कोई मिल गया : जब कैमरे में कैद हुए एलियन स्पेसशिप्स

मुंबई में घटी उस घटना के बाद कई दिन तक दुबारा ऐसा होने का इंतज़ार किया लेकिन निराशा ही हाथ लगी. वो रेडियो भी घटना के दूसरे दिन तक बंद हो गया और कोई मैकेनिक उसे सुधार नहीं सका.

इसके बाद पारिवारिक समस्या के चलते मुंबई से विदाई हो गई और मेरा नया ठिकाना फिर से इंदौर था. इस बीच मेरा शोध जारी रहा. मैंने दुनियाभर के यूएफओलॉजिस्ट से दोस्ती गांठ ली और उनसे लगातार संपर्क में रहा. इस बीच ये भी पता चला कि भारत में भी कई शहरों में लोगों को ऐसे अनुभव हुए थे.

2006 में ही सेंधवा में एक अजीबोगरीब घटना ने मेरा ध्यान आकर्षित कर लिया. सेंधवा के  वन क्षेत्र में कोई अंजानी चीज भीषण गर्जना करती हुई बेहद तेज़ गति से गुजरी थी और कई लोगों ने किसी काले रंग की विमान जैसी वस्तु आसमान में देखने का दावा किया था. इस घटना के बारे में मैंने अपने यूएफओलॉजिस्ट दोस्तों की मदद ली.

उनमें से एक ने सुझाव दिया कि मैं वहां एक दिशा सूचक यंत्र लेकर जाऊं और जाँच करूँ. घटना के तीसरे दिन मैं सेंधवा के उसी ‘इन्फेक्टेड’ क्षेत्र में पहुंच चुका था. इस वन क्षेत्र में जब मैंने दिशा सूचक यंत्र निकाला तो वह असामान्य व्यवहार कर रहा था.

किसी भी एक दिशा को दिखाने के बजाय उसके कांटे लगातार घूम रहे थे. इसका मतलब ये था कि जो भी शक्तिशाली चीज वहां से गुजरी थी, उसका असर घटना के तीसरे दिन तक बरक़रार था.

ग्रामीणों से पूछताछ में मालूम हुआ कि ऐसी घटनाएं नर्मदा बेल्ट में अक्सर होती है लेकिन मीडिया का उदासीन रवैया ऐसी घटनाओं को लोगों के सामने आने नहीं देता और दूसरा वे जो अजीब चीजे देखते हैं, उसके बारे में उनके पास कोई प्राथमिक जानकारी भी नहीं होती. खैर इस सफर में मुझे कोई मिस कॉल नहीं आया था.

एक साल और बीता और 2007 में मुझे भास्कर की ओर से रिपोर्टिंग के लिए मांडू जाने का मौका मिला. मांडू में उस दिन मौसम खराब था. हम जैसे तैसे अपना काम पूरा कर वापस आ गए लेकिन सनसनी तो घर जाकर पैदा होने वाली थी. लौटने के दो दिन बाद मैंने वे सारे फोटो देखना शुरू किये जो मांडू यात्रा के दौरान लिए थे.

मेरी निगाह उस फोटो पर अटक गई जो मैंने रानी रूपमति के महल के नीचे से लिए थे. जब मैंने फोटो को ज़ूम करके देखा तो सांस रूकती सी महसूस हुई. फिर अचानक दिमाग में मुंबई की घटना चलचित्र की तरह घूमने लगी. इसके बाद मैंने तुरंत अपना मोबाइल चेक किया तो देखा फोटो लेने से कुछ पहले दो मिस कॉल पड़े थे.

ये दोनों फोन मुझे मेरे ही नंबर ने किये थे. ओह दूसरी बार मैं उस सन्देश को पकड़ने में नाकाम रहा था. अब जानिये फोटो में क्या दिख रहा है.

महल से लगभग 2000 फ़ीट की ऊंचाई पर दो स्पेसशिप जैसी वस्तुएं दिखाई दे रही थी. एक थोड़ी पास और एक बहुत दूर. काश उस दिन मैंने आसमान की ओर देखा होता तो दुनिया को बताने के लिए मेरे पास एक रोमांचक कहानी होती.

ये फोटो पहला सबूत है. मैं चुनौती देता हूँ कि ये फोटो एलियन स्पेसशिप का है और कोई भी चाहे तो इसका परिक्षण किसी भी लैब में करवा सकता है. नौ साल तक मैंने ये फोटो छुपा रखा था.

कल इस एलियन स्टोरी की आखिरी किश्त है जो सबसे अधिक रोमांचकारी होगी. ये कहानी घने जंगलों में एक रहस्यमयी गुफा के पास घटित हुई थी.

मेरा विश्वास है कि कल की कहानी पढ़कर और उसके फोटो देखने के बाद आप में से अधिकांश मित्र मान लेंगे कि एलियन होते हैं. मांडू में मिली असफलता ठीक चार साल बाद एक बड़ी सफलता में बदलने जा रही थी.

इस लिंक पर क्लिक करके पढ़िए विपुल रेगे को कैसे मिला एलियन का पहला सन्देश

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