अजित उवाच : भेड़ बकरियों के सर पर Priority Banking

कुछ  महीने  पहले की बात है, मैं बैंक गया था, AXIS BANK, कुछ पैसे डलवाने थे खाते में ….लम्बी लाइन लगी थी. सुबह के समय भीड़ हो ही जाती है, सभी धैर्य पूर्वक अपनी बारी का इंतज़ार कर रह थे.

तभी एक श्रीमान जी आये ….उनके गले में axis  बैंक का पट्टा पड़ा हुआ था सो मैं समझ गया कि बैंक के ही कर्मचारी हैं ……वो सबसे आगे आ कर खिड़की से नोटों का एक बड़ा सा बण्डल पकडाने लगे.

मैंने कहा भाई साहब मैं क्या आपको शकल से बेवक़ूफ़ लगता हूँ ….. वो एकदम सकपका गया ….क्या हुआ भाई साहब ……..नहीं आप ये बताओ की क्या मैं बेवक़ूफ़ हूँ जो इतनी देर से लाइन में खड़ा हूँ …. और आप आये और सबसे आगे पहुँच गए …..जनाब मैं बैंक का स्टाफ हूँ ……हुज़ूर आप चाहे जो हों, पर लाइन में आइये …….

वो बोले कोई priority  customer है  ….मैं बोला साहब priority  customer  है तो आपके लिए है …..कोई बहुत बड़ा करोड़ पति, अरब पति आपका ग्राहक है, आप उसे special  treatment  देना चाहते हैं, ये बड़ी अच्छी बात है. वो इतना अमीर आदमी क्यों हम लोगों की तरह, भेड़ बकरियों की तरह यहाँ लाइन में खड़ा होगा.

आप उसे वहाँ AC  में बैठाइए,  मसनद लगा के, 4  आदमी उसे पंखा झलें जैसे शाहजहाँ को झलती थीं दासियाँ, जब वो तख्ते ताउस पर बैठता था.
मैनेजर साहेब उसके पैरों की मालिश करें बादाम रोगन से. आप सब उसकी चाकरी कीजिये ……पर भैया मुझसे क्यों करा रहे हो यार. मेरे सर पे चढ़ के क्यों ऐश करेगा वो. पहले वो लड़की सारा काम रोक के उसके पैसे जमा करेगी तब तक मैं खड़ा रहूँगा. इतना महत्त्वपूर्ण आदमी है, तो उसके लिए अलग से काउंटर खोल लो यार.

आम आदमी के सर पे बैठा के उसे priority  customer  मत बनाओ. अब ऐसे मुद्दों पर सार्वजनिक स्थलों पर जब मैं जिहाद करता हूँ तो ज़रा जोर जोर से बोलता हूँ, अगल बगल खड़े लोगों को उकसाता हूँ. उनसे संवाद स्थापित करता हूँ और तुरंत एक ग्रुप बन जाता है. सभी जोर जोर से बोलने लगते हैं और मैनेजमेंट के लिए बड़ी असहज स्थिति बन जाती है.

खैर जब वहाँ scene  create  हो गया तो तुरंत मैनेजर अपने केबिन से उठ के आया. उसने मुझे 25  बार सर सर कहा और बोला सर आप मुझे दीजिये मैं आपके पैसे जमा करवा देता हूँ. मैं फिर उसके सर पे सवार हो गया.

अबे यही तो मुद्दा है ……..मेरे काम तू फिर पीछे से करवा देगा ….ये जो बाकी खड़े हैं ये बेवक़ूफ़ हैं ?  इस queue  का मतलब क्या है?  भारत का आम आदमी तो बेचारा है न …निरीह है न …….यूँ ही सड़क पे धक्के खाने के लिए पैदा हुआ है न …….उसे priority  कब मिलेगी?

आम आदमी को पीछे धकेल  कर ख़ास आदमी को आगे खडा करना बंद करो. हम आम लोगों का हिस्सा ये रसूख वाले कब तक खायेंगे. इतनी भीड़ है तुम्हारे बैंक में. एक और काउंटर शुरू क्यों नहीं करते. खूब बवाल कटा उस दिन बैंक में. पब्लिक कुछ देर चिल्लाई. फिर सब शांत हो गए.

आज फिर एक बैंक में गया था. तीन चार लोग खड़े थे लाइन में मुझसे आगे. आज फिर वही सब कुछ दोहराया गया. मैं चुपचाप देखता रहा. सब भेड़ बकरियों की तरह खड़े रहे. कोई कुछ नहीं बोला.

किसी ने आवाज़ नहीं उठायी. मैं भी कुछ जल्दी में था. एक बार बोलने भी लगा था. फिर खुद को रोक लिया. अपनी बारी आने तक इंतज़ार किया, पैसे जमा कराये और आ गया. तब से अब तक यही सोच रहा हूँ, हम हिन्दुस्तानी क्यों चुपचाप सब सह रहे हैं?

क्यों नहीं लड़ते सच्ची बात के लिए …… अपने हक़ के लिए ……… क्या हम सचमुच गुलाम कौम हैं?   क्या कोई दिन आएगा, जब उठ खड़ा होगा हिन्दुस्तान, अपने साथ होने वाली इन नाइंसाफियों के खिलाफ.

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