नायिका Episode -20 : मेरे कृष्ण तत्व का जन्मोत्सव

आठ साल पहले नायिका जीती थी मध्य मार्ग में…. थोड़ा-थोड़ा, थोड़ा-सा प्यार, थोड़ी-सी नफ़रत, थोड़ी-सा जीवन, थोड़ी-सी मृत्यु….

और आज?

नायिका –

आज अपनी परछाई बनाकर तुम मुझे वहां तक ले गए हो जिसे अति कहते हैं… extreme में जीना, खतरनाक ढंग से जीना… जीने का और कोई तरीका ही नहीं होता जानती हूँ. लेकिन आज भी घबरा जाती हूँ उस slope पर खड़े-खड़े कि ज़रा-सा पैर फिसला और मैं सर्रर्रर से नीचे…

कितना तो हौसला देते हो रोज़ तुम, कितना तो कस के जकड़ रखा है तुमने मुझे गिरने से बचाने के लिए… अपना “सबकुछ” मुझे समर्पित कर दिया है… कहते भी हो आ जाओ मेरी पीठ पर बाकी का सफ़र तुम्हें पीठ पर बिठाकर पूरा कर लेंगे….

फिर भी ये मेरा “मैं” जो है… अड़चन दे रहा है … बार-बार बीच में आ जाता है… इसे हमारे स्वभाव का अंतर कह लो या “स्व” “भाव” की दो अलग पगडंडियों की यात्रा कह लो, जो हमें हमारे राज मार्ग तक तो ले ही जाएगी लेकिन … उन पगडंडियों की भटकन तो अपना-अपना नसीब भोगने के लिए अभिशप्त है ना?

हां मैं ये भी जानती हूँ मैं जिसे अभिशाप कहती हूँ तुम्हारे लिए वो भी वरदान है.. और तुम चाहते हो कि मैं इस अभिशाप को वरदान कहना शुरू कर दूं… लेकिन हे मेरे कृष्ण तत्व! जब तक मेरा ये अर्जुन-भाव रणभूमि पर विचलित है, जब तक सारे अभिशाप, वरदान बन जाने की यात्रा पर है, तब तक तुम्हारा प्रेम ही मेरा साहस है….

मेरी जिज्ञासाओं और प्रश्नों से तुमने कभी मुंह नहीं फेरा लेकिन तुम्हारा कहीं और देखकर विचार करना भी मुझे उद्वेलित करता है कि कहीं तुम्हारा मुझसे ध्यान हट तो नहीं गया?

इसे असुरक्षा का भाव कतई नहीं समझना ये उत्तर की प्रतीक्षा में खड़े उस यक्ष प्रश्न की ही शाखा है कि – “मैं आखिर कौन हूँ? और क्यों चुना गया है मुझे तुम्हारी जीवन-मृत्यु-संगिनी के रूप में? मेरी पात्रता का कौन-सा ऐसा भाग मुझे दिखाई नहीं दे रहा जहां मैं कह सकूं… मैं, मैं नहीं तुम ही हूँ…

जन्मों की यात्रा का वो कौन-सा पड़ाव है जो मुझे विस्मृत हो गया है और तुम्हें याद है.. क्यों मेरी आँखें उस सूर्य को नहीं देख पा रही जो क्षितिज का सीना चीरकर उदित होने को है और मैं अंधियारी रात के रहस्यमयी अँधेरे में मुंह छुपाये तुम्हारी परछाई से बार बार छिटक जाती हूँ … क्यों मेरे कृष्ण?

– इस राधा, मीरा, रुक्मणी तत्व को अपने कृष्ण तत्व का जन्मदिन मुबारक रहे…

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