नायिका Episode – 3 : न आया माना हमें cheques पर हस्ताक्षर करना, बड़ी कारीगरी से हम दिलों पर नाम लिखते हैं

नायिका का जवाब –

या तो आप अच्छा बोलते हैं, या अच्छा लिखते हैं…. शब्दों को पेरेलल सिनेमा की कहानियों की तरह अलग-सा टच देना आता है आपको…. पढ़कर अच्छा लगा.

हाँ ज़रूर नए मिजाज़ का शहर है, तभी तो मिलकर भी फासला है….  आप कहाँ किस शहर में बैठे होंगे… मैं यहाँ इस शहर में ….एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत हूँ, दोस्त नहीं है लेकिन कुछ किताबें हैं मेरे पास, शब्दों से बहुत अजीब रिश्ता है… कभी बचपन की सहेली जैसा, कभी माँ की गोद जैसा, कभी गुरू जैसा…. सारे रिश्ते शब्दों में मिल जाते हैं….
आप कहाँ विराजमान हैं?

सूत्रधार- यहाँ शहर का नाम नहीं दिया जा रहा, ये आप तय करें…. चाहे तो झुमरी तलैया मे बैठा देते हैं नायिका को और नायक को गंगटोक में…. क्योंकि………………..

छठा तत्त्व जिनके मध्य जन्म ले लेता है, वे मिलते ही हैं फिर, उन्हें मिलना ही होता है, मिलन उनकी नियति हो जाती है. मिलन घटता ही है,….. कहीं भी… किसी भी समय ….इस मिलन के लिए स्थान अर्थ खो देता है और काल भी.

नायक का जवाब –

नज़दीक ही हूँ आपके, ट्रेन से आऊं तो तक़रीबन 13 घंटे लगेंगे, करता कुछ भी नहीं हूँ, आशय धनोपार्जन से है. काम, पैसे से मुझे पता नहीं क्यों नफरत सी है. नफरत को भूलते हैं, चलिये एक शे’र सुनिये – “न आया माना हमें cheques पर हस्ताक्षर करना, बड़ी कारीगरी से हम दिलों पर नाम लिखते हैं”

फिर आपने लिखा तो लिखूंगा,

सूत्रधार

अब यहाँ नायक क्या लिखने की बात कर रहा है? दिल पर नाम या अगला ख़त? नायक की बात नायक ही जाने….. वो तो हवा है, कहीं भी उड़ सकता है, कहीं भी ठहर सकता है….. हम ये देखते हैं कि नायिका इस बात पर क्या जवाब दे रही है.

नायिका-

पैसों के लिए काम तो मैंने भी कभी नहीं किया – बहुत सारी जगह काम करने के बाद यहाँ मन माफिक काम मिल गया, लेखन और रचनात्मक से जुड़ा हुआ, ऊपर से इंटरनेट की सुविधा, जैसे दुनिया इंटेलिजेंट बक्से के में सिमट गई.

कुछ नहीं करने के बाद भी आप कुछ तो ऐसा करते होंगे जिससे दो जून की रोटी खाने लायक या कुछ शौक पूरे करने लायक पैसा मिल जाता होगा… या पैसा इतना है कि काम करने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती?

बहुत गहन चिंतन करने का मन नहीं है थोड़ी सतही बातें लगेगी आपको…. फिर भी…

सूत्रधार –

कहा था ना नायक के बारे में कुछ कहना शुरु किया तो कहानी आगे ही नहीं बढ़ेगी, और हमें कहाँ कुछ कहने की ज़रुरत है ….देखे नायक खुद ही अपने बारे में न जाने क्या क्या कह रहा है नायिका को…

पढता हूँ और खूब पढ़ता हूँ पर मांग कर नहीं, अमृता प्रीतम को तो पढ़ा नहीं जिया है. जब सुनता था, तब खूब सुना…. पंडित जसराज और पंडित भीमसेन जोशी, मेहदी हसन, ग़ुलाम अली और जगजीत सिंह को. खाने का शौक बिल्कुल नहीं, जो चाहे खिला दीजिये, कई दफा तो पता ही नहीं चलता कि खाया क्या – पढ़ते हुये जो खाता हूँ.

पहनने का भी ये ही आलम है, तन ही तो ढंकना है. शराब खूब पी, 7 साल पहले अपने आप से बाते करते हुये छोड़ दी, सिगरेट बेतहाशा पी, याद ही नहीं कब छोड़ी.

अब रहा सवाल दो जून की रोटी का – तो मोहतरमा, दोनों जून मिला कर कुल 8 रोटी चाहिये, उस के साथ जो मिल जाये, अब इतने से के लिये मै काम करूँ और फिर काम से जुड़ी हज़ार झंझटे झेलूँ?

इतना तो, जब भी आपके दरवाज़े खड़ा हो जाऊँगा, मिल जायेगा.

हाँ, शौकिया कर लेता हूँ काम, मसलन 2 साल एक कम्प्यूटर इंस्टिट्यूट मे कम्प्यूटर हार्डवेयर पढ़ाया, सिखाया. निरर्थकता समझ में आते ही छोड़ दिया. आजकल एक पीएचडी की थीसिस को हिंदी से अँगरेजी मे अनुवाद कर रहा हूँ, साथ ही कुछ प्रोफेशनल्स को अंग्रेज़ी सिखा भी रहा हूँ. मै कुछ मांगूंगा नहीं, वो दिये बिना नहीं मानेंगे, कुछ और किताबें आ जायेंगी.

कुछ लोगों का कहना है कि मै पैदायशी शिक्षक हूँ. बस यही तो सारे झगड़े की जड़ है कि मै क्या हूँ.

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(नोट : ये संवाद काल्पनिक नहीं वास्तविक नायक और नायिका के बीच उनके मिलने से पहले हुए ई-मेल का आदान प्रदान है, जिसे बिना किसी संपादन के ज्यों का त्यों रखा गया है)

 

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