नायिका Episode – 17 : मैं मानता नहीं अगले या पिछले जन्म को, ‘जानता’ हूँ!

विनायक – तीनों links पर गया, दो पर comments हैं, इच्छा हो तो देखें, एक अमृत-सागर को पढ़ लिया सागर मंथन कर अमृत की खोज करने के लिये. न, अमर होने की चाह बिलकुल भी नहीं, जल की कोख से तो लिखवा लिया. अब देखते हैं, “धरती की कोख से” किस दिन लिखा पाती हैं.  जब भी उसे पढेंगी, वैसे मुझ में सामर्थ्य नहीं कि उसको शब्दों मे बाँध पाऊँ, तो समझ जायेंगी. एक काम हो सकता है कि अनुभव मेरे और शब्द आपके, कम से कम इस घटना को शब्दबद्ध करने के लिये?? कब सुनेंगी???

तो मान लूँ  कि चुड़ैल अब गायब? अगर और किसी से भी कहा हो तो वहाँ से भी?

नायिका – दोस्त, छोटे भाई, पिता, अजनबी, पिछले जन्म की यादें….. विनायक, गणेश कौन हो तुम? ??????

विनायक – हर चीज़ अपने हाथों से घड़ने की ज़िद क्यों? ईश्वर या नियति को मानती हो तो उसके काम मे हस्तक्षेप क्यों? हर बार नाम देना ज़रूरी है? पिछली कितनी बार मना किया था इस प्रश्न से उलझने के लिये, माना होता तो…., पर ये नियति थी, अब फिर वही सब कुछ न दोहराओ और let the time take its own course.

यादें नहीं बची मतलब घटना ही नहीं घटी!! अब आज रात जो सपना देखें, देखेंगी ही, तो याद रखना और कल लिखना, फिर ये पढ़ना और चकित होना या अब चकित होना छोड़ दिया? कभी खुद को ढीला तो छोड़ो.

कल दोपहर ज़्यादा possibility  है कि न मिल पाऊँ, कोशिश रहेगी पर कुछ पक्का नहीं,
दोस्त,
छोटा भाई
पिता
अजनबी
विनायक
गणेश

सिर्फ़ और सिर्फ़ पिछले जन्मों की यादें……. अगले कई जन्मों की ख़ातिर!!!!

पिछले ख़त में जवाब मिल गया होगा कि नंबर क्यूँ दिया, क्यूँ दिया, क्यूँ दिया, क्यूँ दिया. आज ब्लॉग पर कुछ नहीं है पढ़ने के लिए पर देखने जैसा है, देख लेना नायिका.

– विनायक

नायिका – कल रात सपना नहीं देखा ….. एक हक़ीकत को जिया………. कोशिश करूँगी लिख सकूँ….

तुमसे तुम्हारी ही आवाज़ में तुमको सुन सकूँगी जिस दिन उस दिन न जाने क्या होगा….

कल तो सिर्फ़ नंबर मिला और बार बार उसे पढ़ती रही इस कोशिश के साथ कि मुझे नंबर याद न रहे…. अब भी नहीं याद….

हर जन्म की दास्तान तुमसे सुनना है, लेकिन तुम्हारे लिखे के आगे मेरे शब्द कुछ नहीं…. “धरती की कोख से” तुमको ही लिखना होगा…… इतना लिखा है और इतना कहा है अभी तक मैंने…. अब सिर्फ़ जीने दो….. जैसे कल रात से जी रही हूँ…

अब नियति की किसी उलझन में नहीं उलझूँगी….. हर चीज़ अपने हाथों से की ज़िद थी अब नहीं… इंतज़ार रहेगा तुम्हारे हाथ इस मिट्टी को क्या आकार देते हैं….

आपकी एक और आज्ञा का पालन करने का मन कर रहा है… आज के बाद मेरे होठों पर कभी वो शब्द नहीं आएगा…… लेकिन तुमको तो भूत कह सकती हूँ ना??

विनायक – क्या हुआ कल रात??

बहुत मुश्किल है धरती की कोख से अपने हाथों से लिखना पर कोशिश करूँगा लिखने की.

शौक से कह सकती हैं, सिर्फ़ भूत ही नहीं जो दिल में आए वो सबकुछ. अम्मा जब गोद में खिलाती थी तो पता नहीं किन किन नामों से बुलाती थी.

नायिका – विनायक, घर से निकली थी तब सोचा था ये कहूँगी वो कहूँगी…… सुबह बच्चों को स्कूल के लिए तैयार होने के लिए डाँटने से लेकर घर से भीगते हुए निकलते समय बस साथ में खड़े रहकर मुस्कुरा रहे थे… उसकी शिकायत करूँगी…..

आधे रास्ते में खड़े होकर रेन-कोट पहना तो मुँह बनाने लगे…. अरे भीगकर ऑफिस में AC में बैठना मतलब बीमार पड़ना, और बीमार हो गई तो घर से नहीं निकल सकूँगी……

वैसे भी 3 दिन तक कोई बात ना हो सकेगी, कल कोशिश करूँगी सायबर में रहूँ…. आप अपना schedule ना बिगाड़े…. अपना काम इत्मिनान से करें… मुझे पता है छुट्टी रहेगी तो आपका नेट पर बने रहना मुश्किल होगा….

3 दिन!!!!! चलो कोई बात नहीं कहा था ना मैं कंट्रोल कर लूँगी …… शायद….
– नायिका

विनायक – अपनी नींद खराब कर मुझे सुलाती रही, अर्से बाद ऐसा हुआ कि बिना नींद टूटे 6 घंटे सोया. सोते वक़्त भी घिरा रहता हूँ और नींद खुलने पर पाता हूँ कि अब भी घेरे हुए हो, शायद नींद में भी सोचता ही रहता हूँ…

इसका क्या मतलब होता है ज़रा समझाना- “मुझे पता है कल छुट्टी रहेगी तो आपका नेट पर बने रहना मुश्किल होगा”??

नायिका – छुट्टी है तो घर में सब साथ ही होंगे ना? मेरी छुट्टी वाले दिन मैं अकेले नहीं रह पाती…. पूरे परिवार को साथ लेकर घूमना अनिवार्य होता है चाहे एक कमरे से दूसरे कमरे में ही क्यों ना जाना हो….

नहीं कुछ नहीं हुआ रात को…. यूँ ही कह दिया…..

विनायक – यहाँ कतई अनिवार्य नहीं है, सबकी अपनी-अपनी ज़िंदगी है.

नायिका – मैं यहाँ अपनी ज़िंदगी जी लेती हूँ इसलिए घर पर उनके लिए जीना फर्ज़ हो जाता है….

तुम मानते हो पिछले जन्म या अगले जन्म को? जो है सामने है वही इतना डर कर जीना पड़ता है तो अगला पिछला तो न जाने कैसे जीएँगे…… जितना हाथ में है उतना ही भरपूर जी लें काफ़ी नहीं??

कल शाम एक मॉल के बाहर थी पतिदेव अंदर सामान का बिल चुका रहे थे….. गाना चल रहा था वही मेरी पसंद का….. बोलो देखा है कभी तुमने मुझे उड़ते हुए??

कल से बातों ने संजीदगी का हाथ थाम लिया है…. मेरे मोटू को कहाँ छोड़ दिया….

विनायक – मैंने ये क्या पढ़ लिया डर???? डर कर जीना? वो क्या होता है? और क्यूँ होता है??

मैं मानता नहीं अगले या पिछले जन्म को, जानता हूँ…

नहीं संजीदा नहीं हूँ, यूँ समझो Just for a change….

नायिका – डर नहीं तो और क्या, वही समाज वही धर्म के नाम पर बनाए नियम, उन पर चलने का दबाव……. मैं तो इस मामले में सच में असामाजिक प्राणी हूँ.

फिर वो क्या था जो कहा था…. सिर्फ पिछले जन्मो की यादें… अगले कई जन्मों की ख़ातिर??

विनायक – ऐसे में मुझे ग़ुस्सा नहीं प्यार ही आता है, ज़रा ध्यान से तो पढ़े- मैं मानता नहीं अगले या पिछले जन्म को, जानता हूँ…

सामाजिकता के नाम पर जो कुछ होता है उससे तो हम असामाजिक भले. पर डर और तुम्हें? जानकर मैं तो डर गया!!!!

नायिका – Oooops Sorry कितना घुमा फिराकर तो लिखते हो… मानता नहीं जानता हूँ, मजबूर नहीं मग़रूर हूँ………… अब जल्दी में अर्थ का अनर्थ न हो जाए तो क्या…..

अच्छा तो मुझे कितने जन्मों से जानते हो?

विनायक – फिर उल्टा लिखा, वो यूँ था मग़रूर नहीं मजबूर हूँ, फिर प्यार दिला दिया ना…
क्या पता कितने??? मिलेंगे जुलेंगे तो पता चलेगा….. जाइए अपना गाना सुनिए ब्लॉग पर….

नायिका – मेरे आज्ञाकारी मोटू मेरी हर ख़्वाहिश पूरी करोगे तो गड़बड़ हो जाएगी….. सुन रही हूँ गाना…

विनायक – और क्या गड़बड़ होगी????????

नायिका – मिलेंगे जुलेंगे??????? फिर कल कौन था????

विनायक – ओह!!! तो जिसे 6 घंटे की गहरी नींद समझ रहा था, वो 6 घंटे की मौत थी, और यहाँ सिर्फ लाश पड़ी थी…..

नायिका – लो मिठाई खाओ, ऑफिस में किसी का बर्थडे है, मिल्क केक खा रही हूँ… मेरी फेवरेट…. और ये आजकल बात बात पर कुछ ज़्यादा ही प्यार नहीं आने लगा तुम्हें!!!!!

विनायक – बात बात पर नहीं, सिर्फ़ तभी जब कोई ग़ुस्सा दिलाने वाली बात हो तब.
मीठा मैं तो बहुत खाता हूँ, खाने के बाद तो ज़रूर, पर कोई नहीं देता तो माँगता भी नहीं, दरअसल अब आदत किसी चीज़ की रही नहीं. हैरत तो तब हुई, जब एक रात बिना तकिये के सो गया.

कितना बनावटी लगता था पढ़ना या फिल्म में देखना कि “….और उसकी भूख प्यास मर गई, रातों की नींद, दिन का चैन खो गया…….”

कल अम्मा ने कहा कि अपनी शक्ल देखी? रोज़-ब-रोज़ ख़ुराक कम होती जा रही है, 4 रोटी में से आधी गई, फिर आधी गई, फिर…. आजकल सिर्फ 2 ही खा पा रहा हूँ, भूख ही नहीं लगती, ज़बरदस्ती करो तो लगता है कि सब बाहर आ जाएगा, नींद के हाल तो पता ही है….

नायिका – सच है पढ़ना या फिल्मों में देखना बनावटी लगता है लेकिन जब ख़ुद पर गुज़रे तब??

विनायक – तब???

नायिका- तब मैं बाद में बताती हूँ, अभी मुझे आज्ञा दो, कल बात कर सकेंगे…….

विनायक – जी, अब मैं भी जा रहा हूँ, रात को आऊँगा, आज सचमुच का एक लम्बा-सा ख़त लिखो ना, नायिका…

नायिका – ना………

विनायक – बार-बार मुझे ग़ुस्सा ना दिलाया करिए, देखिए बिना बात अभी ग़ुस्सा आ रहा है,

नायिका – ना…….

विनायक – मेरे ग़ुस्से के शिकार ज़िंदा नहीं रहते!!!!

नायिका – ना………………

विनायक – क्यूँ अपनी ज़िंदगी से खेल रही हैं, कहा ना मेरे ग़ुस्से के शिकार ज़िंदा नहीं बचते!!!!

नायिका – विनायक……………………

विनायक – हाँ नायिका!!! है ना कमाल कि ज़िंदा हो!!!! लेकिन ऐसा लग रहा है, हो नहीं!!!! मरनेवाले के लिए कहा जाता है कि भगवान को प्यारा हो गया, गणेश को भी तो भगवान ही मानते है ना??
देखो खजराना जा कर!!!!!

और हाँ बता दूं ये संयोग नहीं कि तुमने मुझे विनायक पुकारा… मेरा जन्मदिन गणेश चतुर्थी को ही आता है, और अम्मा पापा की विवाह वर्षगाँठ शिवरात्रि को.. ?

(नोट : ये संवाद काल्पनिक नहीं वास्तविक नायक और नायिका के बीच 2008 में उनके मिलने से पहले हुए ई-मेल का आदान प्रदान है, जिसे बिना किसी संपादन के ज्यों का त्यों रखा गया है)

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