अंग्रेज चले गए, छोड़ गए अंग्रेजियत!

अंग्रेजों ने हमेशा कहा कि वे भारत में शासन के इरादे से नहीं आए, बल्कि उनका तो यही दावा रहा कि दुनिया की असभ्य जातियों को सभ्य बनाने का काम स्वयं ईश्वर ने उन्हें सौंपा है और दूसरों पर शासन कर वे एक ईश्वरीय कार्य कर रहे हैं.

उन्होंने प्रचारित किया वेद गड़ेरियों का गाया गीत है, भारत बाहर से आए काफिलों और कारवाँ से अस्तित्व में आया अलग-अलग राष्ट्रीयता वाला टुकड़ों में बँटा देश है, साँप के आगे बीन बजाना, पेड़-पत्थर-पहाड़ों को पूजना, जादू-टोनों में विश्वास ही यहाँ की मूल पहचान है.

रूढ़ियों और दकियानूसी अंधविश्वासों से चिपके इस देश के पास गर्व करने जैसा कुछ भी नहीं है. इसके पास न सोच है, न संस्कृति; न भाषा है, न अभिव्यक्ति. देखो, हमारे पास शेक्सपियर है, वर्ड्सवर्थ है, शेली है, कीट्स है, तुम्हारे पास क्या है? संस्कृत मुर्दों की मृत भाषा है, हिंदी की हिंदी हो गई, तो बचा क्या?

आज देश के हर शहर, हर गली, हर चौराहे पर कुकुरमुत्ते की तरह उग आई अंग्रेजी सिखाने वाली संस्थाओं को देखकर क्या निष्कर्ष निकाला जाए? सबका यही दावा कि वे आपको अमेरिका और इंग्लैण्ड से बेहतर अंग्रेजी सिखाएँगे. फ़ोनेटिक्स के नाम पर भयानक आतंक फैला रखा है, सो अलग.

दुनिया के किसी भी मुल्क में घूम आइए वहाँ बोली जाने वाली देसी-विदेशी भाषा वहाँ के परिवेश में रची-बसी होती है. विदेशी भाषा को भी लोग स्थानीय अंदाज़ में बोलते हैं और दुनिया उन्हें उसी रूप में स्वीकार करती है.

पर भारत में लोगों को पक्का अंग्रेज या अमेरिकन बनना है, इससे कम पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है. और यह स्थिति केवल उन्हीं देशों की है जो लंबी गुलामी के दौर से गुजरे हैं.

अंग्रेजों के मानस-पुत्रों को छोड़ दीजिए, गुलामी की ग्रन्थियाँ जनसाधारण के मन में भी गहरे पैठी है. वरना हम अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपनी परंपराओं को यों अपमानित नहीं करते. कैलेंडर आपका नहीं, नव वर्ष आपका नहीं, रीति-नीति-पद्धत्ति आपकी नहीं तो फिर कैसी आज़ादी और किससे आज़ादी? छोटे बच्चों को कभी सभ्य और ज़ाहिल, पढ़े-लिखे और अनपढ़ की तस्वीर बनाने कहिएगा और देखिएगा वह क्या बनाता है?

निःसंदेह वह असभ्य-जाहिल को धोती-कुर्त्ता पहनाएगा! आज के बच्चों-किशोरों-युवाओं को पप्पीज के साथ तस्वीर खिंचवाने में शायद ही शर्म महसूस हो, पर गाय-गीता-गाँव के साथ; उसे पिज्ज़ा-बर्गर खाने में शायद ही संकोच हो, पर रोटी-सब्जी, दाल-भात में? ‘घर का खाना’ में निहित व्यंग्य को आपने महसूस किया ही होगा!

स्विमिंग पुल में छलाँग उसका पैशन, पर गंगा में डुबकी; तुलसी-चौड़े पर दीपक जलाना अन्धविश्वास, पर जन्मदिवस पर कैंडल जलाना; पादरी शांति के अवतार, पर पुजारी..? अपनी ही परंपराओं व मान्यताओं से बुरी तरह कटा-छँटा, तमाम अंतर्विरोधों और द्वन्द्व में जीता राष्ट्र न जाने ऐसे कितने विरोधाभासों को जीने को अभिशप्त है.

मुझे तो कभी-कभी लगता है कि गुलामों का न तो अतीत होता है, न वर्तमान; न इतिहास होता है, न दर्शन; न  साहस होता है, न संकल्प; न सोच होती है, न सरोकार. शासकों ने जो लिख-लिखा दिया वह उसे ही अपना भाग्य मान निहाल होता रहता है, कभी जय-जयकार की मुद्रा में तो कभी बेबसी के अंदाज़ में.

बाहर निकलिए गुलामी की ग्रन्थियों से! बदलाव ज़रूरी है, पर अपनी मूल पहचान खोकर नहीं; आगे बढ़ना ज़रूरी है, पर अपनों की लाश पर नहीं. अगली बार कोई आपके बच्चे को तथाकथित सभ्यता-संस्कृति, मूल्य-मैनर सिखाने आए तो एक बार सोचिएगा ज़रूर कि कहीं वो आपकी परंपरा-आपकी विरासत, आपके परिवेश-आपके पुरखों को जाहिल-गंवार तो नहीं समझ रहा है.

स्वाभिमान खोकर ज़्यादा दिन खड़ा नहीं रहा जा सकता. सिखाना ही है तो उसे यह ज़रूर सिखाइए कि प्रतिभा और परिणाम, प्रभाव और प्रतिष्ठा, बौद्धिकता और रचनात्मकता किसी व्यक्ति, भाषा या जाति विशेष की संपत्ति नहीं; उस पर उसका भी उतना ही हक़ है, जितना किसी और का……

  • प्रणय कुमार

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