खालिस्तान – 1 : मास्टर तारा सिंह

बहुत कम लोगों को खालिस्तान नामक मांग की सोच समेत वर्तमान पंजाब राज्य निर्माण के पीछे का इतिहास ही पता होगा .. बहुत संक्षिप्त रूप से मुख्य बिन्दु पेश कर रहा हूँ.

भारत विभाजन की प्रक्रिया के समय अकाली दल का मास्टर तारासिंह जो कि जिन्ना का मित्र भी था उसने क्रिस्प कमीशन से जाकर सिक्खों के लिए एक अलग देश की मांग की जिसका नाम था खालिस्तान.

क्रिस्प को खालिस्तान विषय पर कुछ ज्ञान नहीं था अधिक तो उसने मास्टर तारा सिंह को कहा कि वो एक सर्वे करे पूरे पंजाब का, और यदि मास्टर तारा सिंह पूरे पंजाब (भारत-पाकिस्तान ) में से एक भी सिख बहुसंख्यक जिला सिद्ध कर देगा तो वो खालिस्तान की मांग पर भी विचार करेगा क्रिस्प को समय भी मिल गया.

अंतत: मास्टर तारा सिंह उस समय एक भी सिख Majority जिला पूरे पंजाब सूबे में नही दिखा पाया और उसका खालिस्तान का सपना अधूरा रह गया. उसके बाद भी खालिस्तान की मांग को लेकर अकाली दल और मास्टर तारा सिंह नेहरु के चक्कर लगाते रहे परन्तु नेहरु ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया.

उस समय PEPSU नामक एक राज्य होता था भारत में जिसका नाम है (Eastern Punjab & Patiala State Union), इस PEPSU राज्य का बॉर्डर पहले दिल्ली के पास होता था मास्टर तारा सिंह और अकाली दल ने पहले भाषा के आधार पर PEPSU राज्य का विभाजन करवाया पटियाले से उस तरफ गुरुमुखी लिपि को राज्य में लागू कर दिया गया और अम्बाला से इस तरफ देवनागरी लिपि ही रही.

उसके बाद नवम्बर 1966 को मास्टर तारा सिंह और अकाली दल ने मिलकर PEPSU राज्य को तीन राज्यों में बाँट दिया (Trifurcation) गया और पंजाब, हरियाणा, तथा हिमाचल प्रदेश का निर्माण हुआ ..!!

कालचक्र कहिये या कुछ भी बाद में मास्टर तारा सिंह की पुत्री की हत्या भी खालिस्तान आतंकवादियों द्वारा ही की गई !

वर्तमान पंजाब और सिख राजनीति के एक बड़े चेहरे होते थे ये उपरोक्त वर्णित “मास्टर तारासिंह”. मास्टर तारासिंह ने प्रथम विश्व युद्ध के समय राजनीति में प्रवेश किया था उन्होंने ब्रिटिश सरकार की सहायता से सिखपंथ को बृहत् हिंदू समाज से पृथक् करने के सरदार उज्जवलसिंह मजीठिया के प्रयास में हर संभव योग दिया.

ब्रिटिश सरकार को प्रसन्न करने के लिए सेना में अधिकाधिक सिक्खों को भर्ती होने के लिए प्रेरित किया, सिक्खों को इस ब्रिटिश राजभक्ति का पुरस्कार भी ब्रिटिश नागरिकताओं, यूरोपीय नागरिकताओं समेत भरपूर मिला.

सब रेलवे स्टेशनों का नाम गुरुमुखी में लिखा जाना स्वीकार किया गया और सिक्खों को भी मुसलमानों की भाँति इंडिया ऐक्ट 1919 में पृथक् सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया.

महायुद्ध के बाद मास्टर जी ने सिक्ख राजनीति को कांग्रेस के साथ संबद्ध किया और सिक्ख गुरुद्वारों और धार्मिक स्थलों का प्रबंध हिंदू मठाधीशों और हिंदू पुजारियों के हाथ से छीनकर उनपर अधिकार कर लिया.

इससे अकाली दल की शक्ति में अप्रत्याशित वृद्धि हुई. मास्टर तारासिंह शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी के प्रथम महामंत्री चुने गए. ग्रंथियों की नियुक्ति उनके हाथ में आ गई. इनकी सहायता से अकालियों का आंतकपूर्ण प्रभाव संपूर्ण पंजाब में छा गया. मास्टर तारासिंह बाद में कई बार शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष चुने गए.

(क्रमश:)

  • डॉ सुधीर व्यास

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