नायिका Episode – 6 : सिलवटें हैं मेरे चेहरे पे तो हैरत क्यों है, ज़िंदगी ने मुझे कुछ तुमसे ज़्यादा पहना

सूत्रधार-

नायिका अपनी तस्वीर कुछ देर के लिए ब्लॉग पर लगाती है और नायक को ख़त से खबर कर देती है कि देख लें कहीं यही वो चेहरा तो नहीं था जो उसे सपने में दिखाई दिया था. नायिका की तस्वीर देखने के बाद नायक जवाब देता है-

चाहें तो अभी हटा दीजिये.

पुण्यतिथि रफी साहब की और बात मुकेश की

जब से होश सम्भाला (वाकई कभी सम्भाला??) मुकेश की आवाज़ को सारे पार्श्व गायकों की आवाज़ से ज़्यादा करीब पाया.

पर उनकी बात क्यों, बात तो मन्ना डे यानी प्रबोध चंद्र डे की करना है

फिल्म उद्योग के सबसे अधिक प्रशिक्षित गायक और…. जीवन भर दूसरे दर्जे के गायक बने रहे

आनंद देखी थी न,

दो गाने मुकेश के “कहीं दूर जब ….” और “मैने तेरे लिये ही….. “

और एक गाना मन्ना डे का “ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय, कभी ये……”

जोकर भी याद है न,

सारे गाने मुकेश केजीना यहाँ……”, “जाने कहाँ गये……” और भी कई.

और एक गाना मन्ना डे का “ए भाई ज़रा देख के चलो…”

CLOSE-UP इसको कहते हैं?

आँखें देखना चाही तो photographer पर बड़ा प्यार आया.

मैं क्या कहूँ?

आप कौन हैं और मुझे कैसे जानती हैं?

 

सूत्रधार –

न जाने कहाँ कहाँ की बातें करने के बाद मुद्दे की बात आखिरी की दो पंक्तियों में कही गई है

मैं क्या कहूँ?

आप कौन हैं और मुझे कैसे जानती हैं?

 

अब भई नायिका है, तो ‘समझदार’ तो वो भी है. नायक की दस तरह की बातों में से काम की बात को उठाकर जवाब दे ही देती हैं. साथ ही कुछ इधर उधर की बातें भी शामिल है ताकि नायिका अपनी जिज्ञासा को अपनी तथाकथित परिपक्वता और समझदारवाली छवि के पीछे छुपा सके.

तो नायिका कहती हैं-

मैं आपको नहीं जानती आप जानते हैं मुझे…. …. सपने के धागे पकड़ने की कोशिश कर रही हूँ …..

मेरा फेव गीत तो एक ही है

बोलो देखा है कभी तुमने मुझे उड़ते हुए?

सूत्रधार-

हमारे नायक भी कोई कम नहीं है- रिश्ता जोड़ने की कोशिश तो देखिए ज़रा, कैसे फिल्मी गीतों, गज़लों और शास्त्रीय संगीत की धुनों पर अपनी जिज्ञासा को बैठाकर नायिका तक पहुँचा रहे हैं…..

मन्ना डे के एक गीत का ज़िक्र रह गया था, फिल्म सीता और गीता का, विविध भारती पर भी शायद ही सुना हो मैंने – ‘अभी तो हाथ मे जाम है, तौबा कितना काम है, कभी मिली फुरसत तो देखा जायेगा, दुनिया के बारे मे सोचा जायेगा’, सुना है? धर्मेंद्र अपनी सीमित अभिनय क्षमता के साथ संघर्ष करते नज़र आते हैं इस गीत मे? जितना ज़्यादा इस को सुनने के लिये व्याकुल रहता हूँ, उतना ही कम ये सुनने को मिलता है.

‘ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय’ में से आपने तो अपने हिस्से की सुलझा ली, पर इधर अभी अनसुलझी ही है, देखते हैं………

कभी दो पुस्तकों का नाम बताया था – 13वां सूरज और 49 दिन – पढ़ी हैं?

दो शे’र –

अंधेरे मे घूमने से अंधेरा कम नहीं होता,

चलो सहर को ढूंढे, रात अभी बाकी है.

दूसरा –

सिलवटे हैं मेरे चेहरे पे तो हैरत क्यों है,

ज़िंदगी ने मुझे कुछ तुमसे ज़्यादा पहना.

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सूत्रधार –

जी हाँ दूसरा मोती नायक ने अपनी तरफ से नायिका को सप्रेम भेंट कर दिया है….. देखते हैं नायिका क्या कर रही है उस मोती का……

नायिका –

सच ज़िंदगी ने आपको ज्यादा पहना है
मैं तो शो रूम में लटका वो लिबास हूँ जो आत्ममुग्ध है जब भी ज़िंदगी ने पहनना चाहा खुद को तंग कर लिया ज़िंदगी हमेशा बड़ी रही ………
फिर अकसर गुनगुनाती रही मेरे घर आना ज़िंदगी…..

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Inroducing Nayika : कौन हो तुम?

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(नोट : ये संवाद काल्पनिक नहीं वास्तविक नायक और नायिका के बीच उनके मिलने से पहले हुए ई-मेल का आदान प्रदान है, जिसे बिना किसी संपादन के ज्यों का त्यों रखा गया है)

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