नायिका Episode 24 : नायिका को हर जन्म में नायक का जन्मदिन मुबारक रहे

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Photo- Ashish Nigam (thefotomafiausa)

स्वामी ध्यान विनय मुझसे पूछने लगे base camp का अर्थ जानती हो?
मैंने कहा आप पूछ रहे हैं तो ज़रूर कोई और ही अर्थ बताने वाले होंगे… बताइये..

जब लोग पर्वतारोहण करने जाते हैं तो अपना सारा सामान नीचे base camp में ही छोड़ जाते हैं बस ज़रूरी सामान लेकर ऊपर चढ़ते हैं ….

मैंने पूछा – तो?

कहने लगे, आप अपने इस घर को base camp बना लो… सारा सामान यहीं नीचे छोड़ दो, जब तक यहाँ रहो घर-घर खेल लो… बच्चे, किचन, रिश्तेदार, ससुराल… जितने दिन रहो शैफाली नायक बनकर रहो, फिर निकल जाओ अपनी यात्रा पर … फिर भूल जाओ कि कोई शैफाली नायक पीछे रहती थी…

आप माँ जीवन शैफाली बनकर अपनी मंजिल के पहाड़ पर चढ़ते जाओ, तलाशो, खुद को, explore yourself …. आप वही नहीं हो जो मेरे इर्द-गिर्द दिखाई देती हो… मेरे नाम से चिपक कर मेरे सहारे मत रहो… आपकी मंजिल आपको तलाशना बाकी है… जाओ और जीयो उन यात्राओं में अपनी ज़िंदगी..

मैंने भी मज़ाक में कह दिया, आपका ये आख़िरी डायलॉग तो ऐसा लग रहा है जैसे DDLJ में अमरीश पुरी काजोल को कह रहे हो… जा जी ले अपनी ज़िंदगी…

कहने लगे सच तो है… वही समझ लो…. मुझे मज़ाक में बाबा कहती हो… पिता की तरह ही सही, मान लो कहा..

मैंने पूछा- और फिर रास्ते में कोई राज (शाहरुख़) मिल गया तो??

तो क्या? आप मेरी मिल्कियत नहीं जिस पर मैं हक जमाकर बैठ जाऊँ… आपका एक स्वतन्त्र अस्तित्व है… जिसे अपना जीवन अपने हिसाब से जीने का हक है… इन यात्राओं में केवल एक राज ही नहीं, जितने राज दिखें उनके राज़ तलाशो, मिलो, और मिलकर जानो क्या अब भी दिल में ऐसी कोई ख्वाहिश बाकी है जिसे दबाना पड़ रहा है, हो तो… उसे पूरा करो… आप मेरी जागीर नहीं हो या कोई गुलाम भी नहीं कि मैं आपको आपकी ख्वाहिशों को पूरा करने से रोकूँ….

मैं आपको आज़ाद करना चाहता हूँ तथाकथित सामाजिक नियमों से, नैतिकता के नाम पर पैरों में पड़ी ज़ंजीरों से… आपको अन्दर से पूरी तरह से झकझोर देना चाहता हूँ कि जीवन केवल आपका नाम नहीं.. आप सचमुच का जीवन हो… जिसमें जीवन के सारे रंग और खुशबू है….

इन यात्राओं पर निकल कर ही आप इन रंगों और खुशबुओं को खोज पाएंगी… जान पाएंगी कि अभी आपमें जानने के लिए कितना बचा है, क्या बचा है? कैसे कैसे जीना है? कब कब क्या करना है… और ये कहते हुए वो मुझे बब्बा (ओशो) की किताब पकड़ा देते हैं… जिसका नाम है “उड़ियो पंख पसार …..”
जिसके अंतिम पृष्ठ पर लिखा हुआ मेरे सामने रख देते हैं पढ़ने के लिए….

मेरे पास आए हो तो मैं तुम्हें परमात्मा नहीं देना चाहता, मैं तुम्हें जीवन देना चाहता हूँ… और जिसके पास भी जीवन हो, उसे परमात्मा मिल जाता है …. जीवन परमात्मा का पहला अनुभव है … और चूंकि मैं तुम्हें जीवन देना चाहता हूँ, इसलिए तुम्हें सिकोड़ना नहीं चाहता, तुम्हें फैलाना चाहता हूँ….. तुम्हें मर्यादाओं में बाँध नहीं देना चाहता… तुम्हें अनुशासन के नाम पर गुलाम नहीं बनाना चाहता हूँ… तुम्हें सब तरह की स्वतंत्रता देना चाहता हूँ… ताकि तुम फैलो, विस्तीर्ण होओ… ”

– ओशो

किसी भी यात्रा पर निकलने से पहले ध्यान के साथ उस यात्रा की तैयारी अपने आप में एक रचनात्मक सफ़र होता है… जिसके दौरान वो मुझे जीवन की उन ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं जो मेरी सोच के दायरे के भी बाहर होती हैं…. वो हमेशा कहते हैं जब तक अपने अन्दर के पुराने को पूरी तरह से ध्वस्त नहीं करोगी तब तक नई कैसे होओगी ???

स्वामी ध्यान विनय, मैं, I am blessed, I am blessed कहते कहते थक गयी हूँ …. तुम्हारे अन्दर के इस महासागर की आधी गहराई भी नहीं छू सकी हूँ अभी तो… न जाने और कितने मोती छुपे हैं इसमें…

और एक बात मैं भी कह दूं…. प्रेम की जिन तरंगों पर हम सवार हैं…. उस तक पहुँचने के लिए हमने न जाने कितने जन्म तपस्या की होगी और अब भी कर रहे हैं… उन तरंगों तक पहुंचना तो दूर कोई हाथ बढ़ाकर छू भी पाएगा, मुझे संदेह है…

और इसी संदेह के साथ मैं अपने सारे जन्म तुम संग गुजारना चाहूंगी…. फिर चाहे मैं हर जन्म में अर्जुन की तरह जीवन के रणक्षेत्र में तुम्हारे सामने संदेह खड़े करती रहूँ और तुम हर बार कृष्ण की तरह मेरे संदेहों पर गीता रचते रहो…

और अंत में उसी की तरह अपना विराट स्वरूप दिखा दो कि मैं ही प्रेम हूँ, मैं ही जीवन हूँ… मैं ही हूँ ध्यान और मैं ही ब्रह्माण्ड…..

– तुम्हारी ” नायिका ” को हर जन्म में अपने “नायक” का जन्मदिन मुबारक रहे…………..

माँ जीवन शैफाली के यात्रा वृत्तांत पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक्स पर जाएं

यात्रा आनंद मठ की – 1 : पांच का सिक्का और आधा दीनार

यात्रा आनंद मठ की – 2 : जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

यात्रा आनंद मठ की – 3 : यात्रा जारी है

यात्रा आनंद मठ की – 4 : Special Keywords To Optimize Your Search

यात्रा आनंद मठ की – 5 : तू आख़िरी स्थिति में ही है, देर न कर, संयोग के बिखर जाने में देर नहीं लगती

यात्रा आनंद मठ की – 6 : आजकल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे…

यात्रा आनंद मठ की – 7 : मैं इश्क़ हूँ दुनिया मुझसे चलती है

यात्रा आनंद मठ की – 8 : बंद कमरे में बंद पूर्व जन्म का रहस्य

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