नायिका Episode – 10 : जल की कोख से

नायक-

इतने तो लेखक हैं और संसार भर के विषयों पर लिख रहे हैं, मै भी  लिखूँ? अरे बचा क्या है लिखने के लिये, ऊपर से मेरा लिखने का ये ढंग, अब तो लिखे हुये पर शर्म आ रही थी.

अभी तक जिनकी आवाज़ आदेशों के रूप मे कानों में गूंज रही थी, सहसा उनकी छवि आँखों के सामने उभर आई, सब कुछ वही, हूबहू वही, दमकता हुआ भव्य चेहरा, नित्य की तरह माथे पे सिंदूरी सूरज, बस होंठ व्यंगात्मकता मे तनिक टेढ़े, “कहीं मुझे हंसी ना आ जाये तुम्हारा लिखा पढ़ कर, इसी का डर है न मोटू?” अब संसार के किसी भी पैमाने से मुझे मोटा नहीं कहा जा सकता पर यही तो उनकी अदा है.

पर ये शब्द ‘डर’ हमेशा मेरे लिये चुनौती रहा है और ये भ्रम भी अभी तक बरकरार है कि मुझे किसी भी बात का डर नहीं. शायद इसीलिये उन्होंने जानबूझ कर इस शब्द का इस्तमाल किया. चुनौती काम कर गई, रात को दो बजे अंगडाई ली, लो हो गया upload, अब चाहे हंसो या पछ्ताओ कि क्यों इस गट्टू को लिखने को कहा?

है तो मेरे बचपन की वास्तविक घटना जिसे मैं माँ की कोख से जन्म लेने के बाद जल की कोख से जन्म लेना कहता हूँ. अब फरमान देने वाले ने पढ़ा या नहीं ये तो वो ही जाने… अभी तो आप लोग ही पढ़कर बताइये क्या इसे ही लेखन कहते हैं? भई आठ रोटी का सवाल है… वो तो आप ही के दर पर मिलगी… है ना?

 

जल की कोख से

नाम बता कर क्या होगा, गाँव छोटा सा है, जहाँ एक नदी हुआ करती थी, अब है या नहीं, कहा नहीं जा सकता. अधिकतर आबादी विश्नोई पटेलो की है, शेष कोरखू आदिवासियों की. पूरे गाँव मे मात्र एक ब्राह्मण परिवार, विधवा ब्राहमणी परिवार की मुखिया. गाँव के मंदिर की देखरेख, पूजापाठ इस परिवार के जिम्मे. ब्राहमणी का पुत्र पूरे गाँव में महाराज, पंडितजी के नाम से ख्यात.

स्कूलों की गर्मियों की छुट्टियाँ लगते ही इस घर मे चहलपहल मच जाती थी, ब्राहम्णी की चारों विवाहित बेटियों मे से प्रति वर्ष किसी न किसी का या किसी वर्ष सभी का आना होता था. बेटियों के साथ ही आता था उनके बच्चों का रेला.

किसी के तीन तो किसी के चार. दामाद तो बस विदा कराने आते तो एक या दो दिन रुक कर, पत्नी और बच्चो को ले, चले जाते. घर में  चहलपहल के साथ ही पूरे गाँव मे धूम मच जाती थी.

आदिवासियों का तो साहस ही नहीं कि शहरों से आये इन मेहमानों को आमंत्रित कर सके पर गाँव के मुखिया सहित प्रमुख लोगों के घर इन मेहमानों को जाना ही पड़ता था. बच्चे भी हैरान कि किस किस को मामा बोलें!

अजीब तब भी लगता था, जब कोरखुओ के झुंड के झुंड पाँव पड़ने आते थे, वो भी बड़े अजीब ढंग से क्योंकि छू तो सकते नहीं, सो पाँव के पास की ज़मीन पर हाथ फेर, वही हाथ माथे पर लगा लेते थे. बच्चों की माँएं अगर किसी को पहचानती हुईं तो उससे, उसका और परिवार का हाल पूछ लिया.

नदी, इस घर से पश्चिम की तरफ थी. घर से निकलते ही रेतीली ढलान पर उतरते जाओ और लो आ गयी नदी, हाँ वापस आने में अच्छी खासी कसरत हो जाती थी. दरअसल एक बहुत पुरानी बावडी थी, किसी साल मूसलाधार बारिश हुई और बावडी फूट गई और नदी का रूप ले लिया.

गाँववालों की माने तो उनके पूर्वजों के अनुसार, जहाँ इस ब्राह्मण परिवार का वास है, वहाँ तक पानी ही पानी था. और फिर ग्रामीण मनोदशा के मुताबिक अमुक देवी या देवता की कहानी भी जोड़ देते थे.

एक स्थापित तथ्य ज़रूर था कि इस नदी में प्रतिवर्ष, कम से कम एक मनुष्य तो अवश्य ही डूबता था जो कि ग्रामीणों के अनुसार देवता बलि लेता था. अब देवता की बातें तो देवता ही जाने, पर हर साल एक या अधिक मौतें तो सच्चाई थी.

एक साल ब्राहम्णी की सिर्फ दो बेटियाँ आई, एक सबसे बड़ी जो अपनी पांच संतानों मे से मात्र एक पुत्र को लाई थी और तीसरी बेटी, जो अपने चारों बच्चों – एक पुत्र और तीन पुत्रियों के साथ आई थी. ब्राह्म्णी के दोनों नाती एक दूसरे से मात्र तीन महिने छोटे बड़े थे.

आगे की बात बताने मे सहूलियत हो इसलिये बड़ी बेटी के पुत्र का नाम इंद्र और संझली बेटी के पुत्र का नाम गणेश रख देते हैं. इंद्र तीन महिने बड़ा होने के बाद भी गणेश का अनुचर और गणेश – यथा नाम तथा गुण. पुजारीजी यानी इंद्र और गणेश के मामा चले गाँव के मुखिया के घर कथा बांचने.

गणेशजी भी जाने के लिये अड़ गये, इंद्र ने भी गणेश के सुर मे सुर मिला दिया. दोनों की माँओ ने अच्छी तरह समझा बुझा कर उन्हें मामा के साथ रवाना किया. समझाइश ज़रूरी थी क्योंकि लाख ब्राह्मण सही और वो पटेल, पर मुखिया तो मुखिया, और ये शहर के नौ-दस साल के छोकरे क्या जाने मुखिया क्या होता है? घर के ओझल होते ही गणेश ने मामा की, जो धोती कुर्ता पहने थे, धोती मे पाँव उलझाया, मामा जो मज़े से बीड़ी फूंकता हुआ, इंद्र को कुछ बता रहा था, बुरी तरह लड़खड़ा गया, झल्लाया,”क्या है?’

 

“मै भी सिगरेट पियूंगा” मामा का मुँह खुला रह गया,”हैंssss, इतना सा छोकरा सिगरेट पियेगा, ठहर अभी बताता हूँ.”

“अरे यार, बड़ा होकर कुछ और पी लूंगा, अभी तो सिगरेट पीने दो”

“पीने दो?? मतलब सिगरेट है तेरे पास, कहाँ से आई?”

“अरे वो कल शाम को अम्मा ने सेफ्टी पिन लाने दुकान पर भेजा था तो ले ली पर समझ नहीं आ रहा था कि कहाँ जलाऊ, लाओ अच्छा माचिस दो.” इंद्र जो कल सिगरेट खरीदी प्रकरण का गवाह था, तब भी सहम गया था और अब भी डरा जा रहा था कि पता नहीं मामा आज गणेश का क्या हाल करेंगे.

सूरज सर पे था, खुले खेत में जहाँ आसपास कोई झाड़ पेड़ भी नहीं, मामा से यह सब झेला नहीं जा रहा था और मुखिया के घर पहुंचने मे देर अलग हो रही थी,”देख ज़िद न कर, नहीं तो पिट जायेगा”

“आओ, पास आना पड़ेगा पीटने के लिये”, ढीठ गणेश ने मानो ललकारा. मामा लपक कर पास आये, पूरा ध्यान पीटने पर था और गणेश का, उनके हाथ मे थमी माचिस पर.

पलक झपकते ही गणेश फिर मामा से दस कदम दूर और मामा की माचिस उसके हाथ में. मामा ने हथियार डाल दिये,”अरे अरे क्या कर रहा है, कोई देखेगा तो क्या कहेगा? और वो दुकान वाला, जहाँ से तूने सिगरेट ली, क्या सोच रहा होगा?”

“क्या सोचेगा, वो कोई मुझे पहचानता थोड़ी है.”

” अरे मूरख यहाँ हर कोई हर किसी को पहचानता है.” सिगरेट जल गई थी, कश लगाने की कोशिश मे खांसते हुये गणेश ने मामा को माचिस थमाई,”चलो.”

अब मामा और गणेश साथ साथ और पीछे घिसटता इंद्र,”घर जा कर बताऊंगा तो खूब पिटेगा ये गणेश.” देर हो ही गई थी और मुखियाजी की आंते भूख से कुलबुला रही थी सो व्याकुल हो कर चल पड़े पंडितजी को देखने. आधे रास्ते मे दिख गये महाराज, मामा ने भी दूर से ही पटेल को देख लिया और गणेश के सर पर चपत मारी,”फेंक सिगरेट”.

“अरे यार, अभी दो चार कश ही तो लगाये थे, बुझा कर रख लेता हूँ, बाद मे काम आयेगी”, गणेश ने सोचा.

तब तक मुखिया बिलकुल ही करीब आ गये, बच्चों के सर पर हाथ फेरा,”अच्छा तो बाल गोपालो ने देर करवा दी.” गणेश तो घर से निकला ही था सिगरेट पीने, कथा-वथा मे कुछ रुचि नहीं, ‘पता नहीं कैसी कैसी ऊल-जलूल चीजों पर लोग विश्वास करते हैं’, बड़ी समस्या ये थी कि सिगरेट छुपाये कहाँ, घर तो ले जा नहीं सकता.

मामा पटेल की बात का जवाब दे ही रहे थे कि गणेश ने धीरे से अपना हाथ मामा के कुरते की जेब की तरफ बढ़ाया, ‘लो हो गई गायब सिगरेट, मामा लौटेंगे तो निकाल लूंगा’ मुखिया और मामा के आग्रह की अनदेखी कर गणेश इंद्र को घसीटता हुआ घर ले आया.

डेढ़ दो घंटे बाद मामा लौटे और घर की सारी स्त्रियों को एकत्रित कर अपनी जली हुई जेब दिखा कर पूरी कहानी सुना दी. हुआ यूँ कि पटेल ने पंडितजी की सुविधा के लिये बिजली के पंखे की व्यवस्था की थी.

बस फिर क्या था, अधबुझी सिगरेट ने अपना कमाल दिखाया और कुरते मे से धुआँ निकला और फिर पटेल की खरी खरी बातें. उस दोपहर गणेश को खाना तो मिला ही नहीं साथ मे माँ ने जो धुनाई की उसका तो कहना ही क्या!!!

‘सिगरेट तो इन गाँववालों के ऊपर इम्प्रेशन जमाने के लिये पी थी कि हम शहर के छोरे कितने एडवांस्ड हैं, खैर कुछ और कारनामा करता हूँ’, इस संकल्प के साथ अगली सुबह, रोज़ की तरह गणेश इंद्र को लेकर नदी पर नहाने पहुँचा.

कपड़े उतार, नदी में उतरने से पहले गणेश ने आसपास नज़र घुमाई, संतोष हुआ कि लगभग आठ – दस बच्चे, कुछ बड़े बच्चे और महिलाएँ हैं, चलो काफी दर्शक हैं, गणेश ने सोचा और नदी में पाँव रखा, इंद्र भी पीछे हो लिया.

 

तैरने से उनका नाता उतना ही था जितना मछली का पैदल चलने से. “अरे तू वहीं खड़ा है डरपोक, देख मैं घुटने घुटने पानी में आ गया”, ऊंचे स्वर मे चिल्लाया गणेश और संतुष्ट हुआ कि बिलकुल ही निकट खड़े स्नानार्थियो ने उसे देख लिया. इंद्र सहमते, सकुचाते उसके पास पहुंचा तो उसने कदम आगे बढ़ा दिये और फिर दहाड़ा,” ये देख, कमर तक पानी मे हूँ, तू तो डरपोक ही रहेगा”, इंद्र फिर बराबरी करने पहुंच गया और विनती की,”अब आगे मत जाना.”

उसकी आवाज़ में निहित भय ने गणेश मे जोश भर दिया और फिर कदम बढ़ा दिये. नदी के तल मे रेत ही रेत थी जो बहाव के साथ आगे पीछे हो जाती है यानि अभी जहाँ घुटने तक पानी है, अगले ही पल हो सकता है कि गले तक आ जाये. हुआ भी यही, गणेश कमर तक पानी में तो था ही, कदम बढ़ाते ही गायब!

 

इंद्र ने पुकारा, कोई जवाब नहीं. उधर गणेश के तो पाँव तले ज़मीन ही खिसक गई थी, हकबका कर पानी निगल गया, चारों ओर पानी ही पानी! अब? पीछे जाने को पाँव खींचे, पर वहाँ की रेत तो कब की खिसक चुकी थी, “हो गया काम”, अनायास ही शरीर ढीला छोड़ा तो पानी के वेग ने उसे ऊपर उछाला, पानी से सर ऊपर आते ही गहरी सांस ली और पुकारा,”इंद्र”, पर पानी इतनी मोहलत तो देता नहीं, सांस भर ली थी यही बहुत था, शायद पुकारा नहीं, पुकारना चाहा था. इधर इंद्र ने ये दृश्य देखा तो डर गया और नदी से निकल कर गणेश की प्रतीक्षा करने लगा,”करने दो जो करना है, आज फिर पिटेगा.”

गणेश को अंदर एक नयी ही दुनिया दिख रही थी, नज़ारा अद्भुत था पर सांस कब तक रोकी जा सकती थी, पता नहीं क्यों उसे ख्याल आया, “पानी मुझे कुल तीन बार उछालेगा, जो होना है इन तीन बार में ही हो जाये नहीं तो……., नहीं तो क्या, देखेंगे.”

तेज़ लहर का आभास होते ही फिर शरीर ढीला छोड़ा और फिर सर पानी के ऊपर, देखा एक 15 – 16 साल का लड़का थोड़ी ही दूर पर तैर रहा है, उसे देख कर हाथ हिलाया और उसे तुरंत ही विपरीत दिशा के ओर मुड़ते देखा. गणेश फिर पानी के अंदर, अच्छा था इस बार आवाज़ लगाने की कोशिश नहीं की और पहले के मुकाबले ज़्यादा गहरी सांस भर पाया. अंदर जाते ही उस लड़के पर बड़ा क्रोध आया और अगले क्षण मन मे बिजली कौंधी, “ये इस साल की देवता की बलि तो नहीं?” …. .

 

“न, मै नहीं दूंगा अपनी बलि, हरगिज़ नहीं, कोई मदद करे या न करे, ईश्वर को तो मानता नहीं जो उसे पुकारू, जो करना है खुद ही करना है, अभी पानी एक बार तो और उछालेगा ही,………….. पर जल्दी उछाले अब दम घुट रहा है.” पर लहर आई नहीं और पानी ने भी नहीं उछाला.

“न्, कोई बलि-वलि नहीं”, संकल्प किया और ऊपर उठने की कोशिश छोड़, नीचे बैठने लगा. “लगता है सांस लेने के लिये मुँह खोलना ही पड़ेगा, अब तो बिलकुल भी नहीं सहा जा रहा, पर निकलना तो है ही, नहीं तो अम्मा फिर मारेंगी, ………. अरेsss , ये क्या है?” उसके बाएँ पाँव का अंगूठा, लगभग उसी आकार के पत्थर से टकराया, “हुर्रे, मिला सहारा…” और अंगूठे को उस पर टिका कर, एक पल को पूरा भार उस पर डाला और शरीर को पीछे की तरफ झुकाया, “हुम्म….” और फिर कमर कमर पानी में.

आसपास नज़र घुमाई, इंद्र गुमसुम सा पेड़ के नीचे खड़ा था, स्त्रियाँ, जो उसके नदी में उतरते समय बहुत नज़दीक थी, बहुत दूर चली गई थी, “अरे नहीं, मैं ही पानी मे अंदर अंदर आगे चला गया था, वो देखो, तब भी वो उस पेड़ के ही पास थी और अब भी.”

“चल इंद्र, घर चलें”.

“तू कहाँ चला गया था, मुझे लगा कि तू मुझे छोड़ कर कहीं छुप गया है”.

“चुप रह और हाँ, अगर घर पर किसी को भी कुछ कहा तो तेरी खैर नहीं”, गणेश ने धमकाया. घर दिखते ही इंद्र ने हाथ छुड़ा कर दौड़ लगा दी और गणेश जब घर पहुंचा तो इंद्र हांफते हुये कथा का समापन कर रहा था.

“आज फिर खैर नहीं, खाना भी नहीं मिलेगा, बताता हूँ इस इंद्र के बच्चे को”, पर ये क्या, बूढ़ी नानी ने गले लगाया और रो पड़ी, मामा को तो पूजा करने का बहाना मिल गया, तुरंत ही घंटे घड़ियाल बजने लगे.

“हूँsssss, तो आखिर जमा ही लिया इम्प्रेशन.”

उपसंहार – सारे घरवालों ने और फिर सारे सुनने वालों ने बहुत सोचा विचारा और तलाशा भी, पर उस हुलिये का कोई 15 – 16 साल का लड़का, गाँव में होता ही नहीं था. उस साल और उसके बाद हर साल, किसी की मौत नदी में डूब कर नहीं हुई. गाँव वाले इसे ब्राह्मण देवता का चमत्कार कहें, गणेश या विनायक या विघ्नहर्ता का, पर ऐसा कोई भ्रम मुझे नहीं. मेरे लिये तो ये माँ की कोख से जन्म लेने के बाद, जल की कोख से जन्म लेना मात्र है.

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एंटी-क्लायमैक्स : पता नहीं हंसी आई या पछतावा हुआ, अच्छा लगा या बुरा बल्कि पढ़ा भी या नहीं पढ़ा. नहीं ही पढ़ा, वरना कान मरोड़ कर लिखवाने वाले की कोई तो प्रतिक्रिया आई होती.

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