नायिका : विदेह भव

“इस जन्म में हम जो कह रहे हैं, सुन रहे हैं, वो सिर्फ यह जानने के लिए कि हमने व्यक्तिगत रूप से अलग-अलग कितना सीखा कितना पढ़ा, कैसे लोगों के बीच उठे बैठे, तुमने मेरे जैसा कितना पढ़ा है, मेरे जैसा कितना कहा है……………..”

नायक की इतनी सब बातों में नायिका सिर्फ कुछ शब्दों को ही थामे खड़ी थी……….”इस जन्म में”

इस जन्म में?

नायक ने कहा- हाँ इस जन्म में ….

नायिका- और उसके पहले?

नायक-  उसके पहले फासला था…

नायिका- और उससे पहले?

नायक- फासला और ज़्यादा था?

नायिका- और सबसे पहले?

नायक- सबसे पहले तो हम एक ही थे जब एक आत्मा के दो टुकड़े कर दिए गए तो वो विपरीत दिशा में एक दूसरे से दूर होते गए…. एक निश्चित दूरी के बाद एक परिधि पर पहुंचकर वापस पास आना शुरू किया…… और आज इतने पास है कि….. दिन रात साथ है….

नायिका जानती थी चाहे वो कितनी ही मिन्नतें कर लें लेकिन यदि वो बातें बताने का समय नहीं आया होगा तो नायक उसे कुछ नहीं बताएगा…. इसलिए हर बार बच्चों की तरह पैर पटक पटक कर पूछने की बजाय नायिका ने सिर्फ इतना भर पूछा – तुम हमारे मिलने के बाद मुझे सबकुछ बताओगे ना?

नायक- सब तो बता दिया…..

नायिका- ना…. ये तो सिर्फ झलक दिखलाई है…. हर बार की तरह बस कोई झलक, कोई बात या कोई सपना दिखाकर मुझे अचम्भित कर देते हो……. उन सारे विस्मय के क्षणों को अपने दिमाग़ की पर्तों में रख रही हूँ…..

बस इंतज़ार है तो उस दिन का जब तुम पहली बार मेरे रूबरू होगे और मैं तुम्हें देखते से ही सिर्फ़ दिमाग की ही नहीं इस जन्म की सारी पर्तें खोल दूँगी………… और पिछले जन्म का कोई रिश्ता मेरे सामने खड़ा होगा………. या जैसा कि तुम कहते हो…….. वो दो टुकड़े तब इतने करीब आ जाएँगे कि फिर एक हो जाएँगे….. फिर ना मुझे कुछ पूछने की ज़रूरत होगी न तुम्हें कुछ कहने की…..

नायक – वैसे भी मैं इस कदर लिपटा हूँ, इस कदर छाया हूँ, ऐसे घेरे हूँ, इतना घुल गया हूँ साँसों में कि बस किसी ने छेड़ा और मैं तुम में प्रकट……………

Sirf saakshi rahe. Abhi bahut kuchh ghat chukka hai, ghat raha hai, ghatne ko hai. Dekhte rahiye judiye mat. Videh bhav

विदेह भाव… बहुत कुछ जाना पहचाना सा लगा ये शब्द जब तुमने कहा….

यही… यही समझने की कोशिश कर रही थी उस दिन जब मैंने कहा था कि….

मैं जो पल पल में रो देती थी…. बहुत आसानी से रो देती थी… आज कुछ बदल सी गयी हूँ…

जब मैं कहती हूँ कि आज कुछ बैचेनी है… मन विचलित है तब भी वो भाव बहुत गहरे से नहीं निकलता… लगता है मेरे आसपास कुछ घट रहा है जिससे ऐसा भाव उत्पन्न हो रहा है कि मन विचलित है…

जब मैं कहती हूँ आज मन शांत है तो लगता है मेरे आसपास ऐसा कोई है जिसके चेहरे पर अजीब सी शांति दिखाई दे रही है…

एक सुकून भरी मुस्कराहट…. हो सकता है वो कोई और नहीं, मैं ही हूँ…

लेकिन मैं खुद उस एक एक भाव को अपने सामने देख रही हूँ जो मेरे अन्दर से निकल रहा है… फिर भी मेरा नहीं है….

जो मैं देख रही हूँ, जो सुन रही हूँ… उसकी मैं खुद गवाह हूँ… सब मेरे ही सामने घट रहा है… फिर चाहे वो मेरे साथ ही क्यों न घट रहा हो….

होशमंद… कल कहा था ये शब्द…. अनायास ही निकलता था मेरे मुंह से…. तुमसे सुना हुआ ज़रूर था…. लेकिन लगा मेरे लिए कहा गया था…  कि मैं होश नहीं खोता…

आज मुझे भी लग रहा है कि … मदहोशी के आलम में भी मैंने कभी अपना होश नहीं खोया….

भविष्य के सुन्दर यथार्थ की कल्पनाओं ने जड़ें इतनी मजबूत कर ली हैं कि वर्तमान को किसी फ़िल्मी कहानी की तरह रुपहले परदे पर पल पल गुज़रते हुए देख रही हूँ…..

फिल्म का सुखद अंत पता होता है तब भी हम फिल्म के करुणा से भरे सीन में भाव विभोर हो उठते हैं… उसका पूरा मज़ा लेते हैं… वैसा ही कुछ मेरे साथ हो रहा है…

इतना सबकुछ लिखने के बाद जो नायक का जवाब था…. जैसे कभी कहता है हे मूर्खे… या कभी समझदार…..

ये आशीर्वाद था……. ‘विदेह भव’ कहा था ‘विदेह भाव’ नहीं… लेकिन नहीं समझकर भी बिलकुल सही समझी…..

नई सुबह, नया दिन, नई शुरुआत, नई तुम
कल जो था बहुत भारी था
होता है किसी दिन ऐसा
लेकिन कभी-कभी….

आज आज है
न पहले कभी आया था ये दिन
न फिर कभी आएगा
जैसे बुनना है इसे बुन लो
जो धागे कल से उठाना है उठा लो
जो नए जोड़ना है ले लो
वो कल तो गया
और इस कल पर भी ज़ोर नहीं
तो क्या फिक्र….
हम सिर्फ अपना आज चुने
आओ कि कोई ख़्वाब बुने…..

सूत्रधार –

बेशक ये नायिका एपिसोड की अगली कड़ी नहीं… जो कहानी बीच में छोड़ दी थी… उसके बहुत आगे की बात है ये… लेकिन नायक का जन्मोत्सव मनाने के बाद दोबारा कहानी पर लौटने से पहले मैं आपको ले कर आया हूँ एक रूमानी संसार में…

जहां प्रेम का कोई अतीत नहीं होता, कोई भविष्य नहीं होता… मैं वर्तमान कहूंगा तो मेरे कहते कहते ही वो पल अतीत हो जाएगा… प्रेम तो समय से परे होता है, जीवन मृत्यु की सीमाओं से भी परे होता है…. उसे तो उसी पल अनुभव करना होता है जैसे नायक और नायिका आज करते हैं…. कल भी करते थे… और कल भी करते रहेंगे…

क्योंकि ये दो देह की नहीं, दो विदेह चेतनाओं की कहानी है… जो किसी का भी चेहरा धारण कर आपके सामने प्रस्तुत हो जाती है… वो चेहरा आपका अपना भी हो सकता है..

अगले एपिसोड में क़दम रखने से पहले …. आओ थोड़ा रूमानी हो जाएं….

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