नायिका Episode – 7 : कहीं इसे फ्लर्ट करना तो नहीं कहते हैं ना?

सूत्रधार

यहाँ नायिका ने मोती को अपनी मुट्ठी में भींच रखा है, सोच रही है ये मोती यदि माला में पड़ गया तो बात दोतरफा हो जाएगी अर्थात एक मोती नायक की ओर से तो दूसरा नायिका की ओर से हो जाएगा. फिर नायिका ये नहीं कह सकेंगी कि भई तुमने गूँथना शुरू की थी माला अब तुम ही पूरी करो……

एक कदम नायक की ओर से बढ़ा है तो दूसरा नायिका की ओर से …..नायिका अब भी सोच रही है….क्या किया जाए? इस मोती को हाथ में ही रखूँ या पिरो दूँ माला में? नायिका को लग रहा है ये सब उसके हाथ में ही है….. वो नहीं जानती कि नियति ने किस काम के लिए उसे नायक से मिलवाया है….

बात को आगे बढ़ाते हुए नायिका लिखती है –

मन्ना डे की आवाज़ मधुशाला में डूबी रही उससे बेहतर कुछ न लगा..

ज़िंदगी और सपनों को सुलझा लेने की आदत अभी अभी लगी है वर्ना मुझे भी अकसर उलझे रहने ही मज़ा आया है बच्चों के मासूम सवालों का सही सही जवाब देने के लिए माँ को सुलझा हुआ होना ज़रूरी है बस इसलिए…

आपको देखने का मन बिलकुल नहीं है इसलिए तस्वीर का नहीं कहूँगी …. कोई ब्लॉग बनाया हो तो लिंक भेजिएगा.

नायक –

तीसरी बार पूछ रहा हूँ वो किताबें पढ़ी हैं?

इधर तो आत्ममुग्धता की स्थिति जब बनी, हमेशा किसी ने हिला दिया, इस बार आप थीं.

मेरी तस्वीर का ज़िक्र कैसे आ गया?

नहीं कोई ब्लॉग नहीं, बिना पूछे बता चुका हूँ कि कोशिश ज़रूर की थी पर time नहीं है. बना लेना चाहिये क्या?

सूत्रधार –

कोई एक शब्द पकड़कर आधे घंटे का भाषण दिया जा सकता है……… ऐसा नायक का मानना है शायद… तभी तो देखिए आत्ममुग्धता को कैसे पकड़ रखा है…. नहीं उसके बाद ये कह भी दिया कि आपने पूरी तरह से हिला दिया…….

कहीं इसे फ्लर्ट करना तो नहीं कहते हैं ना? ना भई मैं नहीं जानता इस अंग्रेज़ी शब्द को हिन्दी में क्या कहते हैं? आपको पता हो तो ज़रूर बताइएगा…. हमारे नायक को भी नहीं पता कि आत्ममुग्धता की स्थिति बन रही थी तो नायिका की किस बात ने उसे इतना हिला दिया……..

छोड़े जनाब हमें क्या करना….. भई नायक है तो नायिका पर मुग्ध तो होगा ही……… बावज़ूद इसके की अभी तक उसे देखा भी नहीं है…. बस एक तस्वीर भर ही तो देखी है वह भी CLOSE UP नहीं….. आप तो पढ़िए नायिका का जवाब –

नहीं पढ़ी बाबा अब नहीं पढ़ना अमृता को, उससे गुज़र जाना चाहती हूँ…
दूसरी बार पूछ रही हूँ आपका कोई ब्लॉग है?

नायक –

बिट्टू का कहना है कि आप मुझे डांट रही हैं! सिर्फ उसी ने आपकी तस्वीर देखी है. मेरा दोस्त है और भानजा तो है ही, 16 का है.

नायिका-

इसे कहते हैं इत्तेफाक मेरे भांजे का नाम भी बिट्टु है … आपके बिट्टु को मेरा प्यार…. क्योंकि उसने मुझे देखा है.

नायक –

नहीं कोई ब्लॉग नहीं, बिना पूछे बता चुका हूँ कि कोशिश ज़रूर की थी पर time नहीं है.
बना लेना चाहिये क्या?

नायिका –

जी बनाइये… जितनी जल्दी हो सके… इसी नाम से विघ्नकर्ता…

नायक –

आपके आदेश का पालन हुआ. इतना आज्ञाकारी भी हूँ इसका पता मुझे भी आज ही लगा. मुक्तिबोध को ही पहला शिकार बनाया है. कुछ गाने हैं. आहिस्ता आहिस्ता सीख ही लूंगा…

नायिका-

अभी-अभी ऑफिस आई हूँ देखती हूँ, क्या बनाया है आपने.
मेरी भाँजी का नाम बिट्टी है 16 साल की, बिट्टु 2 साल बड़ा है उससे, पता नहीं मेरी बेटियाँ कब बड़ी होंगी …. बड़ी तो अब भी बड़ो जैसी बातें करती है और छोटी कभी बड़ी नहीं होने वाली, भोला भंडारी कहती हूँ उसे….

ह्म्म्म्म्म्म्म्म अच्छी शुरुआत है, पहले चैनल का नाम दे दिजिए, जो रचना आपकी नहीं उस रचना के साथ कवि का नाम दीजिए, समय मिले तो थोड़े रंग भर देना चैनल में.. बाकी आपकी उन दो- दो पंक्तियों में कही गई बड़ी बड़ी बातें बहुत प्रभावशाली है… इतना कीजिए एक छोटे से अंतराल के बाद फिर मिलते हैं…

नायक का अगला मेल –

अरे यार, ये तो मैं काम में लग गया!! एक बार blog publish हो जाने के बाद changes सम्भव है क्या? कैसे? सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि आप office से net access करती हैं और मैं घर से. अभी पूछ रहा हूँ, जब तक जवाब आयेगा मैं जा चुका हूंगा, रात को लौटूँगा तो आप नहीं होंगी.

नायिका –

अरे वो तो ठीक है ये ब्लॉग पर कैसी तस्वीर लगा रखी है? गाना भी तो क्या ऊल-जलूल डाल रखा है. अभी तो हाथ में जाम है….

नायक का जवाब –

अरे माँ, शब्द तो जो हैं सो हैं, गायकी का तो लुत्फ लिया होता, कल लगभग 11 घंटे computer पर वो thesis translation का काम किया, लगभग पूरे ही समय …. तौबा कितना काम है…  सुनता रहा. खैर, पसंद अपनी- अपनी ..

नायिका अचंभित सी का जवाब-

लो आपने भी माँ कह दिया…. बस सब मिलकर जगत माँ बना लो मुझे….

नायक –

हैं नहीं क्या? वेद काल में ऋषियों ने जो नव-वधु के रूप में आप को आशीर्वाद दिया था, लगता है विस्मृत हो गया है…..

नायिका –

अजीब इत्तेफाक होते रहते हैं मेरे साथ आपको लिंक भेजी उस दिन शाम को घर गई तो सीता और गीता फिल्म चल रही थी टीवी पर और गाना भी वही…. अभी तो हाथ में जाम है…

वो गीत तब अच्छा लगता यदि मैंने भी कभी पी होती और पीकर छोड़ दी होती…

(तब नायिका को पता नहीं था यही इत्तफाक़ बाद में जादू के रूप में प्रकट होता रहेगा)

नायक –

ये message तो समझ ही नहीं आ रहा है कि किस गाने की बात कर रही हैं आप.

नायिका –

छोड़ो हुंह !!!!

नायक –

हुंह??????

सिर्फ छोड़ो कह देती तो भी छोड़ देता. पर ये तो बताएँ कि आपने ये ब्लॉग बनवाया ही क्यों और विघ्नकर्ता नाम ही रखने के लिये क्यों ज़ोर दिया? इस बार ‘हुंह छोड़ो’ नहीं सुनना.

शुरुआती किसी mail में मैंने कहा भी था कि ब्लॉग रचने जितना, न तो मुझ में धैर्य है और न ही समय. बैठा हूँ, और सोच रहा हूँ कि क्या किया जाये. अब कुछ suggest भी तो करें.

नायिका –

राजनीति और अध्यात्म………

नायक –

एक खयाल आया है, एक बात तो इतनी सारी बातों में भी अभी तक आपको नहीं बता पाया, वो ही लिखने की कोशिश करता हूँ.

मेरे मुँह से निकली भी नहीं, और सुझाव आ भी गया, ज़िंदगी इस कदर मेहरबान तो कभी भी न थी….

जैसे ही आपकी सुझाई site देखी तो बिट्टु बोल पड़ा कोई गाना ढूंढ रहे हो, बताने पर उसने एक अन्य site बताई, वहाँ उम्मीद से कहीं ज़्यादा मिला. Download करने के बाद से वही सुन रहा हूँ और बिट्टू और बुलबुल सर धुन रहे हैं कि मामा को क्यों बता दी ये site. बुलबुल 12 की है.

नायिका –

बेटू याहू पर खत भेजे हैं वहाँ चेक करो….

नायक –

आज सुबह से आप को बाइक पर घुमा रहा हूँ, इतनी बातें करी कि अब और कुछ कहने की ताक़त नहीं, शिकायत एक ही है कि आप सुनती हैं, कुछ कहती नहीं!

नायिका –

इतनी तेज़ बाइक चलाना चाहिए क्या, मैं गिर जाती तो? अच्छा चलो अब वो वेद वाली कौन-सी कहानी है नव-वधु के रूप में?

नायक –

गिर कैसे जाती? मैं हूँ ना!!! अच्छा अब तो बता दो वो कविता कैसी लगी? नव वधु एक अलग बात थी और जो कहानी ब्लॉग पर पोस्ट करने वाला था वो एक जुदा बात है.

नायिका –

चलो बाइक पर बहुत घूम लिए…… काम पर जाओ और रात को लौटकर जवाब देना…………. और हाँ वो नव वधु वाली कहानी चाहे अलग हो मुझे सुननी है.

सूत्रधार –

अब आप सोच रहे होंगे कि ये सब हो क्या रहा है? ये नववधु, आशीर्वाद, बाइक पर घूमना, गानें, तस्वीरें …. क्या नायिका और नायक…. की मुलाकात हो गई? क्या दोनों रूबरू बातें कर रहे हैं?

जी नहीं, ये बातें अब भी ख़त के ज़रिये हो रही हैं. कौन कहेगा ये वही नायक और नायिका है जो कभी आत्ममुग्धता, कभी ज़िंदगी का लिबास और शास्त्रीय संगीत और न जाने कितनी भारी भरकम बातें कर रहे थे. अब देखो कैसे दो दोस्तों की तरह कहा-सुनी कर रहे हैं.

जी नहीं ये बातें नहीं कर रहे…. ये तो उस माला में मोती पिरो रहे हैं जिसका पहला मोती डालने से पहले नायिका न जाने कितनी देर तक विचार मंथन करती रही थी और अब देखो कैसे अपनी बातों के मोती पिरो रही हैं जैसे कितने बरसों से कितनी सदियों से और कितने जन्मों से नायक को जानती होगी….

और क्या नायक की भविष्यवाणी थी ये कि जिस नायिका को वो “माँ” कहकर पुकार रहा है उसे एक दिन दुनिया भी सच में “माँ” कहकर ही पुकारेंगी???”

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Inroducing Nayika : कौन हो तुम?

Introducing Nayika : प्रिया

Introducing Nayika : सूत्रधार

(नोट : ये संवाद काल्पनिक नहीं वास्तविक नायक और नायिका के बीच उनके मिलने से पहले हुए ई-मेल का आदान प्रदान है, जिसे बिना किसी संपादन के ज्यों का त्यों रखा गया है)

 

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