू ग्रन्थ साहिब लेकर चल रहा है और उसके पीछे पूरी पलटन चल रही है. यह दृश्य शायद अफ्रीका का है. 2014 में जनरल वी के सिंह ने गल्लिपोलि में जाकर उन हुतात्माओं को श्रद्धांजलि दी.

इसी तरह 1857 की क्रांति को कोई इस्लामी विद्रोह कहता है तो कोई Mutiny of Sepoys लेकिन इस युद्ध की चर्चा उस जमाने में इंग्लैंड अमरीका के अखबारों में महीनों तक होती थी यह कम लोग जानते हैं. इटली के जनरल जिउसेप् गैरीबाल्डी 1857 की क्रांति से इतने प्रभावित थे कि भारत की ओर चल पड़े थे.

सभी ने राष्ट्रपति भवन का अशोक हॉल टीवी पर जरूर देखा होगा. भारत के राष्ट्रपति के पीछे जो जवान खड़े होते हैं उनकी बांह पर President’s Bodyguards लिखा होता है.

भारतीय सेना की यह रेजिमेंट 1773 में बनारस के रामनगर में वारेन हेस्टिंग्स द्वारा बनाई गयी थी. तब से अब तक इसके कई नाम हुए हैं. भारतीय सेना को स्वभावतः apolitical यानि राजनीति से सर्वथा दूर होना चाहिये.

यही अराजनीतिक परिवेश सेना की अप्रतिम विश्वसनीयता को बरकरार रखता है. लेकिन जनता के साथ सेना का जुड़ाव होना जरूरी है क्योंकि एक सैनिक उसी नागरिक परिवेश से आता है जिसकी रक्षा के लिए वह शस्त्र धारण करता है.

थोड़ा और पीछे जाएँ तो मुग़लों और मराठों की सेना की तुलना दिखती है. एयर वाईस मार्शल अर्जुन सुब्रमण्यम ने India’s Wars में फिलिप मेसन को उद्धृत करते हुए लिखा है कि मराठा सेना मुगलों से कई गुना ज्यादा शक्तिशाली अनुशासित और संगठित थी. उन्हें बेहतर रणनीतिक कौशल प्राप्त था. यदि शिवाजी कुछ वर्ष और जीवित रह जाते तो मुगलों को भागना पड़ जाता. आज भी सेना में मराठा रेजिमेंट, सिख, पंजाब, महार, बिहार आदि रेजिमेंट हैं.

अंत में यह कहना चाहता हूँ कि सैन्य इतिहास का अर्थ महाभारत काल की व्यूह रचना ही नहीं होती. आप सहस्रों वर्ष पूर्व की रणनीति जानकर क्या करेंगे जब आपको पचास साल पहले 1965 का इतिहास नहीं पता है.

आज के युद्ध नागपाश से नहीं होविट्ज़र से लड़े जाते हैं, ब्रह्मास्त्र था या नहीं लेकिन ब्रह्मोस हमारे पास है. अभी कुछ दिन पहले ही गोरखा रेजिमेंट ने यूरोप के कैंब्रियन पहाड़ों पर विश्व के सबसे कठिन युद्धाभ्यास में गोल्ड मेडल जीता है.

2014 में यह डोगरा रेजिमेंट के नाम था. जंगल में हमसे बेहतर कोई नहीं लड़ सकता. Counter Insurgency and Jungle Warfare School में हम अमरीकियों को सिखाते हैं.

अतः मेरा आग्रह है कि भारत का सैन्य इतिहास पढ़िये और जानिये. ये कोई आलेख नहीं है. इसका कोई शीर्षक नहीं है… बस जो दिमाग में आया लिख दिया.

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