नायिका Episode – 8 : क्यों दुखता है दाँत? ऐसे में मीठा कम बोलना चाहिए!!!!

नायिका का अगला ई-मेल –

अभी अभी फिर किसी से तनातनी हो गयी…. खैर झगडालू हूँ लेकिन कुछ लोगों के लिए..
झगड़ने के बाद मन खराब हो जाता है… खराब मन लिए बैठी हूँ आपके सामने…..
एक साया-सा रूबरू क्या है… सुन रही हूँ अपलोड किया है आप भी सुनिए या फिर बताइये आपके पसंद का कोई गाना सुनवा दूं….

नायक –

“एक साया-सा रूबरू क्या है” सुना मैंने. इसी फिल्म में अपने (मेरे-आपके) बुज़ुर्ग कब्बन मिर्ज़ा की “आई ज़ंजीर की झंकार, खुदा खैर करे..” फिर से सुनिये, अब उस आवाज़ का जादू देखना.
अरे ये ब्लॉग का क्या करूँ माँ…

नायिका-

“आई ज़ंजीर की झंकार, खुदा खैर करे..” मैंने बहुत बार सुना है. हम सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं, हुंह!! एक जैसे गाने सुनो, एक जैसी बाते करो, एक जैसा सोचो और सबसे जुदा रहो…

छोड़ो आज ज़्यादा बात करने का मन नहीं है, आज पता नहीं क्यों दाँत में बहुत दर्द हो रहा है.

नायक-

“आई ज़ंजीर की झंकार, खुदा खैर करे..” मुझे लगा कि ये गीत मुझे पसंद है तो आपको भी सुनने को कहूँ, भूल गया था कि ऐसा क्या होगा सुनने लायक जो आपने न सुना हो!

आप कहती हैं, ‘हम सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं’
यही तो अफसोस है कि हम एक ही थैली में नहीं है.

आपकी शिकायत कि, एक जैसे गाने सुनो, एक जैसी बाते करो, एक जैसा सोचो और सबसे जुदा रहो…
एक जैसा सुनने, बातें करने और सोचने पर हमारा कोई ज़ोर नहीं, रही बात जुदा रहने की तो ये तो निहायत ही मामूली बात है.

‘न जाने कौन से लम्हे की बददुआ है ये,
क़रीब घर के रहूँ और घर न जाऊँ मैं

डेंटिस्ट क्या कहता है? क्यों दुखता है दाँत? ऐसे में मीठा कम बोलना चाहिए!!!!
और जवाब नहीं दिया आपने कि ब्लॉग क्यों बनवाया आपने, वो भी विघ्नकर्ता के ही नाम से?

नायिका-

ये ज़रूरी तो नहीं ना जो आपको पसंद हो वो सबको अच्छा लगें ….. आप ही क्यों सब मर्द यही सोचते हैं कि जो उन्हें पसंद हो वो उनकी महिला दोस्तों को भी पसंद आए… हुंह!!! सब मर्द एक जैसे होते हैं.

ये क्यों नहीं सोचा जाता कि गाड़ी तभी चलती है जब दोनों पहिए विपरीत हो. औरत मर्द या पति पत्नी एक जैसा सोचने लगे तो हर घर में अभिमान फिल्म बन जाएगी.

दाँत ठीक हो गया है….

अब इजाज़त दीजिए, चलो ऑफिस के लिए तैयार हो जाओ अब.

नायक का अगला ईमेल –

क्या मैं शिकायत करता-सा प्रतीत हो रहा था?
जवाब इस बार भी नहीं मिले!

किसी दिन शोभा डे का नाम पढ़ा था, अमिताभ घोष को भी मौका दीजिये.
सिर्फ अपने बच्चों की ही ममता लगती है तो फिर सारे विश्व का क्या होगा?

ऑफिस के लिये तैयार हो जाओ अब?? मुझसे तो नहीं कहा जा रहा है न?? Madam, जब सुबह 8:45 पर घर से निकलता हूँ तो लौट के अब 1 के आसपास ही आता हूँ फिर अभी जाऊंगा तो रात को.

10 मिनट जवाब का इंतज़ार करके बस निकलता हूँ, बुलबुल चाय बना दे. अब मुझसे सुन लीजिये, जन्म से 4 साल की होने तक हम सब इसे बिट्टी ही बुलाते थे, फिर जयपुर चली गई और बुलबुल बन के लौटी.

वाकई?? सब मर्द एक जैसे होते हैं? अरे नहीं अभी सबसे मिली कहाँ है आप!!! लगता है आज आपकी किसी से लड़ाई हुई है इसलिए ग़ुस्से में नज़र आ रही हैं. चलिए ग़ुस्सा छोड़िये. और किसी को गाली देना हो तो दे दीजिए. और गाली भी वज़नदार होना चाहिए.

आपका ये ग़ुस्से से भरा ख़त पढ़ा तो अमृता प्रीतम की एक गाली याद आ गई जो आज तक की सुनी हुई सबसे वज़नदार गाली है या कहें श्राप है और किसी पूर्वजन्म से इससे मैं शापित हूँ – “जा, तुझे अपने महबूब का नाम भूल जाये!”
लिखना कि ब्लॉग क्यों बनवाया और उसे विघ्नकर्ता नाम ही क्यों दिया? ये सवाल तीसरी बार  पूछ रहा हूँ, ठीक? आता हूँ.

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(नोट : ये संवाद काल्पनिक नहीं वास्तविक नायक और नायिका के बीच उनके मिलने से पहले हुए ई-मेल का आदान प्रदान है, जिसे बिना किसी संपादन के ज्यों का त्यों रखा गया है)

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