कविता : कम्पास बॉक्स

बचपन में जब बहुत उत्सुकता थी
तब पहली बार हाथ लगा था
कम्‍पास बॉक्‍स.
चांदा, प्रकार, स्‍केल, पेंसिल, रबर और
एक पेंसिल शार्पनर.
कुल जमा यही सामान था
उस कम्‍पास की थाती.
मेरी बोली के शब्‍दों की तरह मिश्रित नामों वाला
एक देशज, एक खड़ी बोली तो कुछ शुद्ध अंग्रेजी के नाम.
आधे उपकरणों के तो काम ही समझ नहीं आए
हां, प्रकार से एकदम सटीक वृत्‍त खींचना खूब भाया,
उतना ही मजा चांदे का उपयोग कर कोण बनाने में आया.
आज जब सोचता हूं तो पाता हूं
तब मैं उन साधनों से खेल रहा था
और आज जिंदगी की ज्‍यामिति
मुझे अनेक कोणों से आजमा रही है.
मैं समकोण बनाता हूं तो वह
त्रिकोण, षट्कोण, अष्‍टकोणों में उलझा देती है.
मैं सरल रेखा खींचना चाहता हूं
तो वह वक्र हो जाती है.
पुराने फार्मूले सारे विफल हैं
इन इक्‍वेशनों के आगे.
जैसे, आप इसे कविता न समझ
गणित की उलझन समझ रहे हैं
वैसे ही किन शब्‍दों में कहूं
अपनी बात कि जिसे समझा जाए कविता
किस तरह समझे कविता
कि क्‍या कहना चाहता है उसका कवि.

– पंकज शुक्ला

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