बब्बा कहिन : आपने सिगरेट पी, गए! आप आदमी नहीं रहे, कीड़े-मकोड़े हो गए!

“दुर्लभ पदार्थों की खोज आचरण को भ्रष्ट कर जाती है.’
असल में, आचरण बड़ी गहरी चीज है. आचरण का ऐसा मतलब नहीं है कि एक आदमी सिगरेट नहीं पीता, तो बड़ा आचरणवान है. ऐसा कुछ मतलब नहीं है. क्योंकि कभी-कभी तो ऐसा हो सकता है कि सिगरेट न पीने के कारण वह जो कर रहा हो, वह और भी बड़ी आचरणहीनता हो. क्योंकि हमको सब्स्टीटयूट खोजने पड़ते हैं, विकल्प खोजने पड़ते हैं.

इसलिए आपने अनुभव किया होगा कि अक्सर जो लोग सिगरेट पीते हैं, पान खाते हैं, चाय पीते हैं, काफी पीते हैं, कभी थोड़ी शराब भी पी लेते हैं, वे ज्यादा मिलनसार आदमी होते हैं. जो इनमें से कुछ भी नहीं करते, उनसे दोस्ती बनानी तक मुश्किल है, वे मिलनसार होते ही नहीं. बहुत अकड़े हुए होते हैं.

क्योंकि वे सिगरेट नहीं पीते, चाय नहीं पीते, तो उनकी रीढ़ बिलकुल अकड़ जाती है, झुकती ही नहीं. वे दूसरे की तरफ ऐसे देखते हैं, जैसे वे आसमान पर खड़े हैं, दूसरा कीड़ा-मकोड़ा है. उनको आदमी नहीं दिखाई पड़ते.

आपने सिगरेट पी, गए! आप आदमी नहीं रहे, कीड़े-मकोड़े हो गए. आप पान खा रहे हैं, आप गए. आपकी कोई स्थिति न रही. तो इससे तो बेहतर था यह आदमी सिगरेट पी लेता. सिगरेट पीने से इतना कुछ नुकसान न था. यह जो अहंकार पी रहा है, यह बहुत खतरनाक है, जहरीला है.

इसलिए तब तक मैं किसी आदमी को भला नहीं कहता, जब तक इतना भला न हो कि दूसरे की बुराई को पाप मानने की प्रवृत्ति में न पड़े. तब तक कोई आदमी भला नहीं है, तब तक आचरणवान नहीं है.

आचरण का एक ही अर्थ है कि इतना भला है कि दूसरे की बुराई को भी बुराई नहीं देखता. दूसरे की निंदा करने की क्षमता का खो जाना आचरण है. तब तो हमारे तथाकथित साधु-संन्यासी आचरण में नहीं टिक सकेंगे, हैं भी नहीं.

आपके और उनके आचरण में भेद नहीं है; सिर्फ चीजों का भेद है. जो आप कर रहे हो, उसकी वजह से आप पापी हो; वही वे नहीं कर रहे हैं, इसलिए पुण्यात्मा हैं. लेकिन टिके दोनों ही सिगरेट पर हैं; वे नहीं पी रहे हैं, आप पी रहे हो. लेकिन दोनों का आचरण सिगरेट से बंधा है.

अगर आप अपने साधु की साधुता पूछने जाएं, तो पता क्या चलेगा? वह यह नहीं खाता, यह नहीं पीता, यह नहीं पहनता, यह उसकी साधुता है! और आपको वह साधु लगता भी है. लगना स्वाभाविक भी है, क्योंकि आप यह खाते हैं, यह पहनते हैं, यह पीते हैं. तो यह भेद है आपके आचरण का.

और अक्सर यह जो साधु है, यह खतरनाक हो जाता है. क्योंकि यह आदमी आपकी ही हैसियत का है. अगर यह सिगरेट पीता, तो आप ही जैसा होता. यह सिगरेट नहीं पीता है, तो सिगरेट न पीने का जो कष्ट उठा रहा है, जो पीड़ा झेल रहा है, उसको यह तप कहता है, उसको तपश्चर्या कहता है.

अब सिगरेट न पीना कोई तपश्चर्या है? सच तो यह है कि सिगरेट पीना ही तपश्चर्या है. धुएं को डालना और निकालना काफी तप है. साधु-संन्यासी पुराने धूनी रमा कर बैठते थे. आप अपनी धूनी साथ में लिए, पोर्टेबल धूनी अपनी साथ लिए घूम रहे हैं, तप कर रहे हैं.

आग और धुआं दोनों मौजूद हैं. और जहर पी रहे हैं. एक आदमी यह नहीं पी रहा है, वह तपस्वी है! वह आपके सिर पर खड़ा हो जाएगा. वह जब भी आपकी तरफ देखेगा, तो उसकी आंखों में नर्क की तरफ का इशारा रहेगा कि सीधे नर्क जाओगे. और कहीं कोई उपाय नहीं है.

आचरण इन क्षुद्र चीजों से निर्मित नहीं होता. कम से कम लाओत्से जैसे व्यक्ति की धारणा आचरण की यह नहीं है. लाओत्से की आचरण की धारणा बड़ी अदभुत है. लाओत्से कहता है, जो लोग बाहर की वस्तुओं को पाने में दौड़ते रहते हैं, दुर्लभ, विचित्र वस्तुओं को पाने में दौड़ते रहते हैं, उनका आचरण भ्रष्ट हो जाता है. तो इसका मतलब यह हुआ कि जो बाहर की वस्तुओं को पाने के लिए नहीं दौड़ते, वे आचरण को उपलब्ध हो जाते हैं.

तो आचरण का अर्थ हुआ, जो इतने तृप्त हैं अपने भीतर कि बाहर की कोई चीज उन्हें पुकारती नहीं. एक अंतःतृप्ति का नाम आचरण है. एक सेल्फ कंटेंटमेंट का नाम आचरण है. इतना तृप्त है कोई व्यक्ति अपने भीतर कि बाहर की कोई चीज उसके लिए दौड़ नहीं बनती–कोई चीज दौड़ नहीं बनती.

इसका मतलब हुआ कि कोई चीज उसे दौड़ा नहीं सकती है. कोई चीज इतनी महत्वपूर्ण नहीं है कि उसे दौड़ना पड़े. जो इतना थिर है अपने में कि जगत की कोई चीज उसे दौड़ा नहीं सकती. लाओत्से कहता है कि उसके पास आचरण है, करेक्टर है. उसके पास वर्चू है, उसके पास गुण है.

निश्चित ही, अगर कोई व्यक्ति अपने में इतना भरा-पूरा है, कहीं कोई कमी अनुभव नहीं करता कि किसी चीज से भरी जाए, तो उसके पास एक आत्मा होगी, एक इंटिग्रेटेड विल, उसके पास एक समग्रीभूत संकल्प होगा. उसके पास एक भीतर व्यक्तित्व होगा, एक स्वर होगा, एक ढंग होगा. उसका जीवन एक ऐसी ज्योति की तरह होगा, जिसे हवा के झोंके हिला नहीं सकते.

  • बब्बा (ओशो)

 ताओ उपनिषाद (भाग–2) प्रवचन–28

 

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